Wednesday, November 21, 2018

पुनर्जन्म से सम्बंधित चालीस प्रश्नों को उत्तर सहित पढ़े?????

पुनर्जन्म से सम्बंधित चालीस प्रश्नों को उत्तर सहित पढ़े?????

(1) प्रश्न :- पुनर्जन्म किसको कहते हैं ?

उत्तर :- जब जीवात्मा एक शरीर का त्याग करके किसी दूसरे शरीर में जाती है तो इस बार बार जन्म लेने की क्रिया को पुनर्जन्म कहते हैं ।

(2) प्रश्न :- पुनर्जन्म क्यों होता है ?

उत्तर :- जब एक जन्म के अच्छे बुरे कर्मों के फल अधुरे रह जाते हैं तो उनको भोगने के लिए दूसरे जन्म आवश्यक हैं ।

(3) प्रश्न :- अच्छे बुरे कर्मों का फल एक ही जन्म में क्यों नहीं मिल जाता ? एक में ही सब निपट जाये तो कितना अच्छा हो ?

उत्तर :- नहीं जब एक जन्म में कर्मों का फल शेष रह जाए तो उसे भोगने के लिए दूसरे जन्म अपेक्षित होते हैं ।

(4) प्रश्न :- पुनर्जन्म को कैसे समझा जा सकता है ?

उत्तर :- पुनर्जन्म को समझने के लिए जीवन और मृत्यु को समझना आवश्यक है । और जीवन मृत्यु को समझने के लिए शरीर को समझना आवश्यक है ।

(5) प्रश्न :- शरीर के बारे में समझाएँ ?

उत्तर :- हमारे शरीर को निर्माण प्रकृति से हुआ है ।
जिसमें मूल प्रकृति ( सत्व रजस और तमस ) से प्रथम बुद्धि तत्व का निर्माण हुआ है ।
बुद्धि से अहंकार ( बुद्धि का आभामण्डल ) ।
अहंकार से पांच ज्ञानेन्द्रियाँ ( चक्षु, जिह्वा, नासिका, त्वचा, श्रोत्र ), मन ।
पांच कर्मेन्द्रियाँ ( हस्त, पाद, उपस्थ, पायु, वाक् ) ।

शरीर की रचना को दो भागों में बाँटा जाता है ( सूक्ष्म शरीर और स्थूल शरीर ) ।

(6) प्रश्न :- सूक्ष्म शरीर किसको बोलते हैं ?

उत्तर :- सूक्ष्म शरीर में बुद्धि, अहंकार, मन, ज्ञानेन्द्रियाँ । ये सूक्ष्म शरीर आत्मा को सृष्टि के आरम्भ में जो मिलता है वही एक ही सूक्ष्म शरीर सृष्टि के अंत तक उस आत्मा के साथ पूरे एक सृष्टि काल ( ४३२००००००० वर्ष ) तक चलता है । और यदि बीच में ही किसी जन्म में कहीं आत्मा का मोक्ष हो जाए तो ये सूक्ष्म शरीर भी प्रकृति में वहीं लीन हो जायेगा ।

(7) प्रश्न :- स्थूल शरीर किसको कहते हैं ?

उत्तर :- पंच कर्मेन्द्रियाँ ( हस्त, पाद, उपस्थ, पायु, वाक् ) , ये समस्त पंचभौतिक बाहरी शरीर ।

(8) प्रश्न :- जन्म क्या होता है ?

उत्तर :- जीवात्मा का अपने करणों ( सूक्ष्म शरीर ) के साथ किसी पंचभौतिक शरीर में आ जाना ही जन्म कहलाता है ।

(9) प्रश्न :- मृत्यु क्या होती है ?

उत्तर :- जब जीवात्मा का अपने पंचभौतिक स्थूल शरीर से वियोग हो जाता है, तो उसे ही मृत्यु कहा जाता है । परन्तु मृत्यु केवल सथूल शरीर की होती है , सूक्ष्म शरीर की नहीं । सूक्ष्म शरीर भी छूट गया तो वह मोक्ष कहलाएगा मृत्यु नहीं । मृत्यु केवल शरीर बदलने की प्रक्रिया है, जैसे मनुष्य कपड़े बदलता है । वैसे ही आत्मा शरीर भी बदलता है ।

(10) प्रश्न :- मृत्यु होती ही क्यों है ?

उत्तर :- जैसे किसी एक वस्तु का निरन्तर प्रयोग करते रहने से उस वस्तु का सामर्थ्य घट जाता है, और उस वस्तु को बदलना आवश्यक हो जाता है, ठीक वैसे ही एक शरीर का सामर्थ्य भी घट जाता है और इन्द्रियाँ निर्बल हो जाती हैं । जिस कारण उस शरीर को बदलने की प्रक्रिया का नाम ही मृत्यु है ।

(11) प्रश्न :- मृत्यु न होती तो क्या होता ?

उत्तर :- तो बहुत अव्यवस्था होती । पृथ्वी की जनसंख्या बहुत बढ़ जाती । और यहाँ पैर धरने का भी स्थान न होता ।

(12) प्रश्न :- क्या मृत्यु होना बुरी बात है ?

उत्तर :- नहीं, मृत्यु होना कोई बुरी बात नहीं ये तो एक प्रक्रिया है शरीर परिवर्तन की ।

(13) प्रश्न :- यदि मृत्यु होना बुरी बात नहीं है तो लोग इससे इतना डरते क्यों हैं ?

उत्तर :- क्योंकि उनको मृत्यु के वैज्ञानिक स्वरूप की जानकारी नहीं है । वे अज्ञानी हैं । वे समझते हैं कि मृत्यु के समय बहुत कष्ट होता है । उन्होंने वेद, उपनिषद, या दर्शन को कभी पढ़ा नहीं वे ही अंधकार में पड़ते हैं और मृत्यु से पहले कई बार मरते हैं ।

(14) प्रश्न :- तो मृत्यु के समय कैसा लगता है ? थोड़ा सा तो बतायें ?

उत्तर :- जब आप बिस्तर में लेटे लेटे नींद में जाने लगते हैं तो आपको कैसा लगता है ?? ठीक वैसा ही मृत्यु की अवस्था में जाने में लगता है उसके बाद कुछ अनुभव नहीं होता । जब आपकी मृत्यु किसी हादसे से होती है तो उस समय आमको मूर्छा आने लगती है, आप ज्ञान शून्य होने लगते हैं जिससे की आपको कोई पीड़ा न हो । तो यही ईश्वर की सबसे बड़ी कृपा है कि मृत्यु के समय मनुष्य ज्ञान शून्य होने लगता है और सुषुुप्तावस्था में जाने लगता है ।

(15) प्रश्न :- मृत्यु के डर को दूर करने के लिए क्या करें ?

उत्तर :- जब आप वैदिक आर्ष ग्रन्थ ( उपनिषद, दर्शन आदि ) का गम्भीरता से अध्ययन करके जीवन,मृत्यु, शरीर, आदि के विज्ञान को जानेंगे तो आपके अन्दर का, मृत्यु के प्रति भय मिटता चला जायेगा और दूसरा ये की योग मार्ग पर चलें तो स्वंय ही आपका अज्ञान कमतर होता जायेगा और मृत्यु भय दूर हो जायेगा । आप निडर हो जायेंगे । जैसे हमारे बलिदानियों की गाथायें आपने सुनी होंगी जो राष्ट्र की रक्षा के लिये बलिदान हो गये । तो आपको क्या लगता है कि क्या वो ऐसे ही एक दिन में बलिदान देने को तैय्यार हो गये थे ? नहीं उन्होने भी योगदर्शन, गीता, साँख्य, उपनिषद, वेद आदि पढ़कर ही निर्भयता को प्राप्त किया था । योग मार्ग को जीया था, अज्ञानता का नाश किया था ।

महाभारत के युद्ध में भी जब अर्जुन भीष्म, द्रोणादिकों की मृत्यु के भय से युद्ध की मंशा को त्याग बैठा था तो योगेश्वर कृष्ण ने भी तो अर्जुन को इसी सांख्य, योग, निष्काम कर्मों के सिद्धान्त के माध्यम से जीवन मृत्यु का ही तो रहस्य समझाया था और यह बताया कि शरीर तो मरणधर्मा है ही तो उसी शरीर विज्ञान को जानकर ही अर्जुन भयमुक्त हुआ । तो इसी कारण तो वेदादि ग्रन्थों का स्वाध्याय करने वाल मनुष्य ही राष्ट्र के लिए अपना शीश कटा सकता है, वह मृत्यु से भयभीत नहीं होता , प्रसन्नता पूर्वक मृत्यु को आलिंगन करता है ।

(16) प्रश्न :- किन किन कारणों से पुनर्जन्म होता है ?

उत्तर :- आत्मा का स्वभाव है कर्म करना, किसी भी क्षण आत्मा कर्म किए बिना रह ही नहीं सकता । वे कर्म अच्छे करे या फिर बुरे, ये उसपर निर्भर है, पर कर्म करेगा अवश्य । तो ये कर्मों के कारण ही आत्मा का पुनर्जन्म होता है । पुनर्जन्म के लिए आत्मा सर्वथा ईश्वराधीन है ।

(17) प्रश्न :- पुनर्जन्म कब कब नहीं होता ?

उत्तर :- जब आत्मा का मोक्ष हो जाता है तब पुनर्जन्म नहीं होता है ।

(18) प्रश्न :- मोक्ष होने पर पुनर्जन्म क्यों नहीं होता ?

उत्तर :- क्योंकि मोक्ष होने पर स्थूल शरीर तो पंचतत्वों में लीन हो ही जाता है, पर सूक्ष्म शरीर जो आत्मा के सबसे निकट होता है, वह भी अपने मूल कारण प्रकृति में लीन हो जाता है ।

(19) प्रश्न :- मोक्ष के बाद क्या कभी भी आत्मा का पुनर्जन्म नहीं होता ?

उत्तर :- मोक्ष की अवधि तक आत्मा का पुनर्जन्म नहीं होता । उसके बाद होता है ।

(20) प्रश्न :- लेकिन मोक्ष तो सदा के लिए होता है, तो फिर मोक्ष की एक निश्चित अवधि कैसे हो सकती है ?

उत्तर :- सीमित कर्मों का कभी असीमित फल नहीं होता । यौगिक दिव्य कर्मों का फल हमें ईश्वरीय आनन्द के रूप में मिलता है, और जब ये मोक्ष की अवधि समाप्त होती है तो दुबारा से ये आत्मा शरीर धारण करती है ।

(21) प्रश्न :- मोक्ष की अवधि कब तक होती है ?

उत्तर :- मोक्ष का समय ३१ नील १० खरब ४० अरब वर्ष है, जब तक आत्मा मुक्त अवस्था में रहती है ।

(22) प्रश्न :- मोक्ष की अवस्था में स्थूल शरीर या सूक्ष्म शरीर आत्मा के साथ रहता है या नहीं ?

उत्तर :- नहीं मोक्ष की अवस्था में आत्मा पूरे ब्रह्माण्ड का चक्कर लगाता रहता है और ईश्वर के आनन्द में रहता है, बिलकुल ठीक वैसे ही जैसे कि मछली पूरे समुद्र में रहती है । और जीव को किसी भी शरीर की आवश्यक्ता ही नहीं होती।

(23) प्रश्न :- मोक्ष के बाद आत्मा को शरीर कैसे प्राप्त होता है ?

उत्तर :- सबसे पहला तो आत्मा को कल्प के आरम्भ ( सृष्टि आरम्भ ) में सूक्ष्म शरीर मिलता है फिर ईश्वरीय मार्ग और औषधियों की सहायता से प्रथम रूप में अमैथुनी जीव शरीर मिलता है, वो शरीर सर्वश्रेष्ठ मनुष्य या विद्वान का होता है जो कि मोक्ष रूपी पुण्य को भोगने के बाद आत्मा को मिला है । जैसे इस वाली सृष्टि के आरम्भ में चारों ऋषि विद्वान ( वायु , आदित्य, अग्नि , अंगिरा ) को मिला जिनको वेद के ज्ञान से ईश्वर ने अलंकारित किया । क्योंकि ये ही वो पुण्य आत्मायें थीं जो मोक्ष की अवधि पूरी करके आई थीं ।

(24) प्रश्न :- मोक्ष की अवधि पूरी करके आत्मा को मनुष्य शरीर ही मिलता है या जानवर का ?

उत्तर :- मनुष्य शरीर ही मिलता है ।

(25) प्रश्न :- क्यों केवल मनुष्य का ही शरीर क्यों मिलता है ? जानवर का क्यों नहीं ?

उत्तर :- क्योंकि मोक्ष को भोगने के बाद पुण्य कर्मों को तो भोग लिया , और इस मोक्ष की अवधि में पाप कोई किया ही नहीं तो फिर जानवर बनना सम्भव ही नहीं , तो रहा केवल मनुष्य जन्म जो कि कर्म शून्य आत्मा को मिल जाता है ।

(26) प्रश्न :- मोक्ष होने से पुनर्जन्म क्यों बन्द हो जाता है ?

उत्तर :- क्योंकि योगाभ्यास आदि साधनों से जितने भी पूर्व कर्म होते हैं ( अच्छे या बुरे ) वे सब कट जाते हैं । तो ये कर्म ही तो पुनर्जन्म का कारण हैं, कर्म ही न रहे तो पुनर्जन्म क्यों होगा ??

(27) प्रश्न :- पुनर्जन्म से छूटने का उपाय क्या है ?

उत्तर :- पुनर्जन्म से छूटने का उपाय है योग मार्ग से मुक्ति या मोक्ष का प्राप्त करना ।

(28) प्रश्न :- पुनर्जन्म में शरीर किस आधार पर मिलता है ?

उत्तर :- जिस प्रकार के कर्म आपने एक जन्म में किए हैं उन कर्मों के आधार पर ही आपको पुनर्जन्म में शरीर मिलेगा ।

(29) प्रश्न :- कर्म कितने प्रकार के होते हैं ?

उत्तर :- मुख्य रूप से कर्मों को तीन भागों में बाँटा गया है :- सात्विक कर्म , राजसिक कर्म , तामसिक कर्म ।

(१) सात्विक कर्म :- सत्यभाषण, विद्याध्ययन, परोपकार, दान, दया, सेवा आदि ।

(२) राजसिक कर्म :- मिथ्याभाषण, क्रीडा, स्वाद लोलुपता, स्त्रीआकर्षण, चलचित्र आदि ।

(३) तामसिक कर्म :- चोरी, जारी, जूआ, ठग्गी, लूट मार, अधिकार हनन आदि ।

और जो कर्म इन तीनों से बाहर हैं वे दिव्य कर्म कलाते हैं, जो कि ऋषियों और योगियों द्वारा किए जाते हैं । इसी कारण उनको हम तीनों गुणों से परे मानते हैं । जो कि ईश्वर के निकट होते हैं और दिव्य कर्म ही करते हैं ।

(30) प्रश्न :- किस प्रकार के कर्म करने से मनुष्य योनि प्राप्त होती है ?

उत्तर :- सात्विक और राजसिक कर्मों के मिलेजुले प्रभाव से मानव देह मिलती है , यदि सात्विक कर्म बहुत कम है और राजसिक अधिक तो मानव शरीर तो प्राप्त होगा परन्तु किसी नीच कुल में , यदि सात्विक गुणों का अनुपात बढ़ता जाएगा तो मानव कुल उच्च ही होता जायेगा । जिसने अत्यधिक सात्विक कर्म किए होंगे वो विद्वान मनुष्य के घर ही जन्म लेगा ।

(31) प्रश्न :- किस प्रकार के कर्म करने से आत्मा जीव जन्तुओं के शरीर को प्राप्त होता है ?

उत्तर :- तामसिक और राजसिक कर्मों के फलरूप जानवर शरीर आत्मा को मिलता है । जितना तामसिक कर्म अधिक किए होंगे उतनी ही नीच योनि उस आत्मा को प्राप्त होती चली जाती है । जैसे लड़ाई स्वभाव वाले , माँस खाने वाले को कुत्ता, गीदड़, सिंह, सियार आदि का शरीर मिल सकता है , और घोर तामसिक कर्म किए हुए को साँप, नेवला, बिच्छू, कीड़ा, काकरोच, छिपकली आदि । तो ऐसे ही कर्मों से नीच शरीर मिलते हैं और ये जानवरों के शरीर आत्मा की भोग योनियाँ हैं ।

(32) प्रश्न :- तो क्या हमें यह पता लग सकता है कि हम पिछले जन्म में क्या थे ? या आगे क्या होंगे ?

उत्तर :- नहीं कभी नहीं, सामान्य मनुष्य को यह पता नहीं लग सकता । क्योंकि यह केवल ईश्वर का ही अधिकार है कि हमें हमारे कर्मों के आधार पर शरीर दे । वही सब जानता है ।

(33) प्रश्न :- तो फिर यह किसको पता चल सकता है ?

उत्तर :- केवल एक सिद्ध योगी ही यह जान सकता है , योगाभ्यास से उसकी बुद्धि । अत्यन्त तीव्र हो चुकी होती है कि वह ब्रह्माण्ड एवं प्रकृति के महत्वपूर्ण रहस्य़ अपनी योगज शक्ति से जान सकता है । उस योगी को बाह्य इन्द्रियों से ज्ञान प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं रहती है
वह अन्तः मन और बुद्धि से सब जान लेता है । उसके सामने भूत और भविष्य दोनों सामने आ खड़े होते हैं ।

(34) प्रश्न :- यह बतायें की योगी यह सब कैसे जान लेता है ?

उत्तर :- अभी यह लेख पुनर्जन्म पर है, यहीं से प्रश्न उत्तर का ये क्रम चला देंगे तो लेख का बहुत ही विस्तार हो जायेगा । इसीलिये हम अगले लेख में यह विषय विस्तार से समझायेंगे कि योगी कैसे अपनी विकसित शक्तियों से सब कुछ जान लेता है ? और वे शक्तियाँ कौन सी हैं ? कैसे प्राप्त होती हैं ? इसके लिए अगले लेख की प्रतीक्षा करें...

(35) प्रश्न :- क्या पुनर्जन्म के कोई प्रमाण हैं ?

उत्तर :- हाँ हैं, जब किसी छोटे बच्चे को देखो तो वह अपनी माता के स्तन से सीधा ही दूध पीने लगता है जो कि उसको बिना सिखाए आ जाता है क्योंकि ये उसका अनुभव पिछले जन्म में दूध पीने का रहा है, वर्ना बिना किसी कारण के ऐसा हो नहीं सकता । दूसरा यह कि कभी आप उसको कमरे में अकेला लेटा दो तो वो कभी कभी हँसता भी है , ये सब पुराने शरीर की बातों को याद करके वो हँसता है पर जैसे जैसे वो बड़ा होने लगता है तो धीरे धीरे सब भूल जाता है...!

(36) प्रश्न :- क्या इस पुनर्जन्म को सिद्ध करने के लिए कोई उदाहरण हैं...?

उत्तर :- हाँ, जैसे अनेकों समाचार पत्रों में, या TV में भी आप सुनते हैं कि एक छोटा सा बालक अपने पिछले जन्म की घटनाओं को याद रखे हुए है, और सारी बातें बताता है जहाँ जिस गाँव में वो पैदा हुआ, जहाँ उसका घर था, जहाँ पर वो मरा था । और इस जन्म में वह अपने उस गाँव में कभी गया तक नहीं था लेकिन फिर भी अपने उस गाँव की सारी बातें याद रखे हुए है , किसी ने उसको कुछ बताया नहीं, सिखाया नहीं, दूर दूर तक उसका उस गाँव से इस जन्म में कोई नाता नहीं है । फिर भी उसकी गुप्त बुद्धि जो कि सूक्ष्म शरीर का भाग है वह घटनाएँ संजोए हुए है जाग्रत हो गई और बालक पुराने जन्म की बातें बताने लग पड़ा...!

(37) प्रश्न :- लेकिन ये सब मनघड़ंत बातें हैं, हम विज्ञान के युग में इसको नहीं मान सकते क्योंकि वैज्ञानिक रूप से ये बातें बेकार सिद्ध होती हैं, क्या कोई तार्किक और वैज्ञानिक आधार है इन बातों को सिद्ध करने का ?

उत्तर :- आपको किसने कहा कि हम विज्ञान के विरुद्ध इस पुनर्जन्म के सिद्धान्त का दावा करेंगे । ये वैज्ञानिक रूप से सत्य है , और आपको ये हम अभी सिद्ध करके दिखाते हैं..!

(38) प्रश्न :- तो सिद्ध कीजीए ?

उत्तर :- जैसा कि आपको पहले बताया गया है कि मृत्यु केवल स्थूल शरीर की होती है, पर सूक्ष्म शरीर आत्मा के साथ वैसे ही आगे चलता है , तो हर जन्म के कर्मों के संस्कार उस बुद्धि में समाहित होते रहते हैं । और कभी किसी जन्म में वो कर्म अपनी वैसी ही परिस्थिती पाने के बाद जाग्रत हो जाते हैं

इसे उदहारण से समझें :- एक बार एक छोटा सा ६ वर्ष का बालक था, यह घटना हरियाणा के सिरसा के एक गाँव की है । जिसमें उसके माता पिता उसे एक स्कूल में घुमाने लेकर गये जिसमें उसका दाखिला करवाना था और वो बच्चा केवल हरियाणवी या हिन्दी भाषा ही जानता था कोई तीसरी भाषा वो समझ तक नहीं सकता था ।

लेकिन हुआ कुछ यूँ था कि उसे स्कूल की Chemistry Lab में ले जाया गया और वहाँ जाते ही उस बच्चे का मूँह लाल हो गया !! चेहरे के हावभाव बदल गये !!

और उसने एकदम फर्राटेदार French भाषा बोलनी शुरू कर दी !! उसके माता पिता बहुत डर गये और घबरा गये , तुरंत ही बच्चे को अस्पताल ले जाया गया । जहाँ पर उसकी बातें सुनकर डाकटर ने एक दुभाषिये का प्रबन्ध किया ।

जो कि French और हिन्दी जानता था , तो उस दुभाषिए ने सारा वृतान्त उस बालक से पूछा तो उस बालक ने बताया कि " मेरा नाम Simon Glaskey है और मैं French Chemist हूँ । मेरी मौत मेरी प्रयोगशाला में एक हादसे के कारण ( Lab. ) में हुई थी । "

तो यहाँ देखने की बात यह है कि इस जन्म में उसे पुरानी घटना के अनुकूल मिलती जुलती परिस्थिति से अपना वह सब याद आया जो कि उसकी गुप्त बुद्धि में दबा हुआ था । यानि की वही पुराने जन्म में उसके साथ जो प्रयोगशाला में हुआ, वैसी ही प्रयोगशाला उस दूसरे जन्म में देखने पर उसे सब याद आया । तो ऐसे ही बहुत सी उदहारणों से आप पुनर्जन्म को वैज्ञानिक रूप से सिद्ध कर सकते हो...!

(39) प्रश्न :- तो ये घटनाएँ भारत में ही क्यों होती हैं ? पूरा विश्व इसको मान्यता क्यों नहीं देता ?

उत्तर :- ये घटनायें पूरे विश्व भर में होती रहती हैं और विश्व इसको मान्यता इसलिए नहीं देता क्योंकि उनको वेदानुसार यौगिक दृष्टि से शरीर का कुछ भी ज्ञान नहीं है । वे केवल माँस और हड्डियों के समूह को ही शरीर समझते हैं , और उनके लिए आत्मा नाम की कोई वस्तु नहीं है । तो ऐसे में उनको न जीवन का ज्ञान है, न मृत्यु का ज्ञान है, न आत्मा का ज्ञान है, न कर्मों का ज्ञान है, न ईश्वरीय व्यवस्था का ज्ञान है । और अगर कोई पुनर्जन्म की कोई घटना उनके सामने आती भी है तो वो इसे मानसिक रोग जानकर उसको Multiple Personality Syndrome का नाम देकर अपना पीछा छुड़ा लेते हैं और उसके कथनानुसार जाँच नहीं करवाते हैं...!

(40) प्रश्न :- क्या पुनर्जन्म केवल पृथिवी पर ही होता है या किसी और ग्रह पर भी ?

उत्तर :- ये पुनर्जन्म पूरे ब्रह्माण्ड में यत्र तत्र होता है, कितने असंख्य सौरमण्डल हैं, कितनी ही पृथीवियाँ हैं । तो एक पृथीवी के जीव मरकर ब्रह्माण्ड में किसी दूसरी पृथीवी के उपर किसी न किसी शरीर में भी जन्म ले सकते हैं । ये ईश्वरीय व्यवस्था के अधीन है...

परन्तु यह बड़ा ही अजीब लगता है कि मान लो कोई हाथी मरकर मच्छर बनता है तो इतने बड़े हाथी की आत्मा मच्छर के शरीर में कैसे घुसेगी..?

यही तो भ्रम है आपका कि आत्मा जो है वो पूरे शरीर में नहीं फैली होती । वो तो हृदय के पास छोटे अणुरूप में होती है । सब जीवों की आत्मा एक सी है । चाहे वो व्हेल मछली हो, चाहे वो एक चींटी हो।

संस्कृत में ; लट् , लिट् , लुट् , लृट् , लेट् , लोट् , लङ् , लिङ् , लुङ् , लृङ् ; – ये दस लकार होते हैं। .





संस्कृत में " लट् , लिट् , लुट् , लृट् , लेट् , लोट् , लङ् , लिङ् , लुङ् , लृङ् " – ये दस लकार होते हैं।
•• वास्तव में ये दस प्रत्यय हैं जो धातुओं में जोड़े जाते हैं। इन दसों प्रत्ययों के प्रारम्भ में " ल " है
इसलिए इन्हें 'लकार' कहते हैं (ठीक वैसे ही जैसे ॐकार, अकार, इकार, उकार इत्यादि)।
•• इन दस लकारों में से
~~~~ आरम्भ के छः लकारों के अन्त में 'ट्' है-
लट् लिट् लुट् आदि इसलिए ये " टित् " लकार कहे जाते हैं और
~~~~ अन्त के चार लकार " ङित् " कहे जाते हैं क्योंकि उनके अन्त में 'ङ्' है।
•• व्याकरणशास्त्र में जब धातुओं से
पिबति, खादति आदि रूप सिद्ध किये जाते हैं
तब इन " टित् " और " ङित् " शब्दों का बहुत बार प्रयोग किया जाता है।
•• इन लकारों का प्रयोग विभिन्न कालों की क्रिया बताने के लिए किया जाता है।
जैसे –
••••• जब वर्तमान काल की क्रिया बतानी हो तो धातु से " लट् " लकार जोड़ देंगे,
•••••• परोक्ष भूतकाल की क्रिया बतानी हो तो " लिट् " लकार जोड़ेंगे।
(१) लट् लकार ( वर्तमान काल )
~~~~ जैसे :-
श्यामः खेलति । = श्याम खेलता है।
(२) लिट् लकार ( अनद्यतन परोक्ष भूतकाल ) जो अपने साथ न घटित होकर किसी इतिहास का विषय हो ।
~~~~ जैसे :--
रामः रावणं ममार । = राम ने रावण को मारा ।
(३) लुट् लकार ( अनद्यतन भविष्यत् काल ) जो आज का दिन छोड़ कर आगे होने वाला हो ।
~~~~ जैसे :--
सः परश्वः विद्यालयं गन्ता । = वह परसों विद्यालय जायेगा ।
(४) लृट् लकार ( सामान्य भविष्य काल ) जो आने वाले किसी भी समय में होने वाला हो ।
~~~~ जैसे :---
रामः इदं कार्यं करिष्यति । = राम यह कार्य करेगा।
(५) लेट् लकार ( यह लकार केवल वेद में प्रयोग होता है, ईश्वर के लिए, क्योंकि वह किसी काल में बंधा नहीं है। )
(६) लोट् लकार ( ये लकार आज्ञा, अनुमति लेना, प्रशंसा करना, प्रार्थना आदि में प्रयोग होता है । )
~~~~ जैसे :-
• भवान् गच्छतु । = आप जाइए । ;
• सः क्रीडतु । = वह खेले । ;
• त्वं खाद । = तुम खाओ । ;
• किमहं वदानि । = क्या मैं बोलूँ ?
(७) लङ् लकार ( अनद्यतन भूत काल ) आज का दिन छोड़ कर किसी अन्य दिन जो हुआ हो ।
~~~~ जैसे :-
भवान् तस्मिन् दिने भोजनमपचत् । = आपने उस दिन भोजन पकाया था।
(८) लिङ् लकार = इसमें दो प्रकार के लकार होते हैं :--
(क) आशीर्लिङ् ( किसी को आशीर्वाद देना हो । )
~~~~ जैसे :-
• भवान् जीव्यात् । = आप जीओ । ;
• त्वं सुखी भूयात् । = तुम सुखी रहो।
(ख) विधिलिङ् ( किसी को विधि बतानी हो ।)
~~~~ जैसे :-
• भवान् पठेत् । = आपको पढ़ना चाहिए। ;
• अहं गच्छेयम् । = मुझे जाना चाहिए।
(९) लुङ् लकार ( सामान्य भूत काल ) जो कभी भी बीत चुका हो ।
~~~~ जैसे :-
अहं भोजनम् अभक्षत् । = मैंने खाना खाया।
(१०) लृङ् लकार ( ऐसा भूत काल जिसका प्रभाव वर्तमान तक हो) जब किसी क्रिया की असिद्धि हो गई हो ।
~~~~ जैसे :-
यदि त्वम् अपठिष्यत् तर्हि विद्वान् भवितुम् अर्हिष्यत् । = यदि तू पढ़ता तो विद्वान् बनता।
इस बात को स्मरण रखने के लिए कि
•••• धातु से कब किस लकार को जोड़ेंगे, निम्नलिखित श्लोक स्मरण कर लीजिए-
लट् वर्तमाने लेट् वेदे भूते लुङ् लङ् लिटस्‍तथा ।
विध्‍याशिषोर्लिङ् लोटौ च लुट् लृट् लृङ् च भविष्‍यति ॥
अर्थात्
~ लट् लकार वर्तमान काल में,
~ लेट् लकार केवल वेद में,
~ भूतकाल में लुङ् लङ् और लिट्,
~ विधि और आशीर्वाद में लिङ् और लोट् लकार तथा
~ भविष्यत् काल में लुट् लृट् और लृङ् लकारों का प्रयोग किया जाता है।)
******************************
लकारों के नाम याद रखने की विधि-
******************************
" ल् " में प्रत्याहार के क्रम से ( अ इ उ ऋ ए ओ ) जोड़ दें
और क्रमानुसार ( ट् ) जोड़ते जाऐं ।
फिर बाद में ( ङ् ) जोड़ते जाऐं जब तक कि दश लकार पूरे न हो जाएँ ।
जैसे
•• लट् लिट् लुट् लृट् लेट् लोट्
•• लङ् लिङ् लुङ् लृङ् ॥
इनमें लेट् लकार केवल वेद में प्रयुक्त होता है । लोक के लिए नौ लकार शेष रहे ।
अब इन नौ लकारों में लिङ् के दो भेद होते हैं :--
आशीर्लिङ् और विधिलिङ् ।
इस प्रकार लोक में दश के दश लकार हो गए ।

Friday, November 16, 2018

लकारज्ञानम्

---- लकारज्ञानम् ----

१. वर्त्तमाने "लट्" ~ भवति = होता है |

२. भविष्ये "लृट्" ~ भविष्यति = होगा |

३. भूते "लङ्" ~ अभवत् = हुआ |

४. अनुज्ञायां "लोट्" ~ भवतु = होवे, होईये |

५. "विधिलिङ्ग" में ~ भवेत् = होवे, होईये, होना चाहिए |
    हो सकता है, होने दो, [ कर्मनिष्ठः भवान् भवेत् ] ||

६. अभविष्यत् = अगर होता, "लृङ्" लकार कहो उसे |

Wednesday, November 14, 2018

शोध : अर्थ एवं परिभाषा शोध (Research) शोध की परिभाषा

शोध : अर्थ एवं परिभाषा   शोध (Research) शोध की परिभाषा, प्रकार,चरण पर आधारित क्लास नोट्स. शोध प्रबंध की रूपरेखा.संबंधित साहित्य का सर्वेक्षण (Survey of related literature)



शोध की परिभाषा, प्रकार,चरण पर आधारित 

 : अर्थ एवं परिभाषा  

शोध (Research)

•      शोध उस प्रक्रिया अथवा कार्य का नाम है जिसमें बोधपूर्वक प्रयत्न से तथ्यों का संकलन कर सूक्ष्मग्राही एवं विवेचक बुद्धि से उसका अवलोकन- विश्‌लेषण करके नए तथ्यों या सिद्धांतों का उद्‌घाटन किया जाता है।

•      रैडमैन और मोरी ने अपनी किताब  “दि रोमांस ऑफ रिसर्च” में शोध का अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखा है, कि नवीन ज्ञान की प्राप्ति के व्यवस्थित प्रयत्न को हम शोध कहते हैं।

•      एडवांस्ड लर्नर डिक्शनरी ऑफ करेंट इंग्लिश के अनुसार- किसी भी ज्ञान की शाखा में नवीन तथ्यों की खोज के लिए सावधानीपूर्वक किए गए अन्वेषण या जांच- पड़ताल को शोध की संज्ञा दी जाती है।

•      स्पार और स्वेन्सन ने शोध को परिभाषित करते हुए अपनी पुस्तक में लिखा है कि कोई भी विद्वतापूर्ण शोध ही सत्य के लिए, तथ्यों के लिए, निश्चितताओं के लिए अन्चेषण है। 

•      वहीं लुण्डबर्ग ने शोध को परिभाषित करते हुए लिखा है, कि अवलोकित सामग्री का संभावित वर्गीकरण, साधारणीकरण एवं सत्यापन करते हुए पर्याप्त कर्म विषयक और व्यवस्थित पद्धति है।

शोध के अंग

·       ज्ञान क्षेत्र की किसी समस्या को   सुलझाने की प्रेरणा

·        प्रासंगिक तथ्यों का संकलन

·       . विवेकपूर्ण विश्लेषण और अध्ययन

·       परिणाम स्वरूप निर्णय 

शोध का महत्त्व

•      शोध मानव ज्ञान को दिशा प्रदान करता है तथा ज्ञान भंडार को विकसित एवं परिमार्जित करता है।  

•शोधसे व्यावहारिक समस्याओं का समाधान होता है।                                                                 

•      शोध से व्यक्तित्व का बौद्धिक विकास होता है                                                                     

•      शोध सामाजिक विकास का सहायक है                                                                               

•       शोध जिज्ञासा मूल प्रवृत्ति   (Curiosity Instinct) की संतुष्टि करता है   

•      शोध अनेक नवीन कार्य विधियों व उत्पादों को विकसित करता है                                               

•      शोध पूर्वाग्रहों के निदान और निवारण में सहायक है                                                                 

•       शोध ज्ञान के विविध पक्षों में गहनता और सूक्ष्मता प्रदान करता है।

शोध करने हेतु प्रयोग की जाने वाली पद्धतियाँ

·       सर्वेक्षण पद्धति (Survey method)

·         आलोचनात्मक पद्धति (Critical Method):

·        समस्यामूलक पद्धति (Problem based method)

·        तुलनात्मक पद्धति (Comparative method)

·       वर्गीय अध्ययण पद्धति (Class based method)

·       क्षेत्रीय अध्ययन पद्धति (Regional method)

·       आगमन(induction)-

·       निगमन (Deduction)  पद्धति

आलोचनात्मक पद्धति (Critical Method)

·       काव्यशास्त्रीय पद्धति  (aesthetic/poetics method)

·       समाजशास्त्रीय पद्धति (Sociological method)

·        भाषावैज्ञानिक पद्धति  (Linguistic method)

·       शैली वैज्ञानिक पद्धति (Stylistic method)

·       मनोवैज्ञानिक पद्धति (Psychological method)

शोध के प्रकार

उपयोग के आधार पर

1. विशुद्ध / मूल शोध    (Pure / fundamental Research)

2. प्रायोगिक /प्रयुक्त या क्रियाशील शोध (Applied Research)

काल के आधार पर

·       ऎतिहासिक शोध (Historical Research)

·        वर्णनात्मक / विवरणात्मक शोध  (Descriptive Research)

शोध के कुछ मुख्य प्रकार

1. वर्णनात्मक शोध-  शोधकर्ता का चरों (variables) पर नियंत्रण नहीं होता। सर्वेक्षण पद्धति का प्रयोग होता है। वर्तमान समय का वर्णन होता है। मूल प्रश्न होता है: “क्या है?”

2. विश्लेषणात्मक शोध (Analytical Research) – शोधकर्ता का चरों (variables) पर नियंत्रण होता है। शोधकर्ता पहले से उपलब्ध सूचनाओं व तथ्यों का अध्ययन करता है।

3. विशुद्ध / मूल शोध  - इसमें सिद्धांत (Theory) निर्माण होता है जो ज्ञान का विस्तार करता है। गणित तथा मूल विज्ञान के शोध।

4. प्रायोगिक / प्रयुक्त शोध (Applied Research): समस्यामूलक पद्धति का उपयोग होता है। किसी सामाजिक या व्यावहारिक समस्या का समाधान होता है। इसमें विशुद्ध शोध से सहायता ली जाती है।

5. मात्रात्मक शोध (Quantitative Research):  इस शोध में चरों (variables) का संख्या या मात्रा के आधार पर विश्लेषण किया जाता है।

6. गुणात्मक शोध (qualitative Research) :  इस शोध में चरों (variables) का उनके गुणों के आधार पर विश्लेषण  किया जाता है।

7. सैद्धांतिक शोध (Theoretical Research):  सिद्धांत निर्माण और विकास पुस्तकालय शोध या उपलब्ध डाटा के आधार पर किया जाता है।

8. आनुभविक शोध (Empirical Research):   इस शोध के तीन प्रकार हैं –

         क) प्रेक्षण (Observation) 

         ख) सहसंबंधात्मक (Correlational)

          ग) प्रयोगात्मक (Experimental)

9. अप्रयोगात्मक शोध (Non-Experimental Research) –वर्णनात्मक शोध  के समान

10.  ऎतिहासिक शोध (Historical Research):  इतिहास को ध्यान में रख कर शोध होता है। मूल प्रश्न होता है: “क्या था?”

11.  नैदानिक शोध (Diagnostic / Clinical Research): समस्याओं का पता लगाने के लिए किया जाता है।

शोध प्रबंध की रूपरेखा

·       सही शीर्षक का चुनाव विषय वस्तु को ध्यान में रख कर किया जाए।

·       शीर्षक ऎसा हो जिससे शोध निबंध का उद्देश्य अच्छी तरह से स्पष्ट हो रहा हो।

·       शीर्षक न तो अधिक लंबा ना ही अधिक छोटा हो।

·       शीर्षक में निबंध में उपयोग किए गए शब्दों का ही जहाँ तक हो सके उपयोग हॊ।

·       शीर्षक भ्रामक न हो।

·       शीर्षक को रोचक अथवा आकर्षक बनाने का प्रयास होना चाहिए।

·       शीर्षक का चुनाव करते समय शोध प्रश्न को ध्यान में रखा जाना आवश्यक है।



शोध समस्या का निर्माण  चरण 

(Formulation of research problem)

 समस्या का सामान्य व व्यापक कथन (Statement of the problem in a general way)

समस्या की प्रकृति को समझना  (Understanding the nature of the problem)

संबंधित साहित्य का सर्वेक्षण  (Surveying the related literature)

परिचर्चा के द्वारा विचारों का विकास  (Developing the Ideas through discussion)

 शोध समस्या का पुनर्लेखन  (Rephrasing the research problem)

संबंधित साहित्य का सर्वेक्षण

(Survey of related literature)

संबंधित साहित्य के सर्वेक्षण से तात्पर्य उस अध्ययन से है जो शोध समस्या के चयन के पहले अथवा बाद में उस समस्या पर पूर्व में किए गए शोध कार्यों, विचारों, सिद्धांतों, कार्यविधियों, तकनीक, शोध के दौरान होने वाली समस्याओं आदि के बारे में जानने के लिए किया जाता है।

संबंधित साहित्य का सर्वेक्षण मुख्यत: दो प्रकार से किया जाता है:

1.    प्रारंभिक साहित्य सर्वेक्षण (Preliminary survey of literature)-प्रारंभिक साहित्य सर्वेक्षण शोध कार्य प्रारंभ करने के पहले शोध समस्या के चयन तथा उसे परिभाषित करने के लिए किया जाता है। इस साहित्य सर्वेक्षण का एक प्रमुख उद्देश्य यह पता करना होता है कि आगे शोध में कौन-कौन सहायक संसाधन होंगे।  

2.    व्यापक साहित्य सर्वेक्षण (Broad survey of literature)-व्यापक साहित्य सर्वेक्षण शोध प्रक्रिया का एक चरण होता है। इसमें संबंधित साहित्य का व्यापक अध्ययन किया जाता है। संबंधित साहित्य का व्यापक सर्वेक्षण शोध का प्रारूप के निर्माण तथा डाटा/तथ्य संकलन के कार्य के पहले किया जाता



साहित्य सर्वेक्षण के स्रोत

·       पाठ्य पुस्तक और अन्य ग्रंथ

·       शोध पत्र

·       सम्मेलन / सेमिनार में पढ़े गए आलेख

·       शोध प्रबंध (Theses and Dissertations)

·       पत्रिकाएँ एवं समाचार पत्र

·       इंटरनेट

·       ऑडियो-विडियो

·       साक्षात्कार (Interviews)

·       हस्तलेख अथवा अप्रकाशित पांडुलिपि

परिकल्पना Hypothesis

जब शोधकर्ता किसी समस्या का चयन कर लेता है तो वह उसका एक अस्थायी समाधान (Tentative solution) एक जाँचनीय प्रस्ताव (Testable proposition) के रूप में करता है। इस जाँचनीय प्रस्ताव को तकनीकी भाषा में परिकल्पना/प्राक्‍कल्पना कहते हैं। इस तरह परिकल्पना / प्राकल्पना किसी शोध समस्या का एक प्रस्तावित जाँचनीय उत्तर होती है।

किसी घटना की व्याख्या करने वाला कोई सुझाव या अलग-अलग प्रतीत होने वाली बहुत सी घटनाओं को के आपसी सम्बन्ध की व्याख्या करने वाला कोई तर्कपूर्ण सुझाव परिकल्पना (hypothesis) कहलाता है। वैज्ञानिक विधि के नियमानुसार आवश्यक है कि कोई भी परिकल्पना परीक्षणीय होनी चाहिये।

सामान्य व्यवहार में, परिकल्पना का मतलब किसी अस्थायी विचार (provisional idea) से होता है जिसके गुणागुण (merit) अभी सुनिश्चित नहीं हो पाये हों। आमतौर पर वैज्ञानिक परिकल्पनायें गणितीय माडल के रूप में प्रस्तुत की जाती हैं। जो परिकल्पनायें अच्छी तरह परखने के बाद सुस्थापित (well established) हो जातीं हैं, उनको सिद्धान्त कहा जाता है।

परिकल्पना की विशेषताएँ

·       परिकल्पना को जाँचनीय होना चाहिए।  

·       बनाई गई परिकल्पना का तालमेल (harmony) अध्ययन के क्षेत्र की अन्य    परिकल्पनाओं के साथ होना चाहिए।

·       परिकल्पना को मितव्ययी (parsimonious) होना चाहिए ।  

·       परिकल्पना में तार्किक पूर्णता (logical unity) और व्यापकता का गुण होना चाहिए।  

·       परिकल्पना को मितव्ययी (parsimonious) होना चाहिए।  

·       परिकल्पना को अध्ययन क्षेत्र के मौजूदा सिद्धांतों एवं तथ्यों से संबंधित होना चाहिए ।

·       परिकल्पना को संप्रत्यात्मक (conceptual) रूप से स्पष्ट होना चाहिए।

·       परिकल्पना को अध्ययन क्षेत्र के मौजूदा सिद्धांतों एवं तथ्यों से संबंधित होना चाहिए ।

·       परिकल्पना से अधिक से अधिक अनुमिति (deductions) किया जाना संभव होना चाहिए तथा उसका स्वरूप न तो बहुत अधिक सामान्य होना चाहिए (general) और न ही बहुत अधिक विशिष्ट (specific)।

·       परिकल्पना को संप्रत्यात्मक (conceptual) रूप से स्पष्ट होना चाहिए: इसका अर्थ यह है कि परिकल्पना में इस्तेमाल किए गए संप्रत्यय /अवधारणाएँ (concepts) वस्तुनिष्ठ (objective) ढंग से परिभाषित होनी चाहिए।

परिकल्पना निर्माण के स्रोत

       i.            व्यक्तिगत अनुभव

     ii.            पहले किए शोध के परिणाम

  iii.            पुस्तकें, शोध पत्रिकाएँ, शोध सार आदि

   iv.            उपलब्ध सिद्धांत

     v.            निपुण विद्वानों के निर्देशन में


शोध प्रक्रिया के प्रमुख चरण

1.    अनुसंधान समस्या का निर्माण

2.    संबंधित साहित्य का व्यापक सर्वेक्षण

3.    परिकल्पना/प्राकल्पना (Hypothesis) का निर्माण

4.    शोध की रूपरेखा/शोध प्रारूप (Research Design) तैयार करना

5.    आँकड़ों का संकलन / तथ्यों का संग्रह

6.    आँकड़ो / तथ्यों का विश्‍लेषण

7.    प्राकल्पना की जाँच

8.    सामान्यीकरण एवं व्याख्या

9.    शोध प्रतिवेदन तैयार करना



शोध की परिभाषा, प्रकार,चरण पर आधारित क्लास नोट्स शोध : अर्थ एवं परिभाषा शोध (Research) • शोध उस प्रक्रिया अथवा कार्य का नाम है जिसमें बोधपूर्वक प्रयत्न से तथ्यों का संकलन कर सूक्ष्मग्राही एवं विवेचक बुद्धि से उसका अवलोकन- विश्‌लेषण करके नए तथ्यों या सिद्धांतों का उद्‌घाटन किया जाता है। • रैडमैन और मोरी ने अपनी किताब “दि रोमांस ऑफ रिसर्च” में शोध का अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखा है, कि नवीन ज्ञान की प्राप्ति के व्यवस्थित प्रयत्न को हम शोध कहते हैं। • एडवांस्ड लर्नर डिक्शनरी ऑफ करेंट इंग्लिश के अनुसार- किसी भी ज्ञान की शाखा में नवीन तथ्यों की खोज के लिए सावधानीपूर्वक किए गए अन्वेषण या जांच- पड़ताल को शोध की संज्ञा दी जाती है। • स्पार और स्वेन्सन ने शोध को परिभाषित करते हुए अपनी पुस्तक में लिखा है कि कोई भी विद्वतापूर्ण शोध ही सत्य के लिए, तथ्यों के लिए, निश्चितताओं के लिए अन्चेषण है। • वहीं लुण्डबर्ग ने शोध को परिभाषित करते हुए लिखा है, कि अवलोकित सामग्री का संभावित वर्गीकरण, साधारणीकरण एवं सत्यापन करते हुए पर्याप्त कर्म विषयक और व्यवस्थित पद्धति है। शोध के अंग · ज्ञान क्षेत्र की किसी समस्या को सुलझाने की प्रेरणा · प्रासंगिक तथ्यों का संकलन · . विवेकपूर्ण विश्लेषण और अध्ययन · परिणाम स्वरूप निर्णय शोध का महत्त्व • शोध मानव ज्ञान को दिशा प्रदान करता है तथा ज्ञान भंडार को विकसित एवं परिमार्जित करता है। •शोधसे व्यावहारिक समस्याओं का समाधान होता है। • शोध से व्यक्तित्व का बौद्धिक विकास होता है • शोध सामाजिक विकास का सहायक है • शोध जिज्ञासा मूल प्रवृत्ति (Curiosity Instinct) की संतुष्टि करता है • शोध अनेक नवीन कार्य विधियों व उत्पादों को विकसित करता है • शोध पूर्वाग्रहों के निदान और निवारण में सहायक है • शोध ज्ञान के विविध पक्षों में गहनता और सूक्ष्मता प्रदान करता है। शोध करने हेतु प्रयोग की जाने वाली पद्धतियाँ · सर्वेक्षण पद्धति (Survey method) · आलोचनात्मक पद्धति (Critical Method): · समस्यामूलक पद्धति (Problem based method) · तुलनात्मक पद्धति (Comparative method) · वर्गीय अध्ययण पद्धति (Class based method) · क्षेत्रीय अध्ययन पद्धति (Regional method) · आगमन(induction)- · निगमन (Deduction) पद्धति आलोचनात्मक पद्धति (Critical Method) · काव्यशास्त्रीय पद्धति (aesthetic/poetics method) · समाजशास्त्रीय पद्धति (Sociological method) · भाषावैज्ञानिक पद्धति (Linguistic method) · शैली वैज्ञानिक पद्धति (Stylistic method) · मनोवैज्ञानिक पद्धति (Psychological method) शोध के प्रकार उपयोग के आधार पर 1. विशुद्ध / मूल शोध (Pure / fundamental Research) 2. प्रायोगिक /प्रयुक्त या क्रियाशील शोध (Applied Research) काल के आधार पर · ऎतिहासिक शोध (Historical Research) · वर्णनात्मक / विवरणात्मक शोध (Descriptive Research) शोध के कुछ मुख्य प्रकार 1. वर्णनात्मक शोध- शोधकर्ता का चरों (variables) पर नियंत्रण नहीं होता। सर्वेक्षण पद्धति का प्रयोग होता है। वर्तमान समय का वर्णन होता है। मूल प्रश्न होता है: “क्या है?” 2. विश्लेषणात्मक शोध (Analytical Research) – शोधकर्ता का चरों (variables) पर नियंत्रण होता है। शोधकर्ता पहले से उपलब्ध सूचनाओं व तथ्यों का अध्ययन करता है। 3. विशुद्ध / मूल शोध - इसमें सिद्धांत (Theory) निर्माण होता है जो ज्ञान का विस्तार करता है। गणित तथा मूल विज्ञान के शोध। 4. प्रायोगिक / प्रयुक्त शोध (Applied Research): समस्यामूलक पद्धति का उपयोग होता है। किसी सामाजिक या व्यावहारिक समस्या का समाधान होता है। इसमें विशुद्ध शोध से सहायता ली जाती है। 5. मात्रात्मक शोध (Quantitative Research): इस शोध में चरों (variables) का संख्या या मात्रा के आधार पर विश्लेषण किया जाता है। 6. गुणात्मक शोध (qualitative Research) : इस शोध में चरों (variables) का उनके गुणों के आधार पर विश्लेषण किया जाता है। 7. सैद्धांतिक शोध (Theoretical Research): सिद्धांत निर्माण और विकास पुस्तकालय शोध या उपलब्ध डाटा के आधार पर किया जाता है। 8. आनुभविक शोध (Empirical Research): इस शोध के तीन प्रकार हैं – क) प्रेक्षण (Observation) ख) सहसंबंधात्मक (Correlational) ग) प्रयोगात्मक (Experimental) 9. अप्रयोगात्मक शोध (Non-Experimental Research) –वर्णनात्मक शोध के समान 10. ऎतिहासिक शोध (Historical Research): इतिहास को ध्यान में रख कर शोध होता है। मूल प्रश्न होता है: “क्या था?” 11. नैदानिक शोध (Diagnostic / Clinical Research): समस्याओं का पता लगाने के लिए किया जाता है। शोध प्रबंध की रूपरेखा · सही शीर्षक का चुनाव विषय वस्तु को ध्यान में रख कर किया जाए। · शीर्षक ऎसा हो जिससे शोध निबंध का उद्देश्य अच्छी तरह से स्पष्ट हो रहा हो। · शीर्षक न तो अधिक लंबा ना ही अधिक छोटा हो। · शीर्षक में निबंध में उपयोग किए गए शब्दों का ही जहाँ तक हो सके उपयोग हॊ। · शीर्षक भ्रामक न हो। · शीर्षक को रोचक अथवा आकर्षक बनाने का प्रयास होना चाहिए। · शीर्षक का चुनाव करते समय शोध प्रश्न को ध्यान में रखा जाना आवश्यक है। शोध समस्या का निर्माण चरण (Formulation of research problem) समस्या का सामान्य व व्यापक कथन (Statement of the problem in a general way) समस्या की प्रकृति को समझना (Understanding the nature of the problem) संबंधित साहित्य का सर्वेक्षण (Surveying the related literature) परिचर्चा के द्वारा विचारों का विकास (Developing the Ideas through discussion) शोध समस्या का पुनर्लेखन (Rephrasing the research problem) संबंधित साहित्य का सर्वेक्षण (Survey of related literature) संबंधित साहित्य के सर्वेक्षण से तात्पर्य उस अध्ययन से है जो शोध समस्या के चयन के पहले अथवा बाद में उस समस्या पर पूर्व में किए गए शोध कार्यों, विचारों, सिद्धांतों, कार्यविधियों, तकनीक, शोध के दौरान होने वाली समस्याओं आदि के बारे में जानने के लिए किया जाता है। संबंधित साहित्य का सर्वेक्षण मुख्यत: दो प्रकार से किया जाता है: 1. प्रारंभिक साहित्य सर्वेक्षण (Preliminary survey of literature)-प्रारंभिक साहित्य सर्वेक्षण शोध कार्य प्रारंभ करने के पहले शोध समस्या के चयन तथा उसे परिभाषित करने के लिए किया जाता है। इस साहित्य सर्वेक्षण का एक प्रमुख उद्देश्य यह पता करना होता है कि आगे शोध में कौन-कौन सहायक संसाधन होंगे। 2. व्यापक साहित्य सर्वेक्षण (Broad survey of literature)-व्यापक साहित्य सर्वेक्षण शोध प्रक्रिया का एक चरण होता है। इसमें संबंधित साहित्य का व्यापक अध्ययन किया जाता है। संबंधित साहित्य का व्यापक सर्वेक्षण शोध का प्रारूप के निर्माण तथा डाटा/तथ्य संकलन के कार्य के पहले किया जाता साहित्य सर्वेक्षण के स्रोत · पाठ्य पुस्तक और अन्य ग्रंथ · शोध पत्र · सम्मेलन / सेमिनार में पढ़े गए आलेख · शोध प्रबंध (Theses and Dissertations) · पत्रिकाएँ एवं समाचार पत्र · इंटरनेट · ऑडियो-विडियो · साक्षात्कार (Interviews) · हस्तलेख अथवा अप्रकाशित पांडुलिपि परिकल्पना Hypothesis जब शोधकर्ता किसी समस्या का चयन कर लेता है तो वह उसका एक अस्थायी समाधान (Tentative solution) एक जाँचनीय प्रस्ताव (Testable proposition) के रूप में करता है। इस जाँचनीय प्रस्ताव को तकनीकी भाषा में परिकल्पना/प्राक्‍कल्पना कहते हैं। इस तरह परिकल्पना / प्राकल्पना किसी शोध समस्या का एक प्रस्तावित जाँचनीय उत्तर होती है। किसी घटना की व्याख्या करने वाला कोई सुझाव या अलग-अलग प्रतीत होने वाली बहुत सी घटनाओं को के आपसी सम्बन्ध की व्याख्या करने वाला कोई तर्कपूर्ण सुझाव परिकल्पना (hypothesis) कहलाता है। वैज्ञानिक विधि के नियमानुसार आवश्यक है कि कोई भी परिकल्पना परीक्षणीय होनी चाहिये। सामान्य व्यवहार में, परिकल्पना का मतलब किसी अस्थायी विचार (provisional idea) से होता है जिसके गुणागुण (merit) अभी सुनिश्चित नहीं हो पाये हों। आमतौर पर वैज्ञानिक परिकल्पनायें गणितीय माडल के रूप में प्रस्तुत की जाती हैं। जो परिकल्पनायें अच्छी तरह परखने के बाद सुस्थापित (well established) हो जातीं हैं, उनको सिद्धान्त कहा जाता है। परिकल्पना की विशेषताएँ · परिकल्पना को जाँचनीय होना चाहिए। · बनाई गई परिकल्पना का तालमेल (harmony) अध्ययन के क्षेत्र की अन्य परिकल्पनाओं के साथ होना चाहिए। · परिकल्पना को मितव्ययी (parsimonious) होना चाहिए । · परिकल्पना में तार्किक पूर्णता (logical unity) और व्यापकता का गुण होना चाहिए। · परिकल्पना को मितव्ययी (parsimonious) होना चाहिए। · परिकल्पना को अध्ययन क्षेत्र के मौजूदा सिद्धांतों एवं तथ्यों से संबंधित होना चाहिए । · परिकल्पना को संप्रत्यात्मक (conceptual) रूप से स्पष्ट होना चाहिए। · परिकल्पना को अध्ययन क्षेत्र के मौजूदा सिद्धांतों एवं तथ्यों से संबंधित होना चाहिए । · परिकल्पना से अधिक से अधिक अनुमिति (deductions) किया जाना संभव होना चाहिए तथा उसका स्वरूप न तो बहुत अधिक सामान्य होना चाहिए (general) और न ही बहुत अधिक विशिष्ट (specific)। · परिकल्पना को संप्रत्यात्मक (conceptual) रूप से स्पष्ट होना चाहिए: इसका अर्थ यह है कि परिकल्पना में इस्तेमाल किए गए संप्रत्यय /अवधारणाएँ (concepts) वस्तुनिष्ठ (objective) ढंग से परिभाषित होनी चाहिए। परिकल्पना निर्माण के स्रोत i. व्यक्तिगत अनुभव ii. पहले किए शोध के परिणाम iii. पुस्तकें, शोध पत्रिकाएँ, शोध सार आदि iv. उपलब्ध सिद्धांत v. निपुण विद्वानों के निर्देशन में शोध प्रक्रिया के प्रमुख चरण 1. अनुसंधान समस्या का निर्माण 2. संबंधित साहित्य का व्यापक सर्वेक्षण 3. परिकल्पना/प्राकल्पना (Hypothesis) का निर्माण 4. शोध की रूपरेखा/शोध प्रारूप (Research Design) तैयार करना 5. आँकड़ों का संकलन / तथ्यों का संग्रह 6. आँकड़ो / तथ्यों का विश्‍लेषण 7. प्राकल्पना की जाँच 8. सामान्यीकरण एवं व्याख्या 9. शोध प्रतिवेदन तैयार करना


Saturday, November 10, 2018

जानिए छठपर्व का सांस्कृतिक महत्त्व छठ व्रत पूजा विधि छट पर्व क्यों मनाया जाता है। कैसे मनाया जाता है।करने से इसका क्या फल मिलता है।कब करना चाहिए।

जानिए छठपर्व का सांस्कृतिक महत्त्व
छट पर्व क्यों मनाया जाता है। कैसे मनाया जाता है।करने से इसका क्या फल मिलता है।कब करना चाहिए।


छठ व्रत पूजा विधि

छठ देवी भगवान सूर्यदेव की बहन हैं। जिनकी पूजा के लिए छठ मनाया जाता है। छठी मैया को प्रसन्न करने के लिए भगवान सूर्य की आराधना की जाती है। छठी मैया का ध्यान करते हुए लोग मां गंगा-यमुना या किसी नदी के किनारे इस पूजा को मनाते हैं। इसमें सूर्य की पूजा अनिवार्य है साथ ही किसी नदी में स्नान करना भी।

 


इस पर्व में पहले दिन घर की साफ सफाई की जाती है। छठ पर्व पर गांवों में अधिक सफाई देखने को मिलती है। छठ के चार दिनों तक शुद्ध शाकाहारी भोजन किया जाता है, दूसरे दिन खरना का कार्यक्रम होता है, तीसरे दिन भगवान सूर्य को संध्या अर्घ्य दिया जाता है और चौथे दिन भक्त उदियमान सूर्य को उषा अर्घ्य देते हैं।

 


छठ के दिन अगर कोई व्यक्ति व्रत को करता है तो  वह अत्यंत शुभ और मंगलकारी होता है। पूरे भक्तिभाव और विधि विधान से छठ व्रत करने वाला व्यक्ति सुखी और साधनसंपन्न होता है। साथ ही निःसंतानों को संतान प्राप्ति होती है।

 


छठ अनुष्ठान विधि

छठ के दिन सूर्योदय में उठना चाहिए। 
 

व्यक्ति को अपने घर के पास एक झील, तालाब या नदी में स्नान करना चाहिए।
 

स्नान करने के बाद नदी के किनारे खड़े होकर सूर्योदय के समय सूर्य देवता को नमन करें और विधिवत पूजा करें।
 


शुद्ध घी का दीपक जलाएं और सूर्य को धुप और फूल अर्पण करें।
 


छठ पूजा में सात प्रकार के फूल, चावल, चंदन, तिल आदि से युक्त जल को सूर्य को अर्पण करें।
 

सर झुका कर प्रार्थना करते हुए ॐ घृणिं सूर्याय नमः, ॐ घृणिं सूर्य: आदित्य:, ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय, सहस्त्रकिरणाय मनोवांछित फलं देहि देहि स्वाहा,  या फिर ॐ सूर्याय नमः 108 बार बोलें।
 


अपनी सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों और गरीबों को भोजन कराएं।
 


गरीब लोगों को कपड़े, भोजन, अनाज आदि का दान करना चाहिए।

दीपावली  के बाद सूर्य भगवान के उपासना का सबसे बड़ा त्योहार छठ आता है। चार दिन तक चलने वाले सूर्य उपासना का यह महापर्व च नहाय खाय के साथ शुरू हो रहा है। इसके बाद  'खरना' होगा। जिसे पूजा का दूसरा व कठिन चरण माना जाता है। इस दिन व्रती निर्जला उपवास रखेंगे और शाम को पूजा के बाद खीर और रोटी का प्रसाद ग्रहण करेंगे। अगले दिन 'सायंकालीन अर्ध्य' और उसके अगले दिन सूर्य को 'प्रात:कालीन अर्ध्य' के साथ ये त्योहार संपन्न होगा।

छठपर्व साल में दो बार मनाया जाता है। पहली बार चैत्र में और दूसरी बार कार्तिक में। चैत्र शुक्लपक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले छठ पर्व को 'चैती छठ' व कार्तिक शुक्लपक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले पर्व को 'कार्तिकी छठ' कहा जाता है।

कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से लेकर सप्तमी तिथि तक चार दिनों तक मनाया जाने वाला छठ पर्व बिहार का प्रमुख लोकपर्व है। इस महापर्व में देवी षष्ठी माता एवं भगवान सूर्य को प्रसन्न करने के लिए स्त्री और पुरूष दोनों ही व्रत रखते हैं। व्रत चार दिनों का होता है पहले दिन यानी चतुर्थी को आत्म शुद्धि हेतु व्रत करने वाले केवल अरवा खाते हैं यानी शुद्ध आहार लेते हैं। पंचमी के दिन 'नहाय खाय' होता है यानी स्नान करके पूजा पाठ करके संध्या काल में गुड़ और नये चावल से खीर बनाकर फल और मिष्टान से छठी माता की पूजा की जाती है फिर व्रत करने वाले कुमारी कन्याओं को एवं ब्राह्मणों को भोजन करवा कर इसी खीर को प्रसाद के तौर पर खाते हैं। षष्टी के दिन घर में पवित्रता एवं शुद्धता के साथ उत्तम पकवान बनाये जाते हैं। संध्या  के समय पकवानों को बड़े बडे बांस के डालों में भरकर जलाशय के निकट स्थित नदी, तालाब, सरोवर पर ले जाया जाता है।

षष्ठी तिथि को दोपहर से ही नदियों और तालाबों के किनारे व्रतीजनों की भीड़ जुटने लगती है। महिलाएं सूर्य देव और छठ माई के गीत गाती हुई अपने घरों से निकलती हैं। बांस निर्मित सूप और डलिया में सूर्यदेव को चढ़ाने का जो प्रसाद होता है उसमें सभी प्रकार के ऋतुफल, कन्द मूल, मिष्ठान्न और अनेक प्रकार के पकवान होते हैं। प्रसाद सामग्री में गुड़ और आटे से बने हुए ‘ठेकुआ’ पर लकड़ी के सांचे से सूर्यदेव के रथ का चक्र भी अंकित होता है। जलाशयों में ईख का घर बनाकर उन पर दीया जलाया जाता है। जैसे ही भगवान सूर्य अस्त होने लगते हैं, व्रतीजन जल में खड॓ होकर दोनों हाथों से सूर्य भगवान को अर्घ्य अर्पित करते हैं। छठ पर्व के समय गाए जाने वाले एक लोकगीत के अनुसार छठ मइया से विनती की जाती है कि सूर्य भगवान जल्दी दर्शन दें तथा अन्न-धन, घर-परिवार सब प्रकार की खुशहाली प्रदान करें-

‘‘कौने अवगुणवां सूरुज नाहीं
उगले हे छठि मइया।
जिंदगिया बना दे अन्न धन
सेवकन के घर भरवा दे।।’’

व्रत करने वाले जल में स्नान कर इन डालों को उठाकर डूबते सूर्य एवं षष्टी माता को अर्घ्य देते हैं। सूर्यास्त के पश्चात लोग अपने अपने घर वापस आ जाते हैं। रात भर जागरण किया जाता है।सप्तमी के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में पुन: संध्या काल की तरह डालों में पकवान, नारियल, केला, मिठाई भर कर नदी तट पर लोग जमा होते हैं। व्रत करने वाले सुबह के समय उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं।अंकुरित चना हाथ में लेकर षष्ठी व्रत की कथा कही और सुनी जाती है। कथा के बाद प्रसाद वितरण किया जाता है और फिर सभी अपने अपने घर लौट आते हैं। व्रतीजन  इस दिन व्रत  का परायण करते हैं।

एक आम कहावत प्रचलित है कि "लोग सदा उगते हुए सूर्य को प्रणाम करते है." किन्तु लोक-आस्था का महापर्व 'छठ' एक ऐसा पर्व है जहां डूबते हुए सूर्य की भी पूजा की जाती है। आदि देव भगवान भास्कर की आराधना का पर्व 'छठ' प्रकृति की आराधना का महापर्व है। छठ पूजा बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश की कृषक सभ्यता का महापर्व है। सूर्य और छठ माता की आराधना को समर्पित यह पर्व केवल पूर्वोत्तर में ही नहीं, बल्कि अब यह पूरे देश में मनाया जाने लगा है। भारतीय लोकपर्वों का लोकमानस सदा से ही प्रकृति पूजक रहा है। छठपर्व  भी उसी  परंपरा की एक पर्यावरण वैज्ञानिक सांस्कृतिक सौगात है।

बहुत चिंता की बात है कि हम आठ हजार साल से भी पुरानी वैदिक आर्यों की सूर्य संस्कृति की समाराधना से उपजी अपनी परम्पराओं के राष्ट्रीय महत्त्व को भुलाते जा रहे हैं। पर वास्तविकता यह है कि उत्तराखंड का उत्तरायण पर्व हो या केरल का ओणम पर्व, कर्नाटक की रथसप्तमी हो या फिर बिहार का छठ पर्व, इस तथ्य को सूचित करते हैं कि भारत मूलत: सूर्य संस्कृति के उपासकों का देश है तथा बारह महीनों के तीज-त्योहार भी यहां सूर्य के संवत्सर चक्र के अनुसार मनाए जाते हैं। हमें अपने देश के उन आंचलिक पर्व और त्योहारों का विशेष रूप से आभारी होना चाहिए जिनके कारण भारतीय सभ्यता और संस्कृति की ऐतिहासिक पहचान आज भी सुरक्षित है।

दरअसल, छठ पर्व ‘भारतराष्ट्र’ की अस्मिता और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा पर्व है। छठ के अवसर पर अस्त होते और उगते सूर्य को अर्घ्य देने का यही निहितार्थ है कि समस्त प्रजाजनों का भरण-पोषण करने वाला असली राजा तो सूर्य है। वैदिक साहित्य में प्रजावर्ग का भरण-पोषण करने के कारण सूर्य को ‘भरत’ कहा गया है। वैदिक साहित्य की मान्यता के अनुसार सूर्य एक राष्ट्र भी है राष्ट्रपति भी। सूर्य की ‘भरत’ संज्ञा होने के कारण सूर्यवंशी आर्य भरतगण कहलाने लगे। इन्हीं सूर्य-उपासक भरतवंशियों से शासित यह देश बाद में  ‘भारतवर्ष’ या ‘भारतराष्ट्र’ कहलाया। भारतवासियों के लिए समस्त कामनाओं की पूर्ति तो भगवान सूर्य से हो जाती है किन्तु पुत्रेषणा की पूर्ति मातृस्वरूपा प्रकृति देवी से ही होती है। इसलिए पर ब्रह्म स्वरूप सूर्य और उनकी शक्ति स्वरूपा षष्ठी देवी की पूजा-अर्चना की परंपरा हजारों वर्षो से प्रचलित है।

‘पर्व’ का अर्थ है गांठ या जोड़। भारत का प्रत्येक पर्व ऐसी सांस्कृतिक धरोहर है जिसके साथ प्राचीन कालखंडों का इतिहास और पूजा परंपराओं की वैज्ञानिक कड़ियां भी जुड़ी हुई हैं। ज्योतिर्विज्ञान और लोकपरम्परा  का अद्भुत सम्मिलन है छठ पर्व। पूरे वर्ष में सबसे अँधेरी रात कार्तिक महीने की अमावस्या को दीवाली और कार्तिक की पूर्णिमा के बीच छठवें-सातवें दिन होने वाली सूर्य की पूजा गाँव के किसानों में पुरातन काल से ही  प्रचलित है। घोर अंधकार और धवल प्रकाश के बीच छह कृतिकाओं के मास कार्तिक का यह पर्व  वैदिक काल से ही उपास्य रहा है।

 
छठ व्रत कथा 

दिवाली के 6 दिन बाद छठ मनाया जाता है। छठ के महाव्रत को करना अत्यंत पुण्यदायक है। छठ व्रत सबसे महत्त्वपूर्ण रात्रि कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथि को होता है। सूर्योपासना का यह महापर्व चार दिनों तक मनाया जाता है। छठ पर्व के लिए कई कथाएं प्रचलित हैं, किन्तु पौराणिक शास्त्रों में इसे देवी द्रोपदी से जौड़कर देखा जाता है।

 


मान्यता है कि जब पांडव जुए में अपना सारा राजपाट हार गए, तब द्रौपदी ने छठ का व्रत रखा था। द्रोपदी के व्रत के फल से पांडवों को अपना राजपाट वापस मिल गया था। इसी तरह छठ का व्रत करने से लोगों के घरों में समृद्धि और सुख आता है। छठ मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश सहित कई क्षेत्रों में छठ का महत्व है।

 


सूर्यवंशी भरत राजाओं का मुख्य पर्व
ऐतिहासिक दृष्टि से सूर्य-उपासना से जुड़ा छठ पर्व भारत के आदि कालीन सूर्यवंशी भरत राजाओं का मुख्य पर्व था। छठ पर्व मगध (बिहार) का सर्वाधिक लोकप्रिय पर्व कैसे बन गया ? इस संबंध में एक पौराणिक मान्यता प्रचलित है कि मगध सम्राट जरासंध के किसी पूर्वज के कुष्ठ रोग को दूर करने के लिए शाकलद्वीपीय मगध ब्राहमणों ने सूर्य-उपासना की थी। तभी से मगध क्षेत्र बिहार में छठ के अवसर पर सूर्य-उपासना का प्रचलन प्रारंभ हुआ। छठ पर्व के साथ आनर्त प्रदेश वर्तमान गुजरात के सूर्यवंशी राजा शर्याति और भार्गव ऋषि च्यवन का भी ऐतिहासिक कथानक जुड़ा है। पौराणिक अनुश्रुति के अनुसार एक बार राजा शर्याति जंगल में शिकार खेल रहे थे तो उनकी पुत्री सुकन्या ने गलतफहमी में दीमक की बांबी में डूबे तपस्यारत च्यवन ऋषि की चमकती हुई दोनों आंखों को फोड़ डाला था। च्यवन ऋषि के शाप से शर्याति के सैनिकों पर घोर उपसर्ग होने लगा। तब प्रायश्चित के रूप में सुकन्या ने कार्तिक मास की षष्ठी तिथि को सूर्य देव की उपासना की तो च्यवन ऋषि के आंखों की ज्योति वापस आ गई।

उधर ‘ब्रहमवैवर्त पुराण’ के अनुसार स्वायम्भुव मनु के पुत्र राजा प्रियवत की जब कोई संतान नहीं हुई तो उन्होंने महर्षि कश्यप के कहने पर पुत्रेष्टि यज्ञ किया जिसके फलस्वरूप उनकी महारानी ने पुत्र को जन्म तो दिया किन्तु वह शिशु मृत पैदा हुआ। बाद में षष्ठी देवी की कृपा से शिशु जीवित हो गया। तभी से प्रकृति का छठा अंश मानी जाने वाली षष्ठी देवी बालकों की रक्षिका और संतान देने वाली देवी के रूप में पूजी जाने लगी-

"षष्ठांशा प्रकृतेर्या च सा च षष्ठी प्रकीर्तिता"

मार्कण्डेय पुराण में  भी इस बात का उल्लेख मिलता है कि सृष्टि की अधिष्ठात्री प्रकृति देवी ने अपने आप को छह भागों में विभाजित किया और इनके छठे अंश को सर्वश्रेष्ठ मातृ देवी के रूप में जाना जाता है, जो ब्रह्मा की मानस पुत्री और बच्चों की रक्षा करने वाली देवी हैं। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को इन्हीं देवी की पूजा की जाती है। शिशु के जन्म के छह दिनों के बाद भी इन्हीं देवी की पूजा करके बच्चे के स्वस्थ, सफल और दीर्घ आयु की प्रार्थना की जाती है।नव दुर्गाओं के सन्दर्भ में पुराणों में इन्हीं देवी का नाम 'कात्यायनी' है, जिनकी नवरात्र की षष्ठी तिथि को ही पूजा की जाती है।

भगवान राम ने भी मनाया था छठपर्व
इस पर्व के बारे में  एक  मान्यता यह भी प्रचलित है कि श्री रामचन्द्र जी जब अयोध्या लौटकर आये तब राजतिलक के पश्चात उन्होंने सूर्यवंश की प्राचीन परम्पराओं का पालन करते हुए माता सीता के साथ कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथि को सूर्य देवता की व्रतोपासना की और उस दिन से जनसामान्य में यह पर्व लोकमान्य हो गया और आस्था एवं भक्ति के साथ यह त्यौहार सामूहिक रूप से मनाया जाने लगा।

आज छठ पर्व बिहार और उत्तर प्रदेश से जुड़ा आंचलिक पर्व तक सीमित नहीं है बल्कि यह पर्व दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई जैसे महानगरों में भी बड़े उत्साह और श्रद्धाभाव से मनाया जाने वाला एक राष्ट्रीय पर्व का रूप धारण कर चुका है। छठ पर्व के दिन देश के कोने-कोने में स्थित तालाबों, सरोवरों और नदियों के घाटों में जिस तरह से सूर्य की पूजा के लिए जन सैलाब उमड़कर आता है उससे लगता है मानो समग्र भारत राष्ट्र पंक्तिबद्ध रूप से एकाकार होकर देश की सुख, समृद्धि और खुशहाली के लिए विश्व अर्थव्यवस्था के नियामक सूर्य देव को और प्रकृति की अधिष्ठात्री षष्ठी देवी को अपनी आस्था, भक्ति और कृतज्ञता ज्ञापन का अर्घ्य चढ़ा रहा हो।

भारतराष्ट्र की अस्मिता,खुशहाली और सांस्कृतिक पहचान से सरोकार रखने वाले लोगों को पूर्वांचल व बिहारवासियों का विशेष आभारी होना चाहिए कि उन्होंने सूर्य पूजा के माध्यम से छठपर्व की पृष्ठभूमि में वैदिक आर्यों के धरोहर स्वरूप सूर्यसंस्कृति की लोकपरंपरा को आज भी जीवित रखा है।भारत के लगभग अस्सी प्रतिशत गांव आज भी कृषि एवं पेयजल के लिए भूमिगत जल पर ही निर्भर हैं परंतु जलापूर्ति के स्रोत दिन-प्रतिदिन घटते जा रहे हैं। ऐसे संकट कालीन परिस्थितियों में भारत के सूर्य उपासकों का देशवासियों को यही संदेश है कि छठ पर्व को महज एक धार्मिक अनुष्ठान के रूप में ही नहीं बल्कि इसे जलसंस्थानों के संरक्षण और संवर्धन के राष्ट्रीय अभियान के रूप में भी मनाया जाना चाहिए ताकि जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पन्न प्राकृतिक प्रकोप शांत हों, नियत समय पर मानसूनों की वर्षा हो और यह देश कृषि सम्पदा से खुशहाल हो सके। 'भारतराष्ट्र' के सूर्यवंशियों की राष्ट्रीय
   अस्मिता व खुशहाली का महापर्व।

छठ पूजा या सूर्य षष्ठी या छठ व्रत में सूर्य भगवान की पूजा होती है और धरती पर लोगों के सुखी जीवन के लिए सूर्य देव के प्रति आभार व्यक्त किया जाता है। सूर्य देव को ऊर्जा और जीवन शक्ति का देवता माना जाता है। इसलिए छठ पर्व पर समृद्धि के लिए पूजा की जाती है।

 


 सूर्य की पूजा से विभिन्न बीमारियों का इलाज संभव है। सूर्य पूजा के साथ स्नान किया जाता है। इससे कुष्ठ रोग जैसी गंभीर रोग भी दूर हो जाते हैं। छठ पर्व परिवार के सदस्यों और मित्रों की लंबी उम्र और समृद्धि के लिए भी मनाया जाता है।


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