Sunday, February 1, 2026

ये परीक्षा नही है, धैर्य और आत्मविश्वास का सूचक है


ये परीक्षा नही है, धैर्य और आत्मविश्वास का सूचक है 


ॐ विद्या ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्र त्वात् धन माप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम्॥
विद्या से विनम्रता आती है, विनम्रता से योग्यता, योग्यता से धन, धन से जब अच्छे कार्य करते है, सच्चा सुख मिलता है।
शिक्षा वह बीज है, जो व्यक्ति में समझ के भाव को अंकुरित कर उसके जीवन को निखारती है।
अद्भुत सोच, गहरे विचार और जब आपकी मेहनत मिलती है, तो आपके जीवन में नया और अच्छा परिवर्तन लाती है।
इसलिए कहते है, विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्॥  विद्या धन सबसे बड़ा धन है।
एक छोटी सी कहानी है,   सही दिशा सही राह- 
एक गुरु अपने आश्रम में बैठे थे। कि तभी एक बहुत दुःखी व्यक्ति उनके पास आया और आते ही गुरु के चरणों में गिर गया।

और बोला गुरु जी, मैं अपने जीवन में बहुत मेहनत करता हूँ, हर काम मन लगाकर भी करता हूं, फिर भी आज तक मैं कभी

सफल नहीं हो पाया। क्या कारण हो सकता है।
उस व्यक्ति कि बाते सुनकर गुरु जी ने कहा ठीक है। आप मेरे इस पालतू कुत्ते को थोड़ी देर तक घुमाकर लाये, तब तक

आपके समस्या का समाधान खोजता हूँ। इतना कहने के बाद वह व्यक्ति कुत्ते को घुमाने के लिए चला गया। और फिर

कुछ समय बीतने के बाद वह व्यक्ति वापस आया। 
तो गुरु ने उस व्यक्ति से पूछा की यह कुत्ता इतना हाँफ क्यों रहा है। जबकि आप बिल्कुल भी थके हुए नहीं लग रहे हो ।

आखिर ऐसा क्या हुआ ?
इस पर उस व्यक्ति ने कहा कि मैं तो सीधा अपने रास्ते पर चल रहा था जबकि यह कुत्ता इधर-उधर रास्ते भर भाग रहा था,

और कुछ भी देखता तो उधर ही दौड़ जाता था। जिसके कारण यह इतना थक गया है। 
इस पर गुरु ने मुस्कुराते हुए कहा बस यही तुम्हारे प्रश्नों का जवाब है, तुम्हारी सफलता की मंजिल तो तुम्हारे सामने ही होती है।

लेकिन तुम अपने मंजिल के बजाय इधर-उधर भागते हो जिससे तुम अपने जीवन में कभी सफल नही हो पाए।
यह बात सुनकर उस व्यक्ति को समझ में आ गया। कि यदि सफल होना है तो हमे अपने मंजिल पर ध्यान देना चाहिए।
इसलिए उपनिषद कहते है, 
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।
उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।
और एक महत्त्वपूर्ण बात -चिंता नहीं, चिंतन करो और नए विचारों को जन्म दो। क्योंकि हम स्वयं अपने भाग्य के निर्माता हैं।


उद्यमेन हि सिद्धयन्ति कार्याणि न मनोरथैः।

न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥


सफलता परिश्रम से सिद्ध होती हैं, केवल बैठकर सोचने से नहीं। जैसे सोए हुए सिंह के मुख में हिरण स्वयं नहीं आता।।चाहे कोई भी जीव हो या मनुष्य, सफलता पाने के लिए मेहनत सबको करनी ही पड़ती है।






एक कहानी ....

वे चीजें जो हमें शुरू में अच्छी नहीं लगतीं लेकिन बाद में अच्छी ही होती हैं।


एक व्यक्ति बहुत दिनों से तनावग्रस्त चल रहा था जिसके कारण वह काफी चिड़चिड़ा तथा क्रोध में रहने लगा था।


वह हमेशा इस बात से परेशान रहता था कि घर के सारे खर्चे उसे ही उठाने पड़ते हैं, पूरे परिवार की जिम्मेदारी उसी के ऊपर है, किसी ना किसी रिश्तेदार का उसके यहाँ रोज आना जाना लगा ही रहता है, उसे बहुत ज्यादा ख़र्च करना पड़ता है।


इन्ही बातों को सोच सोच कर वह अक़्सर काफी परेशान रहता था,तथा अपनी पत्नी से भी ज्यादातर उसका किसी न किसी बात पर झगड़ा होता रहता था। इसी तरह समय गुजरता गया ।


एक दिन उसका बेटा उसके पास आया और बोला...... पिताजी मेरा स्कूल का होमवर्क करा दीजिये ।

वह व्यक्ति पहले से ही तनाव में था। इसलिए उसने बेटे को बोला बाद में आना। लेकिन जब थोड़ी देर बाद उसका गुस्सा शांत हुआ तो वह बेटे के पास गया। उसने देखा कि बेटा गहरी नींद में सोया हुआ है और उसके हाथ में उसके होमवर्क की कॉपी है।


उसने धीरे से जब कॉपी लेकर जैसे ही नीचे रखनी चाही, उसकी नजर होमवर्क के टाइटल पर पड़ी।

होमवर्क का टाइटल था....


वे चीजें जो हमें शुरू में अच्छी नहीं लगतीं लेकिन बाद में अच्छी ही होती हैं।


इस टाइटल पर बच्चे को एक पैराग्राफ लिखना था जो उसने लिख लिया था। उत्सुकतावश उसने बच्चे का लिखा पढना शुरू किया बच्चे ने लिखा था.......


मैं अपने फाइनल एग्जाम को बहुंत धन्यवाद् देता हूँ क्योंकि शुरू में तो ये बिलकुल अच्छे नहीं लगते लेकिन बाद में पता चलता है, कि जीवन के लिए सबसे ज्यादा जरूरी होते हैं।


मैं ख़राब स्वाद वाली कड़वी दवाइयों को बहुत धन्यवाद् देता हूँ क्योंकि शुरू में तो ये कड़वी लगती हैं लेकिन ये मुझे बीमारी से ठीक करती हैं।


मैं नींद से जगाने वाली उस सुबह को बहुत धन्यवाद् देता हूँ जो मुझे हर सुबह बताती है कि मैं जीवित हूँ।


मैं ईश्वर को भी बहुत धन्यवाद देता हूँ जिसने मुझे इतने अच्छे पिता दिए क्योंकि उनकी डांट मुझे शुरू में तो बुरी लगी थी। लेकिन वो मेरे लिए अच्छी है।

मेरे लिए मेरे पिता वो सब कुछ करते है, जो मेरे लिए सबसे ज्यादा जरूरी हैं।  मुझे वो सब चीजे दिलाते हैं। उनको जो कभी नहीं मिली। वह मुझे घुमाने ले जाते हैं और मुझे इस बात की ख़ुशी है कि मेरे पास पिता हैं क्योंकि मेरे दोस्त राकेश के तो पिता ही इस दुनिया में नहीं हैं।


बच्चे का होमवर्क पढने के बाद वह व्यक्ति जैसे अचानक नींद से जाग गया हो। उसकी सोच बदल सी गयी। बच्चे की लिखी बातें उसके दिमाग में बार-बार घूम रही थी। फिर वह व्यक्ति थोडा शांत होकर बैठा और उसने अपनी परेशानियों के बारे में सोचना शुरू किया.......


मुझे घर के सारे खर्चे उठाने पड़ते हैं, इसका मतलब है कि मेरे पास घर है और ईश्वर की कृपा से मैं उन लोगों से बेहतर स्थिति में हूँ जिनके पास घर नहीं है।


मुझे पूरे परिवार की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है, इसका मतलब है कि मेरा परिवार है, पत्नी बच्चे हैं और ईश्वर की कृपा से मैं उन लोगों से ज्यादा खुशनसीब हूँ जिनके पास परिवार नहीं हैं और वो दुनियाँ में बिल्कुल अकेले हैं।


मेरे यहाँ कोई ना कोई मित्र या रिश्तेदार आता जाता रहता है, इसका मतलब है कि मेरी एक सामाजिक हैसियत है और मेरे पास मेरे सुख दुःख में साथ देने वाले लोग हैं।


मैं बहुत ज्यादा ख़र्च करता हूँ, इसका मतलब है कि मेरे पास अच्छी नौकरी है और मैं उन लोगों से बेहतर हूँ जो बेरोजगार हैं या पैसों की वजह से बहुत सी चीजों और सुविधाओं से वंचित हैं।

हे ! मेरे भगवान् ! तेरा बहुंत बहुंत शुक्रिया मुझे माफ़ करना, मैं तेरी कृपा को पहचान नहीं पाया।


इसके बाद उसकी सोच एकदम से बदल गयी, उसकी सारी परेशानी, सारी चिंता एक दम से जैसे ख़त्म हो गयी। वह एकदम से बदल सा गया। वह भागकर अपने बेटे के पास गया और सोते हुए बेटे को गोद में उठाकर उसके माथे को चूमने लगा और अपने बेटे को तथा ईश्वर को धन्यवाद देने लगा।


हमारे सामने जो भी परेशानियाँ हैं, हम जब तक उनको नकारात्मक नज़रिये से देखते रहेंगे , तब तक हम गंभीर परेशानियों से घिरे रहेंगे, लेकिन जैसे ही हम उन्हीं चीजों को, उन्ही परिस्तिथियों को सकारात्मक नज़रिये से देखेंगे, हमारी सोच एकदम से बदल जाएगी, हमारी सारी चिंताएं, सारी परेशानियाँ, सारे तनाव एक दम से ख़त्म हो जायेंगे और हमें मुश्किलों से निकलने के नए - नए रास्ते दिखाई देने लगेंगे। 


कहानी -   बीज और किसान

एक गाँव में एक किसान रहता था। वह बहुत परिश्रमी था, पर जल्दी परिणाम चाहता था। वह रोज़ अपने खेत में बोए बीजों को देखकर चिंतित रहता कि अभी तक पौधे क्यों नहीं निकले।


एक दिन उसने अधीर होकर मिट्टी हटाकर बीज देखने शुरू कर दिए कि वे अंकुरित हुए या नहीं। ऐसा करने से कई बीज खराब हो गए।


यह देखकर गाँव के एक समझदार व्यक्ति ने उसे समझाया—बीज को बढ़ने के लिए तीन चीज़ें चाहिए—


सही मिट्टी, पानी और समय।


यदि तुम रोज़ उसे खोदकर देखोगे, तो वह कभी पौधा नहीं बनेगा। किसान को अपनी गलती समझ में आ गई। अब उसने बीज बोकर धैर्य रखा, समय पर पानी दिया और नियमित देखभाल करता रहा।


कुछ समय बाद खेत में हरे-भरे पौधे दिखने लगे। तब किसान को समझ आया 

कि धैर्य और निरंतर प्रयास से ही सफलता मिलती है। और उसके लिए हमें लगातार लगे रहना पड़ता है। 


धन्यवाद । 




ये परीक्षा नही है, धैर्य और आत्मविश्वास का सूचक है

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