Saturday, June 27, 2026

Sharada Chapter 3 Hindi Translation Summary आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः पाठ 3 हिंदी अनुवाद

 Chapter 3 Hindi Translation  Summary  आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः  पाठ 3 हिंदी अनुवाद

Class 9 Sanskrit Chapter 3 Summary Notes आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः

भारत महान ऋषियों और महात्माओं की भूमि है, जिनके जीवन से हमें दया, समानता, क्षमा और करुणा जैसे मूल्य सीखने को मिलते हैं। महाराष्ट्र के प्रसिद्ध संत नामदेव महाराज का जीवन करुणा का एक महान उदाहरण है।

कहानी तब शुरू होती है जब कपिल और माधवी नाम के दो बच्चे खेल-खेल में एक कुत्ते को पत्थर मारकर डराने लगते हैं। उनकी दादी यह देखकर उन्हें पास बुलाती हैं और संत नामदेव की एक प्रेरक कहानी सुनाती हैं।

दादी बताती हैं कि नामदेव भगवान पाण्डुरङ्ग (विट्ठल) के अनन्य भक्त और मित्र थे। उनके गुरु विसोबा ने उन्हें सिखाया था कि ईश्वर केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि सभी प्राणियों में निवास करते हैं।

एक दिन जब नामदेव मंदिर में भगवान को नैवेद्य (भोग) अर्पण कर रहे थे, तभी एक भूखा कुत्ता वहाँ आया और रोटी लेकर भाग गया। नामदेव ने कुत्ते को पीटने के बजाय उसके पीछे घी का पात्र लेकर दौड़ना शुरू किया।

नामदेव को चिंता थी कि कुत्ता सूखी रोटी खाएगा तो उसके पेट में दर्द होगा, इसलिए वे चिल्ला रहे थे, “हे देव ! सूखी रोटी मत खाओ, साथ में घी भी स्वीकार करो।” उनकी इस निस्वार्थ सेवा और करुणा को देखकर कुत्ते के स्थान पर स्वयं भगवान पाण्डुरङ्ग प्रकट हुए और उन्हें उनकी परीक्षा में सफल घोषित किया।

यह कहानी सुनकर कपिल और माधवी को अपनी गलती का एहसास होता है। वे संकल्प लेते हैं कि वे कभी किसी प्राणी को कष्ट नहीं पहुँचाएँगे, क्योंकि सभी जीवों में ईश्वर का वास होता है।

1. भारतदेश: बहूनां ब्रह्मर्षीणां महात्मनां च भूमिः । तेषां चरित्राणि सकलस्य विश्वस्य कृते प्रेरणास्पदम्। तेषां चरित्रेषु प्रतिपदं भूतदया, समता, क्षमा, अहिंसा, करुणा, ऋजुता, बन्धुता चेत्यादीनि जीवनमूल्यानि प्राप्यन्ते । महाराष्ट्रस्य प्रसिद्धः महात्मा नामदेवमहाराजः स्वीयव्यवहारेण करुणायाः महान्तम् आदर्शम् उपस्थापितवान्। सः सर्वात्मकस्य ईश्वरस्य न केवलं सङ्कीर्तनं कृतवान् अपि तु सर्वेषु जीवेषु सः भगवन्तं दृष्टवान्। नामदेवमहाराजस्य जीवनस्य काचित् शिक्षाप्रदा घटना अत्र प्रदर्शिता अस्ति यां पठित्वा अस्माकं जीवनं परिवर्तितं भवेत्। (पृष्ठ 22)

शब्दार्था:-

  • बहुनाम् – बहुत से / अनेकं

  • ब्रह्मर्षीणाम् – ब्रह्मर्षियों का।

  • महात्मनाम् – महात्माओं का।

  • सकलस्य – संपूर्ण ।

  • विश्वस्य कृते – विश्व के लिए ।

  • प्रेरणास्पदम् – प्रेरणा का स्रोत ।

  • प्रतिपदम् – हर कदम पर।

  • भूतदया – जीवों पर दया ।

  • ऋजुता – सरलता ।

  • चेत्यादीनि – (च इत्यादि) और आदि ।

  • स्वीयव्यवहारेण – अपने व्यवहार से।

  • उपस्थापितवान् – प्रस्तुत किया।

  • सङ्कीर्तनम् – भगवान का भजन-कीर्तन ।

  • जीवेषु – जीवों में परिवर्तितं

  • भवेत् – बदल जाए ।

सरलार्थ:- भारत देश बहुत-से ब्रह्मर्षियों और महात्माओं की भूमि है। उनके चरित्र पूरे विश्व के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं। उनके चरित्रों में हर कदम पर जीवों पर दया, समानता, क्षमा, अहिंसा, करुणा, सरलता और भाईचारा जैसे जीवन मूल्य मिलते हैं। महाराष्ट्र के प्रसिद्ध महात्मा नामदेव महाराज ने अपने व्यवहार से करुणा का एक महान आदर्श प्रस्तुत किया। उन्होंने न केवल सर्वव्यापी ईश्वर का भजन-कीर्तन किया, बल्कि सभी जीवों में भगवान के दर्शन किए। यहाँ नामदेव महाराज के जीवन की एक शिक्षाप्रद घटना दिखाई गई है, जिसे पढ़कर हमारा जीवन बदल सकता है।

2. कपिलः माधवी च अवकाशकाले मातुलगृहं गतवन्तौ । तत्र क्रीडावेलायां कञ्चन शुनकं दृष्टवन्तौ। तं दृष्ट्वा पाषाणखण्डं हस्ते स्वीकृत्य तं मारयितुं धावितवन्तौ । शुनकः भयेन आक्रोशं कुर्वन् वेगेन धावितवान् । तत् दृष्ट्वा कपिलः माधवी च उच्चैः हसितवन्तौ । मातामही तं प्रसङ्गं दूरात् दृष्टवती, तौ आहूतवती च । 

शब्दार्था:-

  • अवकाशकाले – छुट्टियों के समय में ।

  • मातुलगृहम् – मामा के घर ।

  • गतवन्तौ – गए ।

  • क्रीडावेलायाम् – खेल के समय ।

  • कञ्चन शुनकम् – किसी कुत्ते को ।

  • पाषाणखण्डम् – पत्थर का टुकड़ा।

  • मारयितुम् – मारने के लिए |

  • धावितवन्तौ – दौड़े।

  • आक्रोशं कुर्वन् – चिल्लाते हुए ।

  • उच्चैः हसितवन्तौ – जोर से हँसे ।

  • मातामही – नानी।

  • प्रसङ्गम् – घटना को ।

  • आहूतवती – बुलाया ।

सरलार्थ:- कपिल और माधवी छुट्टियों के समय अपने मामा के घर गए। वहाँ खेल के समय उन्होंने एक कुत्ते को देखा । उसे देखकर (उन्होंने) हाथ में पत्थर का टुकड़ा लिया और उसे मारने के लिए दौड़े। कुत्ता डर के मारे चिल्लाता हुआ तेजी से भागा। यह देखकर कपिल और माधवी ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे। नानी ने इस पूरी घटना को दूर से देखा और उन दोनों को (अपने पास) बुलाया।

3. मातामही – भोः कपिल! माधवि ! किं कुरुत: ?
कपिल: – मातामहि ! पश्यतु किल। सः शुनकः आवयोः क्रीडायां मध्ये मध्ये प्रविश्य आवां पीडयति स्म। अतः आवां तं सम्यक् दण्डितवन्तौ । (पुनः उच्चैः हसितवन्तौ)
मातामही – वत्सौ, अधुना क्रीडया अलम् । कथां श्रोतुम् इच्छतः वा?
उभावपि – मातामह्याः कथा ! रोचते मे कथा रोचते मे मातामही ।
(मातामहीम् आलिङ्गितवन्तौ)
मातामही – उपविशताम्, सावधानेन शृणुतां च । अस्माकं भारतभूमिः अनेकेषां नररत्नानां ब्रह्मर्षीणां राजर्षीणां च प्रसवित्री । बहवः सत्पुरुषाः स्वीयकर्तृत्वेन जन्म सार्थकं कृतवन्तः । किं भवन्तौ महात्मानं नामदेवं जानीत: ? (पृष्ठ 23)

शब्दार्था:-

  • मातामही – नानी / दादी |

  • भोः – अरे / हे !

  • किं कुरुतः – क्या कर रहे हो।

  • पश्यतु – देखिए ।

  • किल – सचमुच ।

  • शुनकः – कुत्ता ।

  • आगत्य – आकर।

  • क्रीडायाम् – खेल में।

  • प्रविश्य – प्रवेश करके ।

  • आवाम् – हम दोनों।

  • पीडयति – परेशान करता है ।

  • सम्यक् – अच्छी तरह ।

  • ताडितवन्तौ – मारा / डाँटा ।

  • अधुना – अब

  • क्रीडा अलम् – खेल काफी हुआ।

  • कथां – कहानी ।

  • श्रोतुम् – सुनना ।

  • रोचते – अच्छी लगती है।

  • आलिङ्गितवन्तौ – गले लगाया ।

  • उपविशताम् – बैठ जाओ ।

  • सावधानम् – ध्यानपूर्वकं

  • शृणुताम् – सुनो ।

  • नररत्नानाम् – महान पुरुषों का।

  • राजर्षीणाम् – राजऋषियों का ।

  • प्रसवित्री – जन्म देने वाली ।

सरलार्थ:-
मातामही (नानी) – अरे कपिल ! माधवी ! (तुम) क्या कर रहे हो ?
कपिल – नानी ! देखिए, वह कुत्ता हमारे खेल के बीच-बीच में प्रवेश करके हमें परेशान कर रहा था। इसलिए हमने उसे अच्छी तरह डाँट दिया।
मातामही (नानी) – बच्चो, अब खेल काफी हो गया। क्या तुम कहानी सुनना चाहते हो ?
दोनों – नानी कहानी! हमें कहानी सुनना बहुत अच्छा लगता है।
(नानी बच्चों को प्यार से गले लगाती है।)
मातामही (नानी) – बैठ जाओ और ध्यान से सुनो। हमारी भारत भूमि अनेक महान पुरुषों और राजऋषियों को जन्म दी है। बहुत-से अच्छे लोगों ने अपने कर्तव्य से अपने जीवन को सफल बनाया है। क्या आप दोनों महात्मा नामदेव को जानते हैं?

4. माधवी – आम्। अहं श्रुतवती यत् तस्य कीर्तने स्वयं देवः पाण्डुरङ्गः नृत्यं कृतवान् इति। अपि सत्यम् ?
मातामही – आम्। तस्यैव पुण्यश्लोकस्य पाण्डुरड्गमित्रस्य नामदेवमहाराजस्य एषा कथा । नामदेवः न केवलं पाण्डुरङ्गस्य प्रियभक्तः अपि तु प्रियमित्रमपि। देवः नामदेवं परितः भवति स्म ।
माधवी – किं सत्यमेव नामदेवस्य मित्रम् आसीत् पाण्डुरड्ग: ?
कपिलः – किं देवेन सह अपि मित्रता सम्भवति ?
मातामही – आम् वत्सौ। देवः पाण्डुरङ्गः नामदेवस्य प्रियसुहृदासीत्। नामदेवः प्रतिदिनं पाण्डुरङ्गाय नैवेद्यं समर्प्य, तं भोजयित्वा ततः परमेव अन्नं सेवते स्म । तस्य गुरुः आसीत् विसोबा । विसोबा तम् अध्यापितवान् यत् ‘ईश्वरः न केवलं मन्दिरे भवति, अपि तु सर्वेषु भूतेषु तस्य निवासो भवति। अतः तस्य सर्वात्मकस्य ईश्वरस्य पूजनं कुरु’ इति । (पृष्ठ 23-24)

शब्दार्था:-

  • कीर्तने – कीर्तन में |

  • स्वयम् – खुद ।

  • नृत्यं कृतवान् – नाच किया।

  • पुण्यश्लोकस्य – पवित्र कीर्ति वाले ।

  • प्रियभक्तः – प्रिय भक्त ।

  • परितः – चारों ओर ।

  • सह – साथ ।

  • वत्सौ – हे बच्चो !

  • नैवेद्यं समर्प्य – भोग लगाकर ।

  • भोजयित्वा – भोजन कराकर ।

  • सेवते स्म – ग्रहण करते थे।

  • सर्वेषु भूतेषु – सभी जीवों में।

सरलार्थ:-
माधवी – हाँ! मैंने सुना है कि उनके कीर्तन में स्वयं देव पाण्डुरङ्ग ने नृत्य किया था। क्या यह सच है?
मातामही (नानी) – हाँ ! यह कहानी उसी पवित्र कीर्ति वाले पाण्डुरङ्ग के मित्र नामदेव महाराज की है। नामदेव न केवल पाण्डुरङ्ग के प्रिय भक्त थे, बल्कि प्रिय मित्र भी थे। भगवान नामदेव के चारों ओर ही रहते थे।
माधवी – क्या सच में पाण्डुरङ्ग नामदेव के मित्र थे?
कपिल – क्या भगवान के साथ भी मित्रता संभव है ?
मातामही – हाँ बच्चो! भगवान पाण्डुरङ्ग नामदेव के प्रिय मित्र थे। नामदेव प्रतिदिन पाण्डुरङ्ग को नैवेद्य (भोग) अर्पित करते थे, उन्हें भोजन कराते थे और उसके बाद ही स्वयं अन्न ग्रहण करते थे। उनके गुरु बिसोबा ने उन्हें सिखाया कि ईश्वर न केवल मंदिर में होता है, बल्कि सभी जीवों में उसका निवास होता है। इसलिए, उस सर्वात्मक (सबमें समाये हुए) ईश्वर की ही पूजा करो ।

5. कपिलः – मातामहि! किं सत्यमेव ईश्वरः सर्वेषु भूतेषु निवसति ?
मातामही – आम्, शृणु वत्स! नामदेवः प्रतिदिनम् अतीव श्रद्धया निष्ठया भक्त्या च नैवेद्यस्थालिकाम् आदाय मन्दिरं गच्छति स्म। एकदा सः नैवेद्यस्थालिकां गृहीत्वा विग्रहस्य पुरतः स्थापितवान् । नेत्रे निमील्य प्रार्थनां कृतवान्- (पृष्ठ 24)

शब्दार्था:-

  • निवसति – निवास करता है ।

  • शृणु – सुनो ।

  • अतीव श्रद्धया – अत्यधिक श्रद्धा के साथ।

  • निष्ठया – लगन से।

  • नैवेद्यस्थालिकाम् – भोग की थाली।

  • गच्छति स्म – जाते थे।

  • एकदा – एक बार।

  • आदाय – लेकर ।

  • गृहीत्वा – लेकर ।

  • विग्रहस्य – मूर्ति के ।

  • पुरतः – सामने ।

  • स्थापितवान् – रखा।

  • नेत्रे निमील्य – आँखें बंद करके ।

  • प्रार्थनां कृतवान् – प्रार्थना की।

सरलार्थ:-
कपिल नानी जी! क्या सच में ईश्वर सभी प्राणियों में निवास करता है।
मातामही – हाँ, सुनो बेटा ! नामदेव प्रतिदिन अत्यधिक श्रद्धा, निष्ठा और भक्ति के साथ नैवेद्य की थाली लेकर मंदिर जाते थे। एक बार वे नैवेद्य की थाली लेकर मूर्ति के सामने रख दिए। फिर उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं और प्रार्थना करने लगे-

6. नैवेद्यं गृह्यतां देव भक्तिं मे चलां कुरु ।
ईप्सितं मे वरं देहि परत्र च परां गतिम् ॥ (पृष्ठ 24)

शब्दार्था:-

  • गृह्यताम् – स्वीकार कीजिए ।

  • मे – मेरी ।

  • ह्यचलां – स्थिर ।

  • ईप्सितं – मनचाहा ।

  • परत्र – परलोक में ।

  • परां गतिम – परम पद ।

अन्वयः – हे देव! (इदं) नैवेद्यं गृह्यताम्, मे भक्तिं हि अचला कुरु । मे ईप्सितं वरं देहि, परत्र च परां गतिं (देहि) ।
सरलार्थ :- हे भगवान! आप इस नैवेद्य को स्वीकार कीजिए और मेरी भक्ति को स्थिर कर दीजिए। मुझे मेरा मनचाहा वरदान दीजिए और परलोक में मुझे परम गति (मोक्ष) प्रदान कीजिए ।

7. शर्कराखण्डखाद्यानि दधिक्षीरघृतानि च।
आहारं भक्ष्यभोज्यं च नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम् ॥ (पृष्ठ 24)

शब्दार्था :-

  • शर्कराखण्ड – शक्कर के टुकड़े / मिश्री ।

  • खाद्यानि – खाने योग्य अन्य पदार्थ ।

  • दधि – दही ।

  • क्षीर – दूध ।

  • घृतानि – घी ।

  • भक्ष्यभोज्यं – चबाकर और निगलकर खाए जाने वाले पदार्थ ।

  • प्रतिगृह्यताम् – स्वीकार करें।

अन्वयः- शर्कराखण्डखाद्यानि दधिक्षीरघृतोनि च, (एवं) भक्ष्यभोज्यं आहारं च (इदं) नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम् ।
सरलार्थ:- मिश्री, मिठाई, दही, दूध और घी – इन सबसे युक्त भोजन के रूप में जो विभिन्न प्रकार के खाने योग्य पदार्थ मैं लाया हूँ। इस नैवेद्य को आप स्वीकार करें।

8. मन्त्रम् उच्चार्य श्रद्धया प्रणम्य सः नेत्रे उद्घाटितवान् अहो आश्चर्यम्! पुरतः स्थितायां स्थालिकायां रोटिका नासीत् ।
माधवी – पाण्डुरड्गः आगत्य भक्षितवान् किल?
मातामही – न हि । कश्चन बुभुक्षितः शुनकः आगत्य रोटिकां मुखे गृहीत्वा धावितवान् ।
कपिल: – धिक् शुनकम्! मातामहि ! पश्यतु, शुनकाः दुष्टाः एव भवन्ति ।
माधवी – सत्यं भ्रातः ! नामदेवस्य कियत् दुःखं जातं स्यात् खलु।
मातामही – पुत्रकौ, शृणुताम्। नामदेवः शुनकस्य पृष्ठे अनुधावितवान् । जानीतः किमर्थं कथं च ? (पृष्ठ 24)

शब्दार्था:-

  • उच्चार्य – उच्चारण करके ।

  • प्रणम्य – प्रणाम करके ।

  • नेत्रे उद्धातिवान् – आँखें खोलीं।

  • अहो आश्चर्यम् – अरे, बड़े आश्चर्य की बात है।

  • पुरतः स्थितायाम् – सामने रखी हुई ।

  • स्थालिकायाम् – थाली में।

  • भक्षितवान् किल ? – क्या खा लिया ? |

  • धावितवान् – भाग गया।

  • कियत् दुःखं – कितना दुख ।

  • पृष्ठे अनुधावितवान् – पीछे-पीछे भागा।

सरलार्थ:- मन्त्र का उच्चारण करके और श्रद्धापूर्वक प्रणाम करके उन्होंने (नामदेव ने) आँखें खोलीं। अरे, आश्चर्य ! सामने रखी हुई थाली में रोटी नहीं थी ।
माधवी – क्या पाण्डुरङ्ग ने आकर (रोटी) खा ली ? मातामही – नहीं। कोई भूखा कुत्ता आया और रोटी मुँह में दबाकर भाग गया।
कपिल – कुत्ते को धिक्कार है। नानी जी, देखिए, कुत्ते दुष्ट ही होते हैं।
माधवी – सत्य है भाई! नामदेव को कितना दुख हुआ होगा, है न?
मातामही – बच्चो, सुनो ! नामदेव उस कुत्ते के पीछे-पीछे भागे । क्या तुम जानते हो किसलिए और कैसे?

9. कपिल: – क्रोधेन लगुडम् आदाय शुनकं ताडयितुं धावितवान् स्यात्!
माधवी – दण्डयितुं पाषाणखण्डम् आदाय धावितवान् स्यात् ! सत्यं किल मातामहि !
मातामही – न हि बालौ! नामदेवः कोपेन न धावितवान्, प्रत्युत सः करुणया धावितवान्। न लगुडं, न पाषाणखण्डम्, अपि तु घृतपात्रं धृत्वा ।
उभावपि – (साश्चर्यम् उच्चैः ) किं घृतपात्रम् आधृत्य ?
मातामही – आम्, घृतपात्रम् आधृत्य एव ।
उभौ – किन्तु किमर्थम् ?
मातामही – जातौ, शुनकः शुष्करोटिकाम् अपहृत्य पलायितवान् खलु। महात्मनः नामदेवस्य चिन्ता आसीत् यत् यदि शुनकः शुष्करोटिकां खादेत् तर्हि तस्य उदरवेदना भवेत् इति । अतः तस्य पीडा मा भवतु इति चिन्तयन् घृतपात्रम् आदाय ‘हे देव! शुष्कां रोटिकां मा खादतु, घृतम् अपि स्वीकरोतु’ इति वदन् अनुधावितवान् सः ।
(उभौ परस्परं पश्यतः । अपराधभावनया तयोः मुखे म्लाने आस्ताम्।) (पृष्ठ 25-26)

शब्दार्था:-

  • क्रोधेन – गुस्से से ।

  • लगुडम् – डंडा ।

  • शुनकम् – कुत्ते को ।

  • ताडयितुम् – पीटने के लिए।

  • पाषाणखण्डम् – पत्थर का टुकड़ा।

  • धावितवान् – दौड़ा।

  • प्रत्युत – इसके विपरीत।

  • करुणया – दया भाव से ।

  • घृतपात्रम् – घी का पात्र ।

  • आधृत्य – पकड़कर।

  • शुष्करोटिकाम् – सूखी रोटी को ।

  • अपहृत्य – चुराकर ।

  • पलायितवान् – भाग गया।

  • उदरवेदना – पेट में दर्द।

सरलार्थ:-
कपिल – (शायद वह) गुस्से में लाठी लेकर कुत्ते को पीटने के लिए दौड़ा होगा।
माधवी – सजा देने के लिए पत्थर का टुकड़ा लेकर दौड़ा होगा। क्या यह सच है नानी जी ?
मातामही – नहीं बच्चो ! नामदेव गुस्से से नहीं दौड़े थे, बल्कि (नानी) वे तो दया भाव से दौड़े थे। न लाठी, न पत्थर, बल्कि वे तो घी का कटोरा लेकर (दौड़े थे) ।
दोनों – (आश्चर्य के साथ जोर से) क्या घी का कटोरा लेकर?
मातामही – हाँ, घी का कटोर लेकर ही ?
दोनों – लेकिन किसलिए?
मातामही – बच्चो, कुत्ता सूखी रोटी छीनकर भाग गया था। महात्मा नामदेव को यह चिंता थी कि यदि कुत्ता सूखी रोटी खाएगा, तो उसके पेट में दर्द हो सकता है। इसलिए उसे पीड़ा (दर्द) हो सकता है। इसलिए उसे पीड़ा (दर्द) न हो, यह सोचकर वे घी का पात्र लेकर (दौड़े और बोले ) – “हे देव ! सूखी रोटी न खाएँ। घी भी स्वीकार करें।” बोलते हुए पीछे-पीछे वे (वह) दौड़े।
(दोनों एक-दूसरे को देखते हैं। अपराधबोध की भावना के कारण उन दोनों के चेहरे मुरझा गए थे।)

10. मातामही – धावन् शुनकः अदृश्यः जातः । तस्य स्थाने पाण्डुरड्गः आविर्भूतः। स नामदेवम् उक्तवान्-‘वत्स नामदेव ! उत्तीर्णः भवान् परीक्षाम्। ‘ईश्वरः सर्वेषु भूतेषु निवसति’ इति गुरूपदेशं न केवलं भवान् श्रुतवान् अपि तु अनुपालितवान्। सुतरां धन्यो भवान् ।
कपिलः – मातामहि! अहं प्रमादं कृतवान् । अकारणं हि शुनकं ताडितवान्। इतः पूर्वमपि बहुवारं जीवान् पीडितवान्। अद्य अहं ज्ञातवान् यत् सर्वेषु जीवेषु ईश्वरः निवसति, अत: कमपि न पीडयिष्यामि इति ।
माधवी – मातामहि! क्षाम्यतु माम् । अहमपि कदापि कस्यापि पीडां न जनयिष्यामि ।
मातामही – चिरञ्जीविनौ! मां निकषा आगच्छताम् । (आलिङ्गनं कृत्वा) अस्माकं कायेन वाचा मनसा वा कस्यापि पीडा न भवेत्। तथैव कस्यापि या कापि पीडा स्यात् तां निवारयितुं प्रयतामहे इति सङ्कल्पं कुर्भः । इदमस्तु अस्माकं ध्येयम्-‘आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः ।’ (पृष्ठ 26)

शब्दार्थाः-

  • अदृश्यः – गायब / ओझल ।

  • पाण्डुरङ्गः – भगवान विट्ठल (कृष्ण) ।

  • आविर्भूतः – प्रकट हुए।

  • उत्तीर्णः – सफल ।

  • सर्वेषु भूतेषु – सभी प्राणियों में।

  • अनुपालितवान् – पालन किया।

  • सुतरां – अत्यन्त ।

  • प्रमादं – भूल / गलती ।

  • क्षाम्यतु – क्षमा करें।

  • निकषा – समीप ।

  • आलिङ्गनं – गले लगाना ।

  • कायेन वाचा मनसा – शरीर, वाणी और मन से ।

  • निवारयितुम् – दूर करने के लिए।

सरलार्थ:-
मातामही – दौड़ता हुआ कुत्ता गायब हो गया। उसके स्थान पर भगवान पाण्डुरङ्ग (विट्ठल) प्रकट हुए। उन्होंने नामदेव से कहा- ‘वत्स नामदेव ! आप परीक्षा में उत्तीर्ण हुए।’ ‘ईश्वर सभी प्राणियों में निवास करता है। इस गुरु-उपदेश को न केवल आपने सुना, बल्कि उसका पालन भी किया। आप वास्तव में धन्य हैं।’
कपिल – नानी जी! मैंने भूल की है। मैंने बिना कारण ही कुत्ते को पीटा था। इससे पहले भी कई बार जीवों को सताया है। आज मैंने जान लिया है कि सभी जीवों में ईश्वर निवास करता है, अतः अब मैं किसी को भी नहीं सताऊँगा ।
माधवी – नानी जी ! मुझे क्षमा करें। मैं भी कभी किसी को कष्ट नहीं दूँगी।
मातामही – आयुष्मान भव ! मेरे पास आओ। (गले लगाकर) हमारे शरीर वाणी या मन से किसी को भी कष्ट न हो। साथ ही, यदि किसी को कोई भी कष्ट हो, तो उसे दूर करने का हम प्रयास करेंगे- ऐसा संकल्प करते हैं। यही हमारा ध्येय (लक्ष्य) होना चाहिए-
“जो सभी प्राणियों को अपने समान देखता है, वही वास्तव में पंडित (ज्ञांनी) है।”

(क) ‘प्रति’ इति शब्दस्य अर्थः आभिमुख्यम् इति । प्रति-शब्दयोगे द्वितीया विभक्तिः भवति। अतः प्रति – शब्दयोगे मन्दिर इति शब्दस्य द्वितीया ।
यथा— नामदेवः प्रतिदिनं मन्दिरं प्रति गच्छति स्म।
बालः सदा मातरं प्रति धावति ।

(ख) ‘विना’ इति पदस्य योगे द्वितीया, तृतीया, पञ्चमी चेति विभक्तयः भवन्ति ।
यथा – अहं कारणं विना शुनकं ताडितवान् ।
अहं कारणेन विना शुनकं ताडितवान् ।
अहं कारणात् विना शुनकं ताडितवान्।

(ग) ‘धिक्’ इति शब्दः निन्दावाचकः । धिक् इति शब्दस्य योगे द्वितीया विभक्तिः भवति ।
यथा- धिक् शुनकम्। धिक् दुर्जनम् ।

(घ) ‘निकषा’ इति शब्दस्य अर्थः समीपम् इति। निकषा इति शब्दस्य योगे द्वितीया विभक्तिः भवति ।
यथा – कपिलः मातामहीं निकषा आगतवान्।
केशवस्य गृहं पाठशालां निकषा

(ङ) ‘परित:’ इति शब्दस्य अर्थः परिवृत्य / सर्वस्मिन् पार्श्व इति । परितः इति शब्दयोगे द्वितीया विभक्तिः भवति ।
यथा- देवं परितः भक्ताः सन्ति ।
शिक्षकं परितः छात्राः भवन्ति ।

(च) ‘सह, साकं, सार्धं, समम्’ इति शब्दानां योगे तृतीया विभक्तिः भवति ।
यथा – माधवी कपिलेन सह भ्रमति ।
जनकेन सह पुत्री क्रीडति ।
त्वं मित्रेण साकं धावसि ।
सः पित्रा सार्धम् आगच्छति ।
राम, लक्ष्मणेन समं वनं गच्छति ।
अहम् अनुजेन साकं ग्रामं गच्छामि ।

(छ) ‘अलम्’ इति शब्दस्य योगेऽपि तृतीया विभक्तिः भवति ।
यथा- अलं क्रीडया । अलं विस्तरेण ।
अलम् आलस्येन। अलं कलहेन ।
अलं क्रोधेन ।
सरलार्थ:-
उपपद विभक्तियाँ ‘उप’ शब्द का अर्थ हैं – सामीप्य (निकटता) । समीप स्थित पद के आधार पर जो विभक्ति लगती है, उसे उपपद – विभक्ति कहते हैं।
(क) ‘प्रति’ इस शब्द का अर्थ ‘की ओर’ है। ‘प्रति’ शब्द के योग में द्वितीया विभक्ति होती है। इसलिए ‘प्रति’ शब्द के योग में ‘मन्दिरं’ और ‘मातरं’ शब्द में द्वितीया विभक्ति लगी है।
यथा-

  • नामदेवः प्रतिदिनं मन्दिरं प्रति गच्छति।

  • बालः सदा मातरं प्रति धावति ।

(ख) ‘विना’ इस पद के योग में द्वितीया, तृतीया और पञ्चमी विभक्तियाँ होती हैं।
यथा-

  • अहं कारणं विना शुनकं ताडितवान् । (द्वितीया)

  • अहं कारणेन विना शुनकं ताडितवान्। (तृतीया)

  • अहं कारणात् विना शुनकं ताडितवान् । (पञ्चमी)

(ग) ‘धिक्’ यह शब्द ‘निन्दावाचक’ है। ‘धिक्’ शब्द के योग में द्वितीया विभक्ति होती है।
यथा-

  • धिक् शुनकम्।

  • धिक् दुर्जनम्।

(घ) ‘निकषा’ इस शब्द का अर्थ ‘समीप (पास)’ है। ‘निकषा’ शब्द के योग में द्वितीया विभक्ति होती है।
यथा-

  • कपिलः मातामहीं निकषा आगतवान् ।

  • केशवस्य गृहं पाठशालां निकषा अस्ति ।

(ङ) ‘परित:’ इस शब्द का अर्थ ‘चारों ओर’ या सभी दिशाओं में/ हर तरफ है। ‘परितः ‘ शब्द के योग में द्वितीया विभक्ति होती है।
यथा-

  • देवं परितः भक्ताः सन्ति।

  • शिक्षकं परितः छात्राः भवन्ति ।

(च) ‘सह, साकं, सार्धं, समम्’ – इन सभी का अर्थ ‘साथ’ है। इन शब्दों के योग में तृतीया विभक्ति होती है।
यथा-

  • माधवी कपिलेन सह भ्रमति ।

  • जनकेन सह पुत्री क्रीडति ।

  • त्वं मित्रेण साकं धावसि ।

  • सः पित्रा सार्धम् आगच्छति।

  • राम, लक्ष्मणेन समं वनं गच्छति ।

  • अहम् अनुजेन साकं ग्रामं गच्छामि ।

(छ) ‘अलम्’ (बस करो / मत करो) इस शब्द के योग में भी तृतीया विभक्ति होती है।
यथा-

  • अलं क्रीडया।

  • अलं विस्तरेण ।

  • अलं आलस्येन ।

  • अलं कलहेन।

  • अलं क्रोधेन ।



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