Saturday, May 22, 2021

स्वस्तिवाचन (स्वस्तयन) मन्त्र और अर्थ Hindi and English

 स्वस्तिवाचन

स्वस्तिवाचन (स्वस्तयन) मन्त्र और अर्थ--


हमारे देश की यह प्राचीन परंपरा रही है कि जब कभी भी हम कोई कार्य प्रारंभ करते है, तो उस समय मंगल की कामना करते है और सबसे पहले मंगल मूर्ति गणेश की प्रार्थना करते है। 

श्रीगणेश का अर्थ होता है कि जब हम किसी कार्य को आरंभ करते है तो इसी नाम के साथ उस कार्य की शुरुआत करते है। जय गणेश का अर्थ होता है कि अब यह कार्य यहां समाप्त हो रहा है। प्राचीनकाल से ही वैदिक मंत्रों में जितनी ऋचाएं आई है,उनके चिन्तन, वाचन से अलौकिक दिव्य शक्ति की प्राप्ति होती है, मन शान्त होता है। किसी भी शुभ कार्य के प्रारम्भ में, विवाह मण्डप पर , शगुन और तिलक में भी इसकी प्रथा है, या फिर जब कभी भी हम कोई मांगलिक कार्य करते है तो स्वस्तिवाचन की परंपरा रही है। यह एक गहरा विज्ञान है,

हमारा धर्म, हमारी संस्कृति,वैदिक ऋचाएं, वैदिक मंत्र, पुराण उपनिषद आदि इन सभी ग्रन्थों के पीछे एक बहुत बड़ा विज्ञान है। हमारे ऋषियों ने जिन वैदिक ऋचाओं और पुराणों की कल्पना की, उपनिषदों के बारे में सोचा था फिर मांगलिक कार्यो के लिए जैसी व्यवस्था की, वह हमारे विज्ञान से किसी भी तरह से अलग नहीं है। 

मन्त्र-१

आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः।

 देवा नोयथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवेदिवे॥

अर्थ - हमारे पास चारों ओर से ऐंसे कल्याणकारी विचार आते रहें जो किसी से न दबें, उन्हें कहीं से बाधित न किया जा सके एवं अज्ञात विषयों को प्रकट करने वाले हों। प्रगति को न रोकने वाले और सदैव रक्षा में तत्पर देवता प्रतिदिन हमारी वृद्धि के लिए तत्पर रहें।

 मन्त्र-२

देवानां भद्रा सुमतिर्ऋजूयतां देवानां रातिरभि नो नि वर्तताम्।

 देवानां सख्यमुप सेदिमा वयं देवा न आयुः प्र तिरन्तु जीवसे ॥

अर्थ - यजमान की इच्छा रखनेवाले देवताओं की कल्याणकारिणी श्रेष्ठ बुद्धि सदा हमारे सम्मुख रहे, देवताओं का दान हमें प्राप्त हो, हम देवताओं की मित्रता प्राप्त करें, देवता हमारी आयु को जीने के निमित्त बढ़ायें।

मन्त्र-३

तान् पूर्वयानिविदाहूमहे वयंभगं मित्रमदितिं दक्षमस्रिधम्।

अर्यमणंवरुणंसोममश्विना सरस्वती नः सुभगा मयस्करत्।।

अर्थ - हम वेदरुप सनातन वाणी के द्वारा अच्युतरुप भग, मित्र, अदिति, प्रजापति, अर्यमण, वरुण, चन्द्रमा और अश्विनीकुमारों का आवाहन करते हैं। ऐश्वर्यमयी सरस्वती महावाणी हमें सब प्रकार का सुख प्रदान करें।

मन्त्र-४

तन्नो वातो मयोभु वातु भेषजं तन्माता पृथिवी तत् पिता द्यौः।

 तद् ग्रावाणः सोमसुतो मयोभुवस्तदश्विना शृणुतं धिष्ण्या युवम् ॥

अर्थ - वायुदेवता हमें सुखकारी औषधियाँ प्राप्त करायें। माता पृथ्वी और पिता स्वर्ग भी हमें सुखकारी औषधियाँ प्रदान करें। सोम का अभिषव करने वाले सुखदाता ग्रावा उस औषधरुप अदृष्ट को प्रकट करें। हे अश्विनी-कुमारो! आप दोनों सबके आधार हैं, हमारी प्रार्थना सुनिये।

मन्त्र-५

तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियंजिन्वमवसे हूमहे वयम्।

 पूषा नो यथा वेदसामसद् वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये॥

अर्थ - हम स्थावर-जंगम के स्वामी, बुद्धि को सन्तोष देनेवाले रुद्रदेवता का रक्षा के निमित्त आवाहन करते हैं। वैदिक ज्ञान एवं धन की रक्षा करने वाले, पुत्र आदि के पालक, अविनाशी पुष्टि-कर्ता देवता हमारी वृद्धि और कल्याण के निमित्त हों।

मन्त्र-६

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।

 स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥

अर्थ - महती कीर्ति वाले ऐश्वर्यशाली इन्द्र हमारा कल्याण करें, जिसको संसार का विज्ञान और जिसका सब पदार्थों में स्मरण है, सबके पोषणकर्ता वे पूषा (सूर्य) हमारा कल्याण करें। जिनकी चक्रधारा के समान गति को कोई रोक नहीं सकता, वे गरुड़देव हमारा कल्याण करें। वेदवाणी के स्वामी बृहस्पति हमारा कल्याण करें।

मन्त्र-७

पृषदश्वा मरुतः पृश्निमातरः शुभंयावानो विदथेषु जग्मयः।

अग्निजिह्वा मनवः सूरचक्षसो विश्वे नो देवा अवसा गमन्निह ॥

अर्थ - चितकबरे वर्ण के घोड़ों वाले, अदिति माता से उत्पन्न, सबका कल्याण करने वाले, यज्ञआलाओं में जाने वाले, अग्निरुपी जिह्वा वाले, सर्वज्ञ, सूर्यरुप नेत्र वाले मरुद्गण और विश्वेदेव देवता हविरुप अन्न को ग्रहण करने के लिये हमारे इस यज्ञ में आयें।

मन्त्र-८

भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।

स्थिरैरंगैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥

अर्थ - हे यजमान के रक्षक देवताओं! हम दृढ अंगों वाले शरीर से पुत्र आदि के साथ मिलकर आपकी स्तुति करते हुए कानों से कल्याण की बातें सुनें, नेत्रों से कल्याणमयी वस्तुओं को देखें, देवताओं की उपासना-योग्य आयु को प्राप्त करें।

 मन्त्र-९

शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम।

पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः ॥

अर्थ - हे देवताओं! आप सौ वर्ष की आयु-पर्यन्त हमारे समीप रहें, जिस आयु में हमारे शरीर को जरावस्था प्राप्त हो, जिस आयु में हमारे पुत्र पिता अर्थात् पुत्रवान् बन जाएँ, हमारी उस गमनशील आयु को आपलोग बीच में खण्डित न होने दें।

मन्त्र-१०

अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः।

विश्वेदेवा अदितिः पंचजना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम॥

अर्थ - अखण्डित पराशक्ति स्वर्ग है, वही अन्तरिक्ष-रुप है, वही पराशक्ति माता-पिता और पुत्र भी है। समस्त देवता पराशक्ति के ही स्वरुप हैं, अन्त्यज सहित चारों वर्णों के सभी मनुष्य पराशक्तिमय हैं, जो उत्पन्न हो चुका है और जो उत्पन्न होगा, सब पराशक्ति के ही स्वरुप हैं।

मन्त्र-११

ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:, पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:। 

वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:, सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥

 ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥

अर्थ - द्युलोक शान्तिदायक हों, अन्तरिक्ष लोक शान्तिदायक हों, पृथ्वीलोक शान्तिदायक हों। जल, औषधियाँ और वनस्पतियाँ शान्तिदायक हों। सभी देवता, सृष्टि की सभी शक्तियाँ शान्तिदायक हों। ब्रह्म अर्थात महान परमेश्वर हमें शान्ति प्रदान करने वाले हों। उनका दिया हुआ ज्ञान, वेद शान्ति देने वाले हों। सम्पूर्ण चराचर जगत शान्ति पूर्ण हों अर्थात सब जगह शान्ति ही शान्ति हो। ऐसी शान्ति मुझे प्राप्त हो और वह सदा बढ़ती ही रहे। अभिप्राय यह है कि सृष्टि का कण-कण हमें शान्ति प्रदान करने वाला हो। समस्त पर्यावरण ही सुखद व शान्तिप्रद हो।


स्वस्तिवाचनस्वस्तिवाचन (स्वस्तयन) मन्त्र और अर्थ Hindi and English


1. Mantra-1 (मन्त्र-१)

Shanti Patha Mantra in Hindi

Om Aa No Bhadrah Kratavo Yantu Vishvatoadabdhaso Aparitasa Udbhidah।
Deva No Yatha Sadamidvridhe Asannaprayuvo Rakshitaro Dive-Dive॥

मन्त्र अर्थ - हमारे पास चारों ओर से ऐंसे कल्याणकारी विचार आते रहें जो किसी से न दबें, उन्हें कहीं से बाधित न किया जा सके एवं अज्ञात विषयों को प्रकट करने वाले हों। प्रगति को न रोकने वाले और सदैव रक्षा में तत्पर देवता प्रतिदिन हमारी वृद्धि के लिए तत्पर रहें।

Mantra Translation - May powers auspicious come to us from every side, never deceived, unhindered, and victorious. That the Gods ever may be with us for our gain, our guardians day by day unceasing in their care.

2. Mantra-2 (मन्त्र-२)

Shanti Patha Mantra in Hindi

Om Devanam Bhadra Sumatirrijuyatam Devanam Ratirabhi No Nivartatam।
Devanam Sakhyamupasedima Vayam Deva Na Ayuh Pratirantu Jivase॥

मन्त्र अर्थ - यजमान की इच्छा रखनेवाले देवताओं की कल्याणकारिणी श्रेष्ठ बुद्धि सदा हमारे सम्मुख रहे, देवताओं का दान हमें प्राप्त हो, हम देवताओं की मित्रता प्राप्त करें, देवता हमारी आयु को जीने के निमित्त बढ़ायें।

Mantra Translation - May the auspicious favour of the Gods be ours, on us descend the bounty of the righteous Gods. The friendship of the Gods have we devoutly sought, so may the Gods extend our life that we may live.

3. Mantra-3 (मन्त्र-३)

Shanti Patha Mantra in Hindi

Om Tan Purvaya Nivida Humahe Vayam Bhagam Mitramaditindakshamasridham।
Aryamanam Varuna Somamashvina Saraswati Nah Subhagamayaskarat॥

मन्त्र अर्थ - हम वेदरुप सनातन वाणी के द्वारा अच्युतरुप भग, मित्र, अदिति, प्रजापति, अर्यमण, वरुण, चन्द्रमा और अश्विनीकुमारों का आवाहन करते हैं। ऐश्वर्यमयी सरस्वती महावाणी हमें सब प्रकार का सुख प्रदान करें।

Mantra Translation - We call them hither with a hymn of olden time, Bhaga, the friendly Daksha, Mitra, Aditi, Aryaman, Varuna, Soma, the Ashvins. May Saraswati, auspicious, grant felicity.

4. Mantra-4 (मन्त्र-४)

Shanti Patha Mantra in Hindi

Om Tanno Vato Mayo Bhuvatu Bheshajam Tanmata Prithvi Tatpita Dyauh।
Tad Gravanah Soma-Suto Mayobhuvastadashvina Shrinutam Dhishnya Yuvam॥

मन्त्र अर्थ - वायुदेवता हमें सुखकारी औषधियाँ प्राप्त करायें। माता पृथ्वी और पिता स्वर्ग भी हमें सुखकारी औषधियाँ प्रदान करें। सोम का अभिषव करने वाले सुखदाता ग्रावा उस औषधरुप अदृष्ट को प्रकट करें। हे अश्विनी-कुमारो! आप दोनों सबके आधार हैं, हमारी प्रार्थना सुनिये।

Mantra Translation - May Vayu waft to us the felicitous medicament, May Mother Earth, Father Heaven, bring it; May the felicitous Stones distilling Soma secure it. May ye Ashvins with understanding hearken to our prayers.

5. Mantra-5 (मन्त्र-५)

Shanti Patha Mantra in Hindi

Om Tamishanam Jagatah Tasthushaspatim Dhiyanjinvamavase Humahe Vayam।
Pusha No Yatha Vedasamasad Vridhe Rakshita Payuradabdhah Swastaye॥

मन्त्र अर्थ - हम स्थावर-जंगम के स्वामी, बुद्धि को सन्तोष देनेवाले रुद्रदेवता का रक्षा के निमित्त आवाहन करते हैं। वैदिक ज्ञान एवं धन की रक्षा करने वाले, पुत्र आदि के पालक, अविनाशी पुष्टि-कर्ता देवता हमारी वृद्धि और कल्याण के निमित्त हों।

Mantra Translation - We worship Him, the Lord of the universe of the inanimate and animate creation, for, He is the blesser of our intellect and our protector. He dispenses life and good among all. Him do we worship, for as He is our preserver and benefactor, so is He our way to bliss and happiness also.

6. Mantra-6 (मन्त्र-६)

Shanti Patha Mantra in Hindi

Om Swasti Na Indro Vriddhashravah Swasti Nah Pusha Vishva-Vedah।
Swasti Nastarkshyoarishta-Nemih Swasti No Brihaspatirdadhatu॥

मन्त्र अर्थ - महती कीर्ति वाले ऐश्वर्यशाली इन्द्र हमारा कल्याण करें, जिसको संसार का विज्ञान और जिसका सब पदार्थों में स्मरण है, सबके पोषणकर्ता वे पूषा (सूर्य) हमारा कल्याण करें। जिनकी चक्रधारा के समान गति को कोई रोक नहीं सकता, वे गरुड़देव हमारा कल्याण करें। वेदवाणी के स्वामी बृहस्पति हमारा कल्याण करें।


Mantra Translation - May Indra who is provided with great speed do well to us, May Pushan who is knower of world do good to us and May Tarkshya who devastates enemies do good to us! May Brihaspati, the Lord of the Vedic knowledge or speech give us spiritual delight got from the light of knowledge and wisdom.

7. Mantra-7 (मन्त्र-७)

Shanti Patha Mantra in Hindi

Om Prishadashva Marutah Prishnimatarah Shubham Yavano Vidatheshu Jagmayah।
Agni-Jihva Manavah Sura-Chakshaso Vishve No Devavasa Gamanniha॥

मन्त्र अर्थ - चितकबरे वर्ण के घोड़ों वाले, अदिति माता से उत्पन्न, सबका कल्याण करने वाले, यज्ञआलाओं में जाने वाले, अग्निरुपी जिह्वा वाले, सर्वज्ञ, सूर्यरुप नेत्र वाले मरुद्गण और विश्वेदेव देवता हविरुप अन्न को ग्रहण करने के लिये हमारे इस यज्ञ में आयें।

Mantra Translation - The Maruts, sons of Prishni, with spotted steeds, of happy gait, frequenters of sacrifices, the Gods whose tongue is Agni, knowers, radiant as the Sun, May all come hither for our protection.

8. Mantra-8 (मन्त्र-८)

Shanti Patha Mantra in Hindi

Om Bhadram Karnebhih Shrinuyama Deva Bhadram Pashyemakshabhiryajatrah।
Sthirairangaistushtuva Sastanubhirvyashemahi Deva-Hitam Yadayuh॥

मन्त्र अर्थ - हे यजमान के रक्षक देवताओं! हम दृढ अङ्गों वाले शरीर से पुत्र आदि के साथ मिलकर आपकी स्तुति करते हुए कानों से कल्याण की बातें सुनें, नेत्रों से कल्याणमयी वस्तुओं को देखें, देवताओं की उपासना-योग्य आयु को प्राप्त करें।

Mantra Translation - Gods, May we with our ears listen to what is good, and with our eyes see what is good, ye Holy Ones. With firm limbs and bodies, May we extolling you attain the term of life appointed by the Gods.

9. Mantra-9 (मन्त्र-९)

Shanti Patha Mantra in Hindi

Om Shataminnu Sharadoanti Deva Yatra Nashchakrajarasam Tanunam।
Putraso Yatra Pitaro Bhavanti Mano Madhya Ririshatayurganto॥

मन्त्र अर्थ - हे देवताओं! आप सौ वर्ष की आयु-पर्यन्त हमारे समीप रहें, जिस आयु में हमारे शरीर को जरावस्था प्राप्त हो, जिस आयु में हमारे पुत्र पिता अर्थात् पुत्रवान् बन जाएँ, हमारी उस गमनशील आयु को आपलोग बीच में खण्डित न होने दें।


Mantra Translation - A hundred autumns stand before us, O ye Gods, within whose space ye bring our bodies to decay; Within whose space our sons become fathers in turn. Break ye not in the midst our course of fleeting life.

10. Mantra-10 (मन्त्र-१०)

Shanti Patha Mantra in Hindi

Om Aditidyauraditirantarikshamaditih। Mata Sa Pita Sa Putrah।
Vishvedeva Aditih। Pancha-Janah Aditirjatamaditirjanitvam॥

मन्त्र अर्थ - अखण्डित पराशक्ति स्वर्ग है, वही अन्तरिक्ष-रुप है, वही पराशक्ति माता-पिता और पुत्र भी है। समस्त देवता पराशक्ति के ही स्वरुप हैं, अन्त्यज सहित चारों वर्णों के सभी मनुष्य पराशक्तिमय हैं, जो उत्पन्न हो चुका है और जो उत्पन्न होगा, सब पराशक्ति के ही स्वरुप हैं।

Mantra Translation - Aditi is the Heaven, Aditi is mid-air, Aditi is the Mother and the Father and Son. She is all the Gods, She is the five-classed men, Aditi is all that hath been born and shall be born.

11. Mantra-11 (मन्त्र-११)

Shanti Patha Mantra in Hindi

Om Dyauh Shantirantariksha Shantih Prithivi
Shantirapah Shantiroshadhayah Shantih।
Vanaspatayah Shantirvishvedevah Shantirbrahma Shantih
Sarva Shantih Shantireva Shantih Sa Ma Shantiredhi॥

मन्त्र अर्थ - द्युलोक शान्तिदायक हों, अन्तरिक्ष लोक शान्तिदायक हों, पृथ्वीलोक शान्तिदायक हों। जल, औषधियाँ और वनस्पतियाँ शान्तिदायक हों। सभी देवता, सृष्टि की सभी शक्तियाँ शान्तिदायक हों। ब्रह्म अर्थात महान परमेश्वर हमें शान्ति प्रदान करने वाले हों। उनका दिया हुआ ज्ञान, वेद शान्ति देने वाले हों। सम्पूर्ण चराचर जगत शान्ति पूर्ण हों अर्थात सब जगह शान्ति ही शान्ति हो। ऐसी शान्ति मुझे प्राप्त हो और वह सदा बढ़ती ही रहे। अभिप्राय यह है कि सृष्टि का कण-कण हमें शान्ति प्रदान करने वाला हो। समस्त पर्यावरण ही सुखद व शान्तिप्रद हो।

Mantra Translation - May peace radiate there in the whole sky as well as in the vast ethereal space everywhere. May peace reign all over this earth, in water and in all herbs, trees and creepers. May peace flow over the whole universe. May peace be in the supreme being Brahman. And may there always exist in all peace and peace alone.

Saturday, July 11, 2020

संस्कृत में रंगों के नाम


Red - लोहितः, रक्तवर्णः
Green - हरितः, पलाशः
Blue - नीलः
Black - श्यामः, कालः
White - शुक्लः, श्वेतः
Grey - धूसरः, धूषरः
Brown - श्यावः, कपिशः
Pink - पाटलः, श्वेतरक्तः
Yellow - पीतः, हरिद्राभः
Orange - कौसुम्भः, नारङगवर्णः
Crimson - शोणः

Brown - अरुणः


संस्कृत में दिन को क्या कहते है

Sunday : रविवारः (Ravivāraḥ)

Monday : चन्द्रवारः/ सोमवारः (Candravāraḥ/ sōmavāraḥ)
Tuesday : मङ्गलवारः/ भौमवारः (Maṅgalavāraḥ/ bhaumavāraḥ)
Wednesday : बुधवारः (Budhavāraḥ)
Thursday : गुरुवारः (Guruvāraḥ)
Friday : शुक्रवारः (Śukravāraḥ)
Saturday : शनिवारः (Śanivāraḥ)


अद्यः = आज
श्वः = कल (आने वाला)
पराश्वः = परसों (आने वाला)
प्रपराश्वः =
ह्यः (Hyaḥ) = कल (बीता हुआ)Yesterday
पराह्यः (Parāhyaḥ) = परसों (बीता हुआ)Day before yesterday
प्रपराह्यः =
वर्षः / अब्दः (Varṣaḥ/ abdaḥ) = Year
मासः (Māsaḥ) = Month
सप्ता: (Saptā:) = Week
दिवसः/ वारः (Divasaḥ/ vāraḥ) = Day
रात्रिः (Rātriḥ) = Night

Sanskritginti Sanskritsankhya संस्कृतसंख्या



1. One एकम् (ekam)
2.Two द्वे (dve)
3.Three त्रीणि (treeni)
4. Four चत्वारि (chatvaari)
5. Five पञ्च (pancha)
6. Six षट् (shat)
7. Seven सप्त (sapta)
8. Eight अष्ट (ashta)
9. Nine नव (nava)
10. Ten दश (dasha)
11. Elelven एकादश (ekaadasha)
12. Twelve द्वादश (dvaadasha)
13. Thirteen त्रयोदश (trayodasha)
14. Fourteen चतुर्दश (chaturdasha)
15. Fifteen पञ्चदश (panchadasha)
16. Sixteen षोडश (shodash)
17. Seventeen सप्तदश (saptadasha)
18. Eighteen अष्टादश (ashtaadasha)
19. Nineteen नवदश (navadasha)
20. Twenty विंशतिः (vinshatihi)
21. Twenty one एकविंशतिः (ekavimshatihi)
22. Twenty two द्वाविंशतिः (dvaavimshathi)
23. Twenty three त्रयोविंशतिः (trayovimshatihi)
24. Twenty four चतुर्विंशतिः (chaturvimshatihi)
25. Twenty five पञ्चविंशतिः (panchavimshatihi)
26. Twenty six षड्विंशतिः (shadvimshatihi)
27. Twenty seven सप्तविंशतिः (saptavimshatihi)
28. Twenty eight अष्टाविंशतिः (ashtaavimshatihi)
29. Twenty nine नवविंशतिः (navavimshatihi)
30. Thirty त्रिंशत् (trimshat)
31. Thirty one एकत्रिंशत् (ekatrimshat)
32. Thirty two द्वात्रिंशत् (dvaatrimshat)
33. Thirty three त्रयस्त्रिंशत् (trayastrimshat)
34. Thirty four चतुस्त्रिंशत् (chatustrimshat)
35. Thirty five पञ्चत्रिंशत् (panchatrimshat)
36. Thirty six षट्त्रिंशत् (shat-trimshat)
37. Thirty seven सप्तत्रिंशत् (saptatrimshat)
38. Thirty eight अष्टत्रिंशत् (ashtatrimshat)
39. Thirty nine नवत्रिंशत् (navatrimshat)
40. Forty चत्वारिंशत् (chatvaarimshat)
41. Forty one एकचत्वारिंशत् (ekachatvaarimshat)
42. Forty two द्विचत्वारिंशत् (dvichatvaarimshat)
43. Forty three त्रिचत्वारिंशत् (trichatvaarimshat)
44. Forty four चतुश्चत्वारिंशत् (chatushchatvaarimshat)
45. Forty five पञ्चचत्वारिंशत् (panchachatvaarimshat)
46. Forty six षट्चत्वारिंशत् (shatchatvaarimshat)
47. Forty seven सप्तचत्वारिंशत् (saptachatvaarimshat)
48. Forty eight अष्टचत्वारिंशत् (ashtachatvaarimshat)
49. Forty nine नवचत्वारिंशत् (navachatvaarimshat)
50. Fifty पञ्चाशत् (panchaashat)
51. Fifty one एकपञ्चाशत् (ekapanchaashat)
52. Fifty two द्विपञ्चाशत् (dvipanchaashat)
53. Fifty three त्रिपञ्चाशत् (tripanchaashat)
54. Fifty four चतुःपञ्चाशत् (chatuhupanchaashat)
55. Fifty five पञ्चपञ्चाशत् (panchapanchaashat)
56. Fifty six षट्पञ्चाशत् (shatpanchaashat)
57. Fifty seven सप्तपञ्चाशत् (saptapanchaashat)
58. Fifty eight अष्ट्पञ्चाशत् (ashtapanchaashat)
59. Fifty nine नवपञ्चाशत् (navapanchaashat)
60. Sixty षष्टिः (shashtihi)
61. Sixty one एकषष्टिः (ekashashtihi)
62. Sixty two द्विषष्टिः (dvishashtihi)
63. Sixty three त्रिषष्टिः (trishashtihi)
64. Sixty four चतुःषष्टिः (chatuhushashtihi)
65. Sixty five पञ्चषष्टिः (panchashashtihi)
66. Sixty six षट्षष्टिः (shatshashtihi)
67. Sixty seven सप्तषष्टिः (saptashashtihi)
68. Sixty eight अष्टषष्टिः (ashtashashtihi)
69. Sixty nine नवषष्टिः (navashashtihi)
70. Seventy सप्ततिः (saptatihi)
71. Seventy one एकसप्ततिः (ekasaptatihi)
72. Seventy two द्विसप्ततिः (dvisaptatihi)
73. Seventy three त्रिसप्ततिः (trisaptatihi)
74. Seventy four चतुःसप्ततिः (chatuhusaptatihi)
75. Seventy five पञ्चसप्ततिः (panchasaptatihi)
76. Seventy six षट्सप्ततिः (shatsaptatihi)
77. Seventy seven सप्तसप्ततिः (saptasaptatihi)
78. Seventy eight अष्टसप्ततिः (ashtasaptatihi)
79. Seventy nine नवसप्ततिः (navasaptatihi)
80. Eighty अशीतिः (asheetihi)
81. Eighty one एकाशीतिः (ekaasheetihi)
82. Eighty two द्व्यशीतिः (dvyasheetihi)
83. Eighty three त्र्यशीतिः (tryasheetihi)
84. Eighty four चतुरशीतिः (chaturasheetihi)
85. Eighty five पञ्चाशीतिः (panchaasheetihi)
86. Eighty six षडशीतिः (shadasheetihi)
87. Eighty seven सप्ताशीतिः (saptaasheetihi)
88. Eighty eight अष्टाशीतिः (ashtaasheetihi)
89. Eighty nine नवाशीतिः (navaasheetihi)
90. Ninety नवतिः (navatihi)
91. Ninety one एकनवतिः (ekanavatihi)
92. Ninety two द्विनवतिः (dvinavatihi)
93. Ninety three त्रिनवतिः (trinavatihi)
94. Ninety four चतुर्नवतिः (chaturnavatihi)
95. Ninety five पञ्चनवतिः (panchanavatihi)
96. Ninety six षण्णवतिः (shannavatihi)
97. Ninety seven सप्तनवतिः (saptanavatihi)
98. Ninety eight अष्टनवतिः (ashtanavatihi)
99. Ninety nine नवनवतिः (navanavatihi)
100. A hundred शतम् (shatam)
200 - द्विशत or द्वेशते
300 - त्रिशत
400 - चतुःशत
500 - पञ्चशत
600 - षट्शत
700 - सप्तशत 800 - अष्टशत
900 - नवशत
1,000 - सहस्र or दशशत
2,000 - द्विसहस्र
3,000 - त्रिसहस्र
4,000 - चतःसहस्र
5,000 - पञ्चसहस्र
6,000 - षट्सहस्र
7,000 - सप्तसहस्र
8,000 - अष्टसहस्र
9,000 - नवसहस्र
10,000 - अयुत
1,00,000 - लक्ष
10,00,000 - प्रयुत
1,00,00,000 - कोटि
10,00,00,000 - अर्बुद
1,00,00,00,000 - अब्ज
10,00,00,00,000 - खर्व
1,00,00,00,00,000 - निखर्व
10,00,00,00,00,000 - महापद्म
1,00,00,00,00,00,000 - शङ्कु
10,00,00,00,00,00,000 - जलधि
1,00,00,00,00,00,00,000 - अन्त्य
10,00,00,00,00,00,00,000 - मध्य
1,00,00,00,00,00,00,00,000 - परार्ध
==============================
एक-दश-शत सहस्रायुत-लक्ष-प्रयुत-कोटयः क्रमशः |
अर्बुदमब्ज खर्व-निखर्व-महापद्म-शङ्कवस्तस्मात् ||
जलधिश्चान्तं मध्यं परार्धमिति दशगुणोत्राः संज्ञाः |
संख्यायाः स्थानानां व्यवहारार्थं कृताः पूर्वैः ||

Tuesday, March 19, 2019

Gayatri Mantra (गायत्री महामंत्र महिमा)

ॐ भूर्भुवः स्वः ।
तत्स॑वि॒तुर्वरेण्यं॒
भर्गो॑ दे॒वस्य॑धीमहि ।
धियो॒ यो नः॑ प्रचो॒दया॑त् ॥
गायत्री महामंत्र वेदों का एक महत्त्वपूर्ण मंत्र है जिसकी महत्ता ॐ के लगभग बराबर मानी जाती है। यह यजुर्वेद के मन्त्र 'ॐ भूर्भुवः स्वः' और ऋग्वेद के छन्द 3.62.10 के मेल से बना है। इस मंत्र में सवितृ देव की उपासना है इसलिए इसे सावित्री भी कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस मंत्र के उच्चारण और इसे समझने से ईश्वर की प्राप्ति होती है। इसे श्री गायत्री देवी के स्त्री रुप मे भी पुजा जाता है।
'गायत्री' एक छन्द भी है जो ऋग्वेद के सात प्रसिद्ध छंदों में एक है। इन सात छंदों के नाम हैं- गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, विराट, त्रिष्टुप् और जगती। गायत्री छन्द में आठ-आठ अक्षरों के तीन चरण होते हैं। ऋग्वेद के मंत्रों में त्रिष्टुप् को छोड़कर सबसे अधिक संख्या गायत्री छंदों की है। गायत्री के तीन पद होते हैं (त्रिपदा वै गायत्री)। अतएव जब छंद या वाक के रूप में सृष्टि के प्रतीक की कल्पना की जाने लगी तब इस विश्व को त्रिपदा गायत्री का स्वरूप माना गया। जब गायत्री के रूप में जीवन की प्रतीकात्मक व्याख्या होने लगी तब गायत्री छंद की बढ़ती हुई महिता के अनुरूप विशेष मंत्र की रचना हुई, जो इस प्रकार है:
तत् सवितुर्वरेण्यं। भर्गोदेवस्य धीमहि। धियो यो न: प्रचोदयात्। (ऋग्वेद ३,६२,१०)
भावार्थ -
उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अपनी अन्तरात्मा में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।
ॐ = परब्रह्मा का अभिवाच्य शब्द
भूर = मनुष्य को प्राण प्रदाण करने वाला
भुवः = दुख़ों का नाश करने वाला
स्वः = सुख़ प्रदाण करने वाला
तत = वह
सवितुर = सूर्य की भांति उज्जवल
वरेण्यं = सबसे उत्तम
भर्गो- = कर्मों का उद्धार करने वाला
देवस्य- = प्रभु
धीमहि- = आत्म चिंतन के योग्य (ध्यान)
धियो = बुद्धि
यो = जो
नः = हमारी
प्रचो- दयात् = हमें शक्ति दें (प्रार्थना)
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स्रोत - ऋग्वेद मंडल ३ सूक्त ६२ मंत्र १०
यजुर्वेद अध्याय ३ मंत्र ३५ | अध्याय २२ मंत्र ९ | अध्याय ३० मंत्र २ | अध्याय ३६ मंत्र ३
सामवेद उत्तरार्थिक १३.३.३

धातु (पठ्, गम्, नम्, दृश्/पश्य, खाद्, लिख्, वद्, क्रीड्, धाव्, हस्, स्था, पा, दा, नी, भू आदि) के लट्, लङ् और लृट् लकार

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