पुराण साहित्य में विज्ञान-

संक्षेप
पुराण साहित्य को प्रायः केवल धार्मिक एवं पौराणिक कथाओं तक सीमित मान लिया जाता है, जबकि वस्तुतः यह भारतीय ज्ञान–परंपरा का एक बहुआयामी, वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक भंडार है। प्रस्तुत शोधपत्र का उद्देश्य पुराण साहित्य में निहित विविध विज्ञानों—जैसे आयुर्विज्ञान (आयुर्वेद), रत्न विज्ञान, वास्तु विज्ञान, ज्योतिष विज्ञान, सामुद्रिक विज्ञान, पशु विज्ञान,तथा धनुर्विज्ञान—का अनुसन्धानात्मक सर्वेक्षण प्रस्तुत करना है। अग्निपुराण, गरुड़पुराण, मत्स्यपुराण, नारदपुराण एवं विष्णुधर्मोत्तरपुराण के आधार पर यह स्पष्ट किया गया है कि प्राचीन भारतीय समाज में वैज्ञानिक चिंतन अत्यंत विकसित था। यह अध्ययन सिद्ध करता है कि पुराण केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, अपितु लोकजीवन से सम्बद्ध व्यवहारिक विज्ञानों के प्रमाणिक स्रोत हैं, जिनका ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व आज भी प्रासंगिक है।
प्रस्तावना
‘पुराण’ शब्द का अर्थ प्राचीन है, किंतु इसकी परिभाषा केवल प्राचीनता तक सीमित नहीं है। “पुरा नवं भवति पुराणम्”—अर्थात् जो प्राचीन होते हुए भी नवीन, उपयोगी और विशिष्ट ज्ञान प्रदान करे, वही पुराण है। प्राचीन जनों का अनुभव अत्यंत समृद्ध था; अतः उनके द्वारा रचित काव्य और ग्रंथ भी अपने विचार–तत्त्व के कारण विशिष्ट माने जाते हैं।
इतिहास और पुराण के माध्यम से ही वेदों के अर्थ का सम्यक् बोध संभव है—
इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत्।
बिभेत्यल्पश्रुताद्वेदो मामयं प्रहरिष्यति॥
अर्थात् इतिहास और पुराण के द्वारा वेद का विस्तार करना चाहिए, क्योंकि अल्पज्ञ व्यक्ति वेद के अर्थ को समझे बिना कर्म करता है और समाज में समस्या उत्पन्न कर सकता है। इसलिए पुराण–ज्ञान आवश्यक है। पुराणों के आधार पर ही वेदों के अर्थ को सही रूप में समझा जा सकता है। इनके अभाव में किसी भी ग्रंथ की व्यापक एवं सार्थक व्याख्या संभव नहीं।
पुराण प्राचीन काल से भारतीय इतिहास, संस्कृति और सभ्यता के आधार–स्तंभ रहे हैं। भारतीय संस्कृति की मेरुदण्ड के रूप में पुराण साहित्य का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत में प्रारम्भ से ही विज्ञान की समृद्ध परंपरा विद्यमान रही है। ऋग्वेद में भी ‘पुराण’ शब्द विशेषण रूप में प्रयुक्त हुआ है। ‘पुराणी विद्या’ अर्थात् पौराणिक ज्ञान एक विशिष्ट प्रकार का विज्ञान है।
पुराणों में आयुर्विज्ञान, रत्न विज्ञान, वास्तु विज्ञान, ज्योतिष विज्ञान, सामुद्रिक विज्ञान तथा धनुर्विज्ञान जैसे अनेक विज्ञानों का वर्णन प्राप्त होता है। विशेषतः अग्निपुराण, गरुड़पुराण, मत्स्यपुराण और नारदपुराण जैसे विश्वकोशीय ग्रंथों में इनका विस्तृत विवेचन उपलब्ध है। प्रस्तुत लेख में इन्हीं विषयों का संक्षिप्त किंतु प्रामाणिक सर्वेक्षण प्रस्तुत किया गया है।
1.धनुर्विज्ञान (शस्त्रास्त्र विज्ञान)
प्राचीन भारत में धनुर्वेद अत्यंत प्रतिष्ठित विद्या थी। ब्रह्मा, प्रजापति, इन्द्र, मनु और जमदग्नि इसके प्रमुख आचार्य माने जाते हैं।
महाभारत में अगस्त्य और भारद्वाज का उल्लेख धनुर्विद्या के आचार्य के रूप में मिलता है। अग्निपुराण के चार अध्यायों में धनुर्विज्ञान का सार संकलित है। विश्वामित्र द्वारा प्रणीत धनुर्वेद का उल्लेख मधुसूदन सरस्वती ने किया है, यद्यपि वह ग्रंथ वर्तमान में उपलब्ध नहीं है।
2. आयुर्विज्ञान (आयुर्वेद)
आयुर्वेद भारतीय जीवन–पद्धति से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ शास्त्र है। अतः पुराणों में इसका विस्तृत विवेचन स्वाभाविक है। अग्निपुराण और गरुड़पुराण में आयुर्वेद का विशेष वर्णन प्राप्त होता है।
धन्वंतरि द्वारा सुश्रुत को आयुर्वेद का उपदेश दिया गया। गरुड़पुराण में 56 अध्यायों में रोगनिदान, औषधि–विज्ञान, द्रव्यगुण, ज्वर, रक्तपित्त, कास, श्वास आदि रोगों की चिकित्सा तथा सर्पदंश उपचार का विवेचन है। अग्निपुराण में मृतसंजीवनी योग, सिद्धयोग तथा विविध कल्पयोगों का उल्लेख मिलता है।
कृषि–प्रधान भारत में वृक्षायुर्वेद का भी विशेष महत्त्व था। अग्निपुराण में वृक्षों, लताओं और गुल्मों से प्राप्त औषधियों का वर्णन मिलता है। बृहत्संहिता की टीका में कश्यप, पराशर और सारस्वत जैसे आचार्यों के नाम इस विद्या से जुड़े पाए जाते हैं।
3. रत्न विज्ञान
रत्न–परीक्षा का विज्ञान पुराणों में सुव्यवस्थित रूप से वर्णित है। गरुड़पुराण में बारह अध्यायों में रत्न विज्ञान का विस्तृत विवेचन मिलता है। इसमें रत्नों का वर्गीकरण, उनके गुण–दोष तथा शुद्ध रत्नों की पहचान बताई गई है।
वज्र, मोती, पद्मराग, मरकत, नीलम, वैदूर्य, गोमेद, स्फटिक और विद्रुम आदि रत्नों की परीक्षा का उल्लेख मिलता है। अग्निपुराण में इस विषय का संक्षिप्त विवरण है। भोजराज ने ‘मुक्तिकल्पतरु’ में विभिन्न पुराणों में वर्णित रत्न–विज्ञान के संदर्भों का विशेष संकलन किया है।
4. वास्तु विज्ञान
देवालयों, राजप्रासादों तथा भवनों के निर्माण से सम्बद्ध विद्या को वास्तुशास्त्र कहा जाता है। मत्स्यपुराण में अठारह अध्यायों में वास्तुशास्त्र का अत्यंत विस्तृत विवेचन प्राप्त होता है।
अग्निपुराण, गरुड़पुराण तथा विष्णुधर्मोत्तरपुराण में भी वास्तु विषयक सामग्री उपलब्ध है। मत्स्यपुराण में वास्तु विद्या के मूल सिद्धांत, स्थान चयन, मूर्ति निर्माण तथा देवालय एवं राजप्रासाद निर्माण का क्रमबद्ध विवरण दिया गया है। इसमें अत्रि, भृगु, नारद और विश्वकर्मा सहित अठारह आचार्यों के नाम उल्लिखित हैं।
5. ज्योतिष विज्ञान
ज्योतिष को वेद–पुरुष का नेत्र कहा गया है। श्रीमद्भागवत के पंचम स्कंध तथा देवीभागवत के अष्टम स्कंध में खगोल एवं ज्योतिष विद्या का विवरण मिलता है।
गरुड़पुराण में फलित ज्योतिष, नक्षत्र देवता, योग, दशा–फल, यात्रा एवं विवाह के शुभ–अशुभ फलों का वर्णन है। नारदपुराण में नक्षत्र–कल्प और गणित विषयक विवेचन मिलता है, जबकि अग्निपुराण में शुभ–अशुभ विवेक का उल्लेख प्राप्त होता है।
6. सामुद्रिक विज्ञान
सामुद्रिक शास्त्र में स्त्री–पुरुष के शारीरिक लक्षणों के आधार पर उनके स्वभाव और जीवन–दिशा का विवेचन किया गया है। रामायण के सुंदरकाण्ड में भगवान राम के अंग–विन्यास का वर्णन इसका उत्कृष्ट उदाहरण है।
अग्निपुराण और गरुड़पुराण में अंगविद्या का विस्तृत विवरण मिलता है। जैन साहित्य में इसी विद्या को ‘अंगविज्जा’ कहा गया है।
7. पशु विज्ञान
पशु चिकित्सा एवं पशुपालन से सम्बद्ध ज्ञान प्राचीन भारत में अत्यंत विकसित था। महाभारत के सभापर्व में अश्वसूत्र और हस्तिसूत्र का उल्लेख मिलता है। शालिहोत्र अश्वचिकित्सा के प्रमुख आचार्य माने जाते हैं।
अग्निपुराण में अश्वगति, अश्वलक्षण तथा अश्वचिकित्सा का विवरण प्राप्त होता है, जबकि गरुड़पुराण में विष–चिकित्सा का वर्णन है। हस्तिशास्त्र के क्षेत्र में मत्स्यपुराण में सोमपुत्र बुध को गजवैद्यक का प्रवर्तक कहा गया है। धन्वंतरि द्वारा रचित गजायुर्वेद का संक्षिप्त विवरण गरुड़पुराण और अग्निपुराण में उपलब्ध है। इससे सिद्ध होता है कि पुराणों में पशु विज्ञान एक व्यवस्थित और वैज्ञानिक विद्या के रूप में प्रतिष्ठित था।
उपसंहार
इस प्रकार स्पष्ट है कि पुराण साहित्य केवल धार्मिक आस्था का ग्रंथ–समूह नहीं है, बल्कि भारतीय विज्ञान, तकनीक और व्यावहारिक ज्ञान का एक विशाल एवं प्रमाणिक भंडार है। पुराणों में वर्णित विविध विज्ञान प्राचीन भारतीय समाज की उच्च वैज्ञानिक चेतना, अनुभव और प्रयोगशीलता को प्रमाणित करते हैं। अतः आधुनिक संदर्भ में भी पुराणों का अध्ययन ऐतिहासिक, सांस्कृतिक तथा वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत उपयोगी एवं प्रासंगिक है।
Dr.Upendar Dubey