Wednesday, December 31, 2025

भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) क्या है?

 

भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) : 

1. भारतीय ज्ञान प्रणाली क्या है?

भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) ज्ञान का एक विशाल भंडार है, जो हजारों वर्षों में विकसित हुआ है। इसमें केवल पढ़ाई-लिखाई ही नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाई जाती है।
यह दर्शन, धर्म, विज्ञान, गणित, चिकित्सा, कला, संगीत, कृषि, वास्तुकला और शासन जैसे अनेक विषयों को समेटे हुए है।

इसी कारण IKS को “जीवन का विज्ञान” कहा जाता है, क्योंकि यह मनुष्य को सही सोच, सही आचरण और संतुलित जीवन का मार्ग दिखाती है।

संस्कृत श्लोक

विद्या ददाति विनयं, विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वाद्धनमाप्नोति, धनात् धर्मं ततः सुखम्॥

अर्थ:
विद्या से विनय आता है, विनय से पात्रता, पात्रता से धन, धन से धर्म और धर्म से सुख मिलता है।


2. भारतीय ज्ञान की नींव

भारतीय ज्ञान प्रणाली की नींव निम्न ग्रंथों पर आधारित है—

  • वेद

  • उपनिषद

  • पुराण

  • रामायण और महाभारत

ये ग्रंथ केवल धार्मिक या साहित्यिक नहीं हैं, बल्कि ज्ञान, नीति और शासन की गहरी समझ देते हैं। इनमें जीवन, कर्तव्य, नैतिकता और समाज व्यवस्था का मार्गदर्शन मिलता है।

संस्कृत श्लोक

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो
न मेधया न बहुना श्रुतेन।

(कठोपनिषद)

अर्थ:
आत्मज्ञान केवल भाषण, बुद्धि या अधिक सुनने से नहीं, बल्कि अनुभूति से प्राप्त होता है।


3. विज्ञान और गणित में भारत का योगदान

प्राचीन भारत ने विज्ञान और गणित में विश्व को अमूल्य योगदान दिए—

  • शून्य की खोज

  • दशमलव प्रणाली

  • बीजगणित और ज्यामिति

  • खगोलशास्त्र

आर्यभट्ट, भास्कराचार्य और ब्रह्मगुप्त जैसे विद्वानों ने आधुनिक गणित की नींव रखी।

चिकित्सा के क्षेत्र में आयुर्वेद, जैसा कि चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में वर्णित है, आज भी विश्वभर में अपनाया जा रहा है।

संस्कृत श्लोक

शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।

अर्थ:
शरीर ही धर्म और कर्तव्य पालन का प्रथम साधन है।


4. भारतीय दार्शनिक परंपराएँ

भारतीय दर्शन बहुत व्यापक है। इसमें भौतिकवादी चार्वाक दर्शन से लेकर आध्यात्मिक वेदांत तक सभी विचार मिलते हैं।
मुख्य दर्शन हैं—

  • सांख्य

  • योग

  • न्याय

  • वैशेषिक

  • मीमांसा

  • वेदांत

इनका उद्देश्य मनुष्य को सत्य, ज्ञान और आत्मबोध की ओर ले जाना है।

संस्कृत श्लोक

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।
(योगसूत्र)

अर्थ:
मन की चंचल वृत्तियों को शांत करना ही योग है।


5. कला और साहित्य

भारत की कला और साहित्य विश्वप्रसिद्ध हैं।

  • भरतनाट्यम, कथक जैसे शास्त्रीय नृत्य

  • हिंदुस्तानी और कर्नाटक संगीत

  • कालिदास, तुलसीदास, रवीन्द्रनाथ टैगोर जैसे महान साहित्यकार

इन सभी ने मानव भावनाओं और सौंदर्य को गहराई से अभिव्यक्त किया है।

संस्कृत श्लोक

नाट्यं भिन्नरुचिर्जनस्य बहुधाप्येकं समाराधनम्।

अर्थ:
नाट्य सभी प्रकार के लोगों को एक साथ आनंद देने वाला माध्यम है।


6. आध्यात्मिक और नैतिक शिक्षाएँ

भगवद्गीता जैसी रचनाएँ हमें सिखाती हैं—

  • कर्तव्य पालन

  • धर्म

  • अहिंसा

  • करुणा

  • सभी प्राणियों के प्रति सम्मान

ये शिक्षाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं।

संस्कृत श्लोक

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
(भगवद्गीता)

अर्थ:
मनुष्य का अधिकार केवल कर्म पर है, फल पर नहीं।


7. आधुनिक शिक्षा में IKS और NEP 2020

नई शिक्षा नीति 2020 भारतीय ज्ञान प्रणाली को शिक्षा का अभिन्न अंग बनाती है।
इसका उद्देश्य है—

  • छात्रों को अपनी संस्कृति से जोड़ना

  • उन्हें वैश्विक नागरिक बनाना

IKS को लागू करने के तरीके

  1. पाठ्यक्रम में वेद, उपनिषद, कला, वास्तु, योग

  2. अनुभव आधारित शिक्षा

  3. शिक्षकों का विशेष प्रशिक्षण

  4. शोध और नवाचार केंद्रों की स्थापना


8. ज्ञान के संरक्षण में महिलाओं की भूमिका

गार्गी, मैत्रेयी जैसी विदुषियों से लेकर आज की शिक्षित महिलाएँ—
ज्ञान के संरक्षण और प्रचार में महिलाओं की भूमिका सदैव महत्वपूर्ण रही है।
महिला शिक्षा राष्ट्र के विकास के लिए अनिवार्य है।

संस्कृत श्लोक

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।

अर्थ:
जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहाँ देवता निवास करते हैं।


9. चुनौतियाँ

IKS को शिक्षा में लागू करने में कुछ कठिनाइयाँ भी हैं—

  • प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी

  • गुणवत्तापूर्ण पाठ्य सामग्री

  • नए मूल्यांकन तरीके

  • आवश्यक बुनियादी ढाँचा

इन चुनौतियों का समाधान धीरे-धीरे संभव है।


निष्कर्ष

भारतीय ज्ञान प्रणाली केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य का मार्गदर्शक है।
इसके सिद्धांत अपनाकर हम एक नैतिक, संतुलित और समृद्ध समाज बना सकते हैं।
IKS एक जीवंत और विकसित होती हुई परंपरा है, जो समय के साथ नए विचारों को आत्मसात करती रहती है।

अंतिम श्लोक

सर्वे भवन्तु सुखिनः
सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥

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