संस्कृत सभी के मन-मस्तिष्क को संस्कारित (परिष्कृत) करने वाली है। संस्कृत सभी की वाणी (बोलचाल) को शुद्ध और परिष्कृत करने वाली है। संस्कृत सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने वाली है। संस्कृत सद्गुणों के समूह को एकत्रित और जोड़ने वाली है।
भावार्थ
यह श्लोक बताता है कि संस्कृत बुद्धि और वाणी दोनों को परिष्कृत करती है। यह मनुष्य को सत्य मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है तथा उसके जीवन में सद्गुणों का विकास करती है।
श्लोक 3 — हिन्दी अनुवाद
मूल श्लोक
विश्वबन्धुत्वविस्तारकं संस्कृतम्
सर्वभूतैकताकारकं संस्कृतम्।
सर्वतः शान्तिसंस्थापकं संस्कृतम्
पञ्चशीलप्रतिष्ठापकं संस्कृतम्॥ 3 ॥
हिन्दी अनुवाद
संस्कृत विश्व-बन्धुत्व (पूरे विश्व में भाईचारे) का विस्तार करने वाली है। संस्कृत सभी प्राणियों में एकता की भावना उत्पन्न करने वाली है। संस्कृत सर्वत्र शान्ति की स्थापना करने वाली है। संस्कृत पञ्चशील (पाँच नैतिक नियमों) को प्रतिष्ठित करने वाली है।
भावार्थ
संस्कृत सम्पूर्ण विश्व में भाईचारे का संदेश फैलाती है। यह सभी जीवों में एकता की भावना उत्पन्न करती है, शान्ति स्थापित करती है और नैतिक मूल्यों को दृढ़ बनाती है।
कठिन शब्द
- विश्वबन्धुत्व — पूरे विश्व के साथ भाईचारे का सम्बन्ध।
- सर्वभूत — सभी प्राणी, सभी जीव।
- पञ्चशील — पाँच नैतिक नियम।
श्लोक 4 — हिन्दी अनुवाद
मूल श्लोक
त्यागसन्तोषसेवाव्रतं संस्कृतम्
विश्वकल्याणनिष्ठायुतं संस्कृतम्।
ज्ञानविज्ञानसम्मेलनं संस्कृतम्
भक्तिमुक्तिद्वयोद्वेलनं संस्कृतम्॥ 4 ॥
हिन्दी अनुवाद
संस्कृत त्याग, सन्तोष और सेवा के व्रत (संकल्प) का साकार रूप है। संस्कृत विश्व के कल्याण के प्रति निष्ठा से युक्त है। संस्कृत ज्ञान और विज्ञान दोनों का संगम है। संस्कृत भक्ति और मुक्ति दोनों का उत्थान करने वाली है।
भावार्थ
यह श्लोक संस्कृत को त्याग, सेवा और सन्तोष की प्रेरक भाषा बताता है। इसमें ज्ञान और विज्ञान का अद्भुत समन्वय है तथा यह भक्ति और मोक्ष के मार्ग को प्रशस्त करती है।
श्लोक 5 — हिन्दी अनुवाद
मूल श्लोक
धर्मकामार्थमोक्षप्रदं संस्कृतम्
ऐहिकामुष्मिकोत्कर्षदं संस्कृतम्।
कर्मदं ज्ञानदं भक्तिदं संस्कृतम्
सत्यनिष्ठं शिवं सुन्दरं संस्कृतम्॥ 5 ॥
हिन्दी अनुवाद
संस्कृत धर्म, काम, अर्थ और मोक्ष — चारों पुरुषार्थों को प्रदान करने वाली है। संस्कृत इस लोक और परलोक दोनों में उन्नति प्रदान करने वाली है। संस्कृत कर्म, ज्ञान और भक्ति देने वाली है। संस्कृत सत्यनिष्ठ, कल्याणकारी और सुन्दर है।
भावार्थ
कवि कहता है कि संस्कृत जीवन के चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करती है। यह इस लोक और परलोक दोनों में उन्नति दिलाती है तथा कर्म, ज्ञान और भक्ति का मार्ग दिखाती है।
कठिन शब्द
- ऐहिकम् — इस संसार से सम्बन्धित।
- आमुष्मिकम् — परलोक से सम्बन्धित।
- उत्कर्षदम् — उन्नति प्रदान करने वाला।
- चतुर्वर्ग — धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।
श्लोक 6 — हिन्दी अनुवाद
मूल श्लोक
शब्दलालित्यलीलावनं संस्कृतम्
चारुमाधुर्यधारागृहं संस्कृतम्।
विश्वचेतश्चमत्कारकं संस्कृतम्
पूर्वजानां यशः स्मारकं संस्कृतम्॥ 6 ॥
हिन्दी अनुवाद
संस्कृत शब्दों की लालित्य (सौन्दर्य) का क्रीड़ावन (उद्यान) है। संस्कृत मनोहर माधुर्य (मिठास) की अविरल धारा का घर है। संस्कृत समस्त विश्व के मन-चित्त को चमत्कृत करने वाली है। संस्कृत हमारे पूर्वजों के यश (कीर्ति) का स्मारक है।
भावार्थ
इस श्लोक में संस्कृत की साहित्यिक और सौन्दर्यपरक महिमा का वर्णन किया गया है। यह शब्दों की मधुरता और सौन्दर्य का भण्डार है। संस्कृत हमारे महान पूर्वजों की कीर्ति का स्मरण कराती है और विश्व को आश्चर्यचकित करती है।
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