Monday, July 31, 2023

Which is the first Sanskrit village of India? भारत का पहला संस्कृत गांव कौन सा है?

 

भारत का पहला संस्कृत गांव कौन सा है?

कर्नाटक के शिवमोग्गा के पास मत्तूर गांव और मध्यप्रदेश के राजगढ़ जिले में झिरी गांव के सभी लोग संस्कृत बोलते हैं। दोनों गांव के लोगों के लिए संस्कृत प्राइमरी लैंग्वेज है। स्कूलों में बच्चों को संस्कृत मीडियम में पढ़ाया जाता है। 976 आबादी वाले झिरी गांव में महिलाएं, किसान और मजदूर भी एक-दूसरे से संस्कृत में बात करते हैं।


 


 

Which is the first Sanskrit village of India?

The people of Mattur village near Shivamogga in Karnataka and Jhiri village in Rajgarh district of Madhya Pradesh all speak Sanskrit. Sanskrit is the primary language for the people of both the villages. Children are taught in Sanskrit medium in schools. In Jhiri village with a population of 976, women, farmers and laborers also talk to each other in Sanskrit.


संस्कृत भारत में कब आई? When did Sanskrit come to India? विश्व के प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद,सामवेद,यजुर्वेद,अर्थवेद लिखे

 Sanskrit 

 

संस्कृत भारत में कब आई?

संस्कृत भाषा का उदय प्राचीन ऋग्वैदिक काल में हुआ क्योंकि इसी काल में विश्व के प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद,सामवेद,यजुर्वेद,अर्थवेद लिखे गए तथा इन वेदो में सबसे प्राचीन वेद ऋग्वेद है जो कि संस्कृत भाषा में लिखा गया.

 

When did Sanskrit come to India?

The rise of Sanskrit language took place in the ancient Rigvedic period because in this period the world's ancient texts Rigveda, Samaveda, Yajurveda, Arthveda were written and the most ancient of these Vedas is Rigveda, which was written in Sanskrit language.

 





Saturday, July 8, 2023

What is the Om meditation?What is the benefit of Om?What happens when you listen to Om meditation?

What is the Om meditation?

Om meditation is a type of meditation that involves chanting the words “”Om”” or “”Aum.”” Om meditation combines our two greatest spiritual possession – breath and sound to create a comprehensive meditation technique. Om meditation brings the practitioner peace, quiet, tranquility, and serenity.

What is the benefit of Om?
Benefits of Chanting Om Mantra Everyday​
It Brings Positivity. ...
Improves Healing Power. ...
Spiritual Awakening. ...
Reduces Anxiety Issues. ...
Activate Chakras. ...
Create A Balance. ...
Cardiovascular Benefits. ...
Glowing Skin.

Which chakra is Om?

Mantra: The seed mantra (beej mantra) of Ajna Chakra is 'Om'. Yoga poses to balance the Third Eye Chakra: Ajna Chakra is stimulated when practicing Headstand (Shirshasana).

How many minutes should I chant Om?
If we get into a situation that needs our mind to be calm and peaceful, Omkar should be chanted for 5 minutes. It will immediately refresh the mind with positive energy and calmness.

What happens when you listen to Om meditation?
A few years ago, benefits of chanting OM (AUM) mantra have also been proved by the scientists and they confirmed that daily repeatedly chanting OM (AUM) mantra reduces stress, increases concentration, gives peace of mind, treats depression

What is the mystery behind Om?
By chanting Om, the mind becomes aligned with the breath, which enables a person to get into an elevated state of consciousness called samadhi. The activity of attaining samadhi brings the materially absorbed mind under control, which enables a person to have one-pointed focus towards spiritual realization.

Can I chant Om silently?
You can chant Om silent or aloud. Om is not just a sound, it's a wave of the universe. Om is a powerful sound that lies within us. Chanting Om or Aum is a sacred practice that helps our mind and body to energize.
What happens when we chant Om 108 times?
When you chant this mantra 108 times, it is said to bring about a sense of calm and peace. It can also help to improve your concentration and focus. Chanting “Om” is also said to be beneficial for your physical health. It can help to improve your circulation, reduce stress, and relieve pain

Why do we chant Om 3 times?
Sometimes, 'Om' is said once and Shanti is repeated thrice after that. Shanti is repeated thrice since it is chanted for peace in the body, mind and spirit. It is also chanted thrice to make the past, present and future peaceful.

Who invented Om?

The syllable Om is first mentioned in the Upanishads, the mystical texts associated with the Vedanta philosophy. It has variously been associated with concepts of "cosmic sound" or "mystical syllable" or "affirmation to something divine", or as symbolism for abstract spiritual concepts in the Upanishads.

Why is the word Om powerful?
OM is the highest sacred symbol in Hinduism. The word OM is so much powerful that this single word can produce powerful and positive vibrations which allows you to feel the whole universe.

Does Om bring good luck?
The symbol OM represents oneness with the Supreme and helps in spiritual attainment. The OM is most commonly used as a charm to bring good fortune.

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Thursday, July 6, 2023

शिवलिंगों को ज्योतिर्लिंगों के रूप में पूजा जाता है। ये संख्या में १२ है।

 

पुराणों के अनुसार शिवजी जहाँ-जहाँ स्वयं प्रगट हुए उन बारह स्थानों पर स्थित शिवलिंगों को ज्योतिर्लिंगों के रूप में पूजा जाता है। ये संख्या में १२ है। सौराष्ट्र प्रदेश (काठियावाड़) में श्रीसोमनाथ, श्रीशैल पर श्रीमल्लिकार्जुन, उज्जयिनी (उज्जैन) में श्रीमहाकाल, ॐकारेश्वर अथवा ममलेश्वर, परली में वैद्यनाथ, डाकिनी नामक स्थान में श्रीभीमशंकर, सेतुबंध पर श्री रामेश्वर, दारुकावन में श्रीनागेश्वर, वाराणसी (काशी) में श्री विश्वनाथ, गौतमी (गोदावरी) के तट पर श्री त्र्यम्बकेश्वर, हिमालय पर केदारखंड में श्रीकेदारनाथ और शिवालय में श्रीघृष्णेश्वर।  हिंदुओं में मान्यता है कि जो मनुष्य प्रतिदिन प्रात:काल और संध्या के समय इन बारह ज्योतिर्लिंगों का नाम लेता है, उसके सात जन्मों का किया हुआ पाप इन लिंगों के स्मरण मात्र से मिट जाता है। प्रत्येक ज्योतिर्लिङ्ग का एक एक उपलिंग भी है जिनका वर्णन शिव महापुराण की कोटिरुद्र संहिता के प्रथम अध्याय से प्राप्त होता है, शिवमहापुराण और लिंगपुराण के अनुसार भगवान शंकर जहां जहां स्वयं प्रकट हुए थे। वहां वहां ज्योर्तिलिंग की स्थापना हुई। शिवपुराण और लिंगपुराण में द्वादश ज्योतिर्लिंगों का वर्णन मिलता है।

1- सोमनाथ ज्योतिर्लिंग

·         सोमनाथ ज्योतिर्लिंग भारत का ही नहीं अपितु इस पृथ्वी का पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है। यह मंदिर गुजरात राज्य के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित है। शिवपुराण के अनुसार जब चंद्रमा को दक्ष प्रजापति ने क्षय रोग होने का श्राप दिया था, तब चंद्रमा ने इसी स्थान पर तप कर इस श्राप से मुक्ति पाई थी। ऐसा भी कहा जाता है कि इस शिवलिंग की स्थापना स्वयं चंद्रदेव ने की थी। विदेशी आक्रमणों के कारण यह 17 बार नष्ट हो चुका है। हर बार यह बिगड़ता और बनता रहा है।

 

 

 

2 - मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग

·         यह ज्योतिर्लिंग आन्ध्र प्रदेश में कृष्णा नदी के तट पर श्रीशैल नाम के पर्वत पर स्थित है। इस मंदिर का महत्व भगवान शिव के कैलाश पर्वत के समान कहा गया है। अनेक धार्मिक शास्त्र इसके धार्मिक और पौराणिक महत्व की व्याख्या करते हैं। कहते हैं कि इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने मात्र से ही व्यक्ति को उसके सभी पापों से मुक्ति मिलती है। एक पौराणिक कथा के अनुसार जहां पर यह ज्योतिर्लिंग है, उस पर्वत पर आकर शिव का पूजन करने से व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होते हैं।

 

                                      3- महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग

·         यह ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश की धार्मिक राजधानी कही जाने वाली उज्जैन नगरी में स्थित है। महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की विशेषता है कि ये एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है। यहां प्रतिदिन सुबह की जाने वाली भस्मारती विश्व भर में प्रसिद्ध है। महाकालेश्वर की पूजा विशेष रूप से आयु वृद्धि और आयु पर आए हुए संकट को टालने के लिए की जाती है। उज्जैन वासी मानते हैं कि भगवान महाकालेश्वर ही उनके राजा हैं और वे ही उज्जैन की रक्षा कर रहे हैं।

 

4 - ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग

·         ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध शहर इंदौर के समीप स्थित है। जिस स्थान पर यह ज्योतिर्लिंग स्थित है, उस स्थान पर नर्मदा नदी बहती है और पहाड़ी के चारों ओर नदी बहने से यहां ऊं का आकार बनता है। ऊं शब्द की उत्पति ब्रह्मा के मुख से हुई है। इसलिए किसी भी धार्मिक शास्त्र या वेदों का पाठ ऊं के साथ ही किया जाता है। यह ज्योतिर्लिंग औंकार अर्थात ऊं का आकार लिए हुए है, इस कारण इसे ओंकारेश्वर नाम से जाना जाता है।

5 - केदारनाथ ज्योतिर्लिंग

·         केदारनाथ स्थित ज्योतिर्लिंग भी भगवान शिव के 12 प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में आता है। यह उत्तराखंड में स्थित है। बाबा केदारनाथ का मंदिर बद्रीनाथ के मार्ग में स्थित है। केदारनाथ समुद्र तल से 3584 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। केदारनाथ का वर्णन स्कन्द पुराण एवं शिव पुराण में भी मिलता है। यह तीर्थ भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। जिस प्रकार कैलाश का महत्व है उसी प्रकार का महत्व शिव जी ने केदार क्षेत्र को भी दिया है।

 

6 - भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग

·         भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के पूणे जिले में सह्याद्रि नामक पर्वत पर स्थित है। भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग को मोटेश्वर महादेव के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर के विषय में मान्यता है कि जो भक्त श्रृद्धा से इस मंदिर के प्रतिदिन सुबह सूर्य निकलने के बाद दर्शन करता है, उसके सात जन्मों के पाप दूर हो जाते हैं तथा उसके लिए स्वर्ग के मार्ग खुल जाते हैं।

7 - काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग

·         विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह उत्तर प्रदेश के काशी नामक स्थान पर स्थित है। काशी सभी धर्म स्थलों में सबसे अधिक महत्व रखती है। इसलिए सभी धर्म स्थलों में काशी का अत्यधिक महत्व कहा गया है। इस स्थान की मान्यता है, कि प्रलय आने पर भी यह स्थान बना रहेगा। इसकी रक्षा के लिए भगवान शिव इस स्थान को अपने त्रिशूल पर धारण कर लेंगे और प्रलय के टल जाने पर काशी को उसके स्थान पर पुन: रख देंगे।

 

8 - त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग

·         यह ज्योतिर्लिंग गोदावरी नदी के करीब महाराष्ट्र राज्य के नासिक जिले में स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग के सबसे अधिक निकट ब्रह्मागिरि नाम का पर्वत है। इसी पर्वत से गोदावरी नदी शुरूहोती है। भगवान शिव का एक नाम त्र्यंबकेश्वर भी है। कहा जाता है कि भगवान शिव को गौतम ऋषि और गोदावरी नदी के आग्रह पर यहां ज्योतिर्लिंग रूप में रहना पड़ा।

 


9 - वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग

·         श्री वैद्यनाथ शिवलिंग का समस्त ज्योतिर्लिंगों की गणना में नौवां स्थान बताया गया है। भगवान श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का मन्दिर जिस स्थान पर अवस्थित है, उसे वैद्यनाथ धाम कहा जाता है। यह स्थान झारखण्ड प्रान्त, पूर्व में बिहार प्रान्त के संथाल परगना के दुमका नामक जनपद में पड़ता है।

 

10 - नागेश्वर ज्योतिर्लिंग

·         यह ज्योतिर्लिंग गुजरात के बाहरी क्षेत्र में द्वारिका स्थान में स्थित है। धर्म शास्त्रों में भगवान शिव नागों के देवता है और नागेश्वर का पूर्ण अर्थ नागों का ईश्वर है। भगवान शिव का एक अन्य नाम नागेश्वर भी है। द्वारका पुरी से भी नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की दूरी 17 मील की है। इस ज्योतिर्लिंग की महिमा में कहा गया है कि जो व्यक्ति पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ यहां दर्शनों के लिए आता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।

 

11- रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग

·         यह ज्योतिर्लिंग तमिलनाडु राज्य के रामनाथ पुरं नामक स्थान में स्थित है। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक होने के साथ-साथ यह स्थान हिंदुओं के चार धामों में से एक भी है। इस ज्योतिर्लिंग के विषय में यह मान्यता है, कि इसकी स्थापना स्वयं भगवान श्रीराम ने की थी। भगवान राम के द्वारा स्थापित होने के कारण ही इस ज्योतिर्लिंग को भगवान राम का नाम रामेश्वरम दिया गया है।

 

12 - घृष्णेश्वर मन्दिर ज्योतिर्लिंग

·         घृष्णेश्वर महादेव का प्रसिद्ध मंदिर महाराष्ट्र के संभाजीनगर के समीप दौलताबाद के पास स्थित है। इसे घृसणेश्वर या घुश्मेश्वर के नाम से भी जाना जाता है। दूर-दूर से लोग यहां दर्शन के लिए आते हैं और आत्मिक शांति प्राप्त करते हैं। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से यह अंतिम ज्योतिर्लिंग है। बौद्ध भिक्षुओं द्वारा निर्मित एलोरा की प्रसिद्ध गुफाएं इस मंदिर के समीप स्थित हैं। यहीं पर श्री एकनाथजी गुरु व श्री जनार्दन महाराज की समाधि भी है।

Tuesday, June 27, 2023

भरतनाट्यम

 

भरतनाट्यम, जिसे पहले सधीर अट्टम भी कहा जाता था, भारतीय शास्त्रीय नृत्य का एक प्रमुख रूप है जिसकी उत्पत्ति तमिलनाडु में हुई थी। यह प्राचीन काल से दक्षिणी भारत के मंदिरों और दरबारों में फला-फूला है। यह भारतीय शास्त्रीय नृत्य के मान्यता प्राप्त आठ रूपों में से एक है और यह दक्षिण भारतीय धार्मिक विषयों और आध्यात्मिक विचारों को व्यक्त करता है। विशेष रूप से शैव धर्म, वैष्णववाद और शक्तिवाद। मूर्तिकला और साहित्यिक साक्ष्य इंगित करते हैं कि भरतनाट्यम नृत्य, जो कि नाट्य शास्त्र पर आधारित है, पूरे भारत में मंदिर में पूजा के दौरान किया जाता था। बार-बार विदेशी आक्रमणों के कारण उत्तर में इस मूल शास्त्रीय नृत्य की परंपरा क्षतिग्रस्‍त हो गई और मिश्रित नृत्य रूपों ने इसे बदल दिया। सौभाग्य से, यह नृत्य परंपरा दक्षिण भारत में बनी रही, जहां इसे राजाओं द्वारा संरक्षण दिया गया और देवदासी प्रणाली द्वारा बनाए रखा गया।हम यह नहीं कह सकते कि भरतनाट्यम की परंपरा नाट्य शास्त्र के समय से या उससे पहले की शताब्‍दी से स्थिर है। यह धीरे धीरे विकसित हुई है और इस नृत्य के तत्वों में क्षेत्रीय विविधताएँ शामिल हैं। इस विकास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर भरतनाट्यम पाठ के वर्तमान स्वरूप का विकास था। यह 18 वीं शताब्दी के अंत में चार भाइयों के हाथों से हुआ, जिन्हें तंजावुर चौकड़ी के नाम से जाना जाता है। वे नट्टुवनार सुब्बारायण के चार पुत्र थे: चिन्नय्या, पोन्नय्या, वादिवेलु और शिवानंदम। उन्होंने भरतनाट्यम के संगीत को भी परिष्कृत किया, निस्संदेह उनके संगीत गुरु, महान संगीतकार मुथुस्वामी दीक्षितर से प्रभावित थे। इन घटनाओं ने सधीर को आज भरतनाट्यम के अग्रदूत के रूप में आकार दिया। ब्रिटिश (British) शासन के तहत, विभिन्‍न भारतीय कलाओं के विरूद्ध प्रचार किए गए, इसे क्रूड, अनैतिक और पश्चिमी सभ्यता की अवधारणाओं से नीचे प्रस्तुत किया गया। यह प्रभाव मंदिर में अनुष्ठानिक नृत्यों के लिए शाही दरबारों के संरक्षण को रोकने और शिक्षित भारतीयों को उनकी परंपराओं से दूर करने के लिए पर्याप्त था। आगे चलकर देवदासी प्रथा का पतन हो गया। इसने बदले में एक समुदाय के रूप में देवदासियों की प्रतिष्ठा को कम कर दिया। यहां तक कि जिन शब्दों से नृत्य को जाना जाता था - सदिर, नौच, दासी अट्टम, इत्यादि - अब अपमानजनक अर्थ बन गए।19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में, पश्चिमी प्रभाव के तहत समाज सुधारकों ने इन परिस्थितियों का फायदा उठाया, कला के लिए एक एंटी-नच (Anti-Nautch) अभियान शुरू किया, इसकी एक सामाजिक बुराई के रूप में निंदा की।20वीं शताब्दी की पहली तिमाही तक, दक्षिण भारत के शास्त्रीय नृत्य का लगभग सफाया हो गया था, यहां तक कि तमिलनाडु में भी। तमाम बाधाओं के बावजूद, कुछ परिवारों ने इस नृत्य परंपरा के ज्ञान को संरक्षित रखा। इसके पुनरुद्धार में अलग-अलग पृष्ठभूमि के व्यक्ति शामिल थे: भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, भारतीय कला में रुचि रखने वाले पश्चिमी लोग, देवदासी वर्ग के बाहर के लोग जिन्होंने भरतनाट्यम सीखा, और स्वयं देवदासी। आज शास्त्रीय भारतीय नृत्य के साथ काम करने वाला प्रत्येक व्यक्ति इन व्यक्तियों के प्रति कृतज्ञता का ऋणी है, जिनके प्रयासों के बिना भरतनाट्यम कहीं खो गया होता।भरतनाट्यम अब सम्मानित ब्राह्मण परिवारों के युवा कलाकारों को आकर्षित कर रहा था। शुरुआत में झटके लगे, उनकी भागीदारी ने अंततः कला को पुनर्जीवित करने के पक्ष में जनमत को स्थानांतरित करने में मदद की। ऐसी दो महिलाएं थीं मायलापुर की कलानिधि नारायणन और अडयार की रुक्मिणी देवी।

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