Tuesday, May 8, 2018

पं. श्रद्घाराम फिल्लौरी ने हिन्दी, संस्कृत, पंजाबी आदि भाषाओं में कई पुस्तकें लिखी है। भाग्यवती नामक


पं. श्रद्घाराम फिल्लौरी ने हिन्दी, संस्कृत, पंजाबी आदि भाषाओं में कई पुस्तकें लिखी है। भाग्यवती नामक
इन्होंने ओम जय जगदीश हरे आरती की रचना 1870 ई. में की थी। इनकी यह रचना उन दिनों भी उतनी ही लोकप्रिय थी जितनी आज है।

पं. श्रद्घाराम फिल्लौरी ने हिन्दी, संस्कृत, पंजाबी आदि भाषाओं में कई पुस्तकें लिखी है। भाग्यवती नामक इनकी पुस्तक को हिन्दी का पहला उपन्यास माना जाता 
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हिंदुओं की धार्मिक अनुष्ठानों में अकसर ये आरती सुनाई पड़ती है.

ओम जय जगदीश हरे...ये आरती उत्तर भारत में वर्षों से करोड़ों हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को स्वर देती रही है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसके रचयिता पर ब्रितानी सरकार के खिलाफ प्रचार करने के आरोप भी लगे थे?

पंजाब के छोटे से शहर फिल्लौर के रहने वाले श्रद्धा राम फिल्लौरी ने इस आरती को शब्द दिए थे. 30 सितंबर को उनकी 175वीं वर्षगांठ है.

आरती में शामिल पंक्ति - 'श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा' में श्रद्धा शब्द जहां धार्मिक श्रद्धा बढ़ाने को कहता है, वहीं ये संभवतः इसके रचयिता की तरफ भी इशारा करता है.

फिल्लौरी का हिंदी साहित्य में भी अहम योगदान रहा है. कुछ विद्वान 1888 में आए उनके उपन्यास 'भाग्यवती' को हिंदी का पहला उपन्यास मानते हैं.

मूर्ति

Image caption30 सितंबर को श्रद्धा राम फिल्लौरी की 175वीं वर्षगांठ है.

फिल्लौरी के शहर और आसपास के अधिकतर लोग उनके नाम से परिचित हैं. शहर के बस अड्डे पर उनकी मूर्ति लगाई गई है. दरअसल यहां के लोगों में भी कुछ साल पहले ही उन्हें लेकर जागरुकता बढ़ी है.

श्रद्धा राम ट्रस्ट चलाने वाले अजय शर्मा कहते हैं, ''लगभग 20 साल तक ये मूर्ति नगर परिषद के दफ्तर में पड़ी रही. फिर साल 1995 में बेअंत सिंह सरकार ने इसे बाहर निकाला और इसे लगाया गया.''

वे बताते हैं, ''हर साल उनके जन्म दिवस पर यहां एक कार्यक्रम आयोजित किया जाता है जिसमें श्रद्धा राम को श्रद्धांजलि दी जाती है और उनके बारे में जानकारी साझा की जाती है. इस बार 175वीं वर्षगांठ पर कार्यक्रम कुछ बड़ा आयोजन होगा.''

शहर निकाला

श्रद्धा राम फिल्लौरी का जन्म 1837 में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था. उनके शहर के लोग बताते हैं कि जब वे महाभारत की कथा सुनाते थे तो सुनने के लिए काफी लोग जुटा करते थे.

उन पर 1865 में ब्रितानी हुकूमत के खिलाफ प्रचार करने के आरोप लगे और उन्हें शहर से निकाल दिया गया था.

उन्होंने कुछ समय तक शहर से बाहर जा कर काम किया और फिर वापस अपने घर आ गए. 43 वर्ष की उम्र में उनका देहांत हो गया.

यहां के लोग श्रद्धा राम को 'पंडित जी' कह कर याद करते हैं. वे बताते हैं कि श्रद्धा राम ने अपने ज़माने में भ्रूण हत्या जैसी सामाजिक बुराईयों के खिलाफ अभियान चलाया था.

शर्मा कहते हैं कि अब उनके बारे में जानकारी बढ़ने लगी है और कुछ लोग उन पर अध्ययन भी करना चाहते हैं.
भारत और विदेशों में गाई जाती है. ये हरफ़नमौला रमल भी खेलते थे. फिल्म ‘पूरब और पश्चिम’ ने इस आरती को सिनेमा का ग्लैमर दिया लेकिन इस आरतीकी पंक्तियाँ- ‘….तेरा तुझ को अर्पण क्या लागे मेरा’मूल आरती में नहीं है. जहाँ तक दृष्टि जाती है इस फिल्म के बाद इस आरती के स्वरूप को तेज़ी से बदलते देखा है. स्वामी शिवानंद जैसे अग्रणी वेदांती के साथ कब इस आरती को जोड़ दिया गया पता ही नहीं चला लेकिन यह अज्ञान से उपजा प्रक्षिप्त अंश है. 

ख़ैर !कभी-कभी कोई भजन इतना लोकप्रिय हो जाता है कि विद्वानों की लापरवाही और जन-कीर्तन की बेपरवाही का शिकार हो जाता है. आप इसे जैसे पहले गाते रहे हैं उसे गाते रहिए. इस आरती का शुद्ध रूप केवल 

भवानी अष्टकं

भवानी अष्टकं

न तातो न माता न बन्धुर्न दाता
न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता।
न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥१॥

हे भवानि! पिता, माता, भाई, दाता, पुत्र, पुत्री, भृत्य, स्वामी, स्त्री, विद्या और वृत्ति–इनमें से कोई भी मेरा नहीं है, हे देवि! एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो, तुम्ही मेरी गति हो।

भवाब्धावपारे महादुःखभीरुः
पपात प्रकामी प्रलोभी प्रमत्तः।
कुसंसारपाशप्रबद्धः सदाहं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥२॥

मैं अपार भवसागर में पड़ा हूँ, महान दु:खों से भयभीत हूँ, कामी, लोभी, मतवाला तथा घृणायोग्य संसार के बन्धनों में बँधा हुआ हूँ, हे भवानि! अब एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो।

न जानामि दानं न च ध्यानयोगं
न जानामि तन्त्रं न च स्तोत्रमन्त्रम्।
न जानामि पूजां न च न्यासयोगम्
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥३॥

हे देवि! मैं न तो दान देना जानता हूँ और न ध्यानमार्ग का ही मुझे पता है, तन्त्र और स्तोत्र-मन्त्रों का भी मुझे ज्ञान नहीं है, पूजा तथा न्यास आदि की क्रियाओं से तो मैं एकदम कोरा हूँ,
अब एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो।

न जानामि पुण्यं न जानामि तीर्थं
न जानामि मुक्तिं लयं वा कदाचित्।
न जानामि भक्तिं व्रतं वापि मातर्
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥४॥

न पुण्य जानता हूँ, न तीर्थ, न मुक्ति का पता है न लय का। हे माता! भक्ति और व्रत भी मुझे ज्ञात नहीं है, हे भवानि! अब केवल तुम्हीं मेरा सहारा हो।

कुकर्मी कुसंगी कुबुद्धिः कुदासः
कुलाचारहीनः कदाचारलीनः।
कुदृष्टिः कुवाक्यप्रबन्धः सदाहम्
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥५॥

मैं कुकर्मी, बुरी संगति में रहने वाला, दुर्बुद्धि, दुष्टदास, कुलोचित सदाचार से हीन, दुराचारपरायण, कुत्सित दृष्टि रखने वाला और सदा दुर्वचन बोलने वाला हूँ, हे भवानि! मुझ अधम की एकमात्र तुम्हीं गति हो।

प्रजेशं रमेशं महेशं सुरेशं
दिनेशं निशीथेश्वरं वा कदाचित्।
न जानामि चान्यत् सदाहं शरण्ये
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥६॥

मैं ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, सूर्य, चन्द्रमा तथा अन्य किसी भी देवता को नहीं जानता, हे शरण देने वाली भवानि! एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो।

विवादे विषादे प्रमादे प्रवासे
जले चानले पर्वते शत्रुमध्ये।
अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहि
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥७॥

हे शरण्ये! तुम विवाद, विषाद, प्रमाद, परदेश, जल, अनल, पर्वत, वन तथा शत्रुओं के मध्य में सदा ही मेरी रक्षा करो, हे भवानि! एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो।

अनाथो दरिद्रो जरारोगयुक्तो
महाक्षीणदीनः सदा जाड्यवक्त्रः।
विपत्तौ प्रविष्टः प्रणष्टः सदाहं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥८॥

हे भवानि! मैं सदा से ही अनाथ, दरिद्र, जरा-जीर्ण, रोगी, अत्यन्त दुर्बल, दीन, गूंगा, विपदा से ग्रस्त और नष्ट हूँ, अब तुम्हीं एकमात्र मेरी गति हो।
इति श्रीमच्छड़्कराचार्यकृतं भवान्यष्टकं सम्पूर्णम्।

सांख्यकारिका श्लोक

सांख्यकारिका सभी श्लोक

आचार्यश्रीईश्वरकृष्णविरचिता सांख्यकारिकासम्पाद्यताम्

दु:खत्रयाभिघाताज्जिज्ञासा तदपघातके हेतौ ।
दृष्टे साऽपार्था चेन्नैकान्तात्यन्तोऽभावात् ॥ १ ॥

 
दृष्टवदानुश्रविक: स ह्यविशुद्धिक्षयातिशययुक्त्: ।
तद्विपरीत: श्रेयान् व्यक्ताव्यक्तज्ञविज्ञानात् ॥ २ ॥

 
मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्या: प्रकृतिविकृतय: सप्त ।
षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्न विकृति: पुरुष: ॥ ३ ॥

 
दृष्टमनुमानमाप्तवचनं च सर्वप्रमाणसिद्धत्वात् ।
त्रिविधं प्रमाणमिष्टं प्रमेयसिद्धि: प्रमाणाद्धि ॥ ४ ॥

 
प्रतिविषयाध्यवसायो दृष्टं त्रिविधमनुमानमाख्यातम् ।
तल्लिङ्गलिङ्गिपूर्वकमाप्तश्रुतिराप्तवचनं तु ॥। ५ ॥

 
सामान्यतस्तु दृष्टादतीन्द्रियाणां प्रतीतिरनुमानात् ।
तस्मादपि चासिद्धं परोक्षमाप्तागमात्सिद्धम् ॥ ६ ॥

 
अतिदूरात् सामीप्यादिन्द्रियघातान्मनोऽनवस्थानात् ।
सौक्ष्म्याद्व्यवधानादभिभवात् समानाभिहाराच्च ॥ ७ ॥

 
सौक्ष्म्यात्तदनुपलब्धिर्नाभावात् कार्यतस्तदुपलब्धे: ।
महदादि तच्च कार्यं प्रकृतिसरूपं विरूपं च ॥ ८ ॥

 
असदकरणादुपादानग्रहणात् सर्वसम्भवाभावात् ।
शक्तस्य शक्यकरणात् कारणभावाच्च सत्कार्यम् ॥ ९ ॥

हेतुमदनित्यमव्यापि सक्रियमनेकमाश्रितं लिंङ्गम् ।
सावयवं परतन्त्रं व्यक्तं विपरीतमव्यक्तम् ॥ १० ॥

 
त्रिगुणमविवेकि विषय: सामान्यमचेतनं प्रसवधर्मि ।
व्यक्तं तथा प्रधानं तद्विपरीतस्तथा च पुमान् ॥ ११ ॥

 
प्रीत्यप्रीतिविषादात्मका: प्रकाशप्रवृत्तिनियमार्था: ।
अन्योन्याभिभवाश्रयजननमिथुनवृत्तयश्च गुणा: ॥ १२ ॥

 
सत्त्वं लघु प्रकाशकमिष्टमुपष्टम्भकं चलं च रज: ।
गुरु वरणकमेव तम: प्रदीपवच्चार्थतो वृत्ति: ॥ १३ ॥

 
अविवेक्यादे: सिद्धिस्त्रैगुण्यात् तद्विपर्ययाभावात् ।
कारणगुणात्मकत्वात् कार्यस्याव्यक्तमपि सिद्धम् ॥ १४ ॥

 
भेदानां परिमाणात् समन्वयात् शक्तित: प्रवृत्तेश्च ।
कारणकार्यविभागादविभागाद् वैश्वरूप्यस्य ॥ १५ ॥

 
कारणमस्त्यव्यक्तं प्रवर्तते त्रिगुणत: समुदयाच्च ।
परिणामत: सलिलवत् प्रतिप्रतिगुणाश्रयविशेषात् ॥ १६ ॥

 
संघातपरार्थत्वात् त्रिगुणादिविपर्यादधिष्ठानात् ।
पुरुषोऽस्ति भोक्तृभावात् कैवल्यार्थं प्रवृत्तेश्च ॥ १७ ॥

 
जननमरणकरणानां प्रतिनियमादयुगपत्प्रवृत्तेश्च ।
पुरुषबहुत्वं सिद्धं त्रैगुण्यविपर्ययाच्चैव ॥ १८ ॥

 
तस्माच्च विपर्यासात् सिद्धं साक्षित्वमस्य पुरुषस्य ।
कैवल्यं माध्यस्थ्यं द्रष्टृत्वमकर्तृभावश्च ॥ १९ ॥

 
तस्मात्तत्संयोगादचेतनं चेतनावदिव लिङ्गम् ।
गुणकर्तृत्वेऽपि तथा कर्तेव भवत्युदासीन: ॥ २० ॥

पुरुषस्य दर्शनार्थं कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य ।
पङ्ग्वन्धवदुभयोरपि संयोगस्तत्कृत: सर्ग: ॥ २१ ॥

 
प्रकृतेर्महांस्ततोऽहंकारस्तस्माद् गणश्च षोडशक: ।
तस्मादपि षोडशकात् पञ्चभ्य: पञ्चभूतानि ॥ २२ ॥

 
अध्यवसायो बुद्धिर्धर्मो ज्ञानं विराग ऐश्वर्यम् ।
सात्त्विकमेतद्रूपं तामसमस्माद्विपर्यस्तम् ॥ २३ ॥

 
अभिमानोऽहंकार: तस्माद्विविध: प्रवर्तते सर्ग: ।
एकादशकश्च गणस्तन्मात्रपञ्चकश्चैव ॥ २४ ॥

 
सात्त्विक एकादशक: प्रवर्तते वैकृतादहंकारात् ।
भूतादेस्तन्मात्र: स तामसस्तैजसादुभयम् ॥ २५ ॥

 
बुद्धीन्द्रियाणि चक्षु:श्रोत्रघ्राणरसनत्वगाख्यानि ।
वाक्पाणिपादपायूपस्थानि कर्मेन्द्रियाण्याहु: ॥ २६ ॥

 
उभयात्मकमत्र मन: सङ्कल्पमिन्द्रियं च साधर्म्यात् ।
गुणपरिणामविशेषान्नानात्वं बाह्यभेदाश्च ॥ २७ ॥

 
रूपादिषु पञ्चानामालोचनमात्रमिष्यते वृत्ति: ।
वचनादानविहरणोत्सर्गानन्दाश्च पञ्चानाम् ॥ २८ ॥

 
स्वालक्षण्यं वृत्तिस्त्रयस्य सैषा भवत्यसामान्या ।
सामान्यकरणवृत्ति: प्राणाद्या वायव: पञ्च ॥ २९ ॥

 
युगपच्चतुष्टयस्य तु वृत्ति: क्रमशश्च तस्य निर्दिष्टा ।
दृष्टे तथाप्यदृष्टे त्रयस्य् तत्पूर्विका वृत्ति: ॥ ३० ॥

 
स्वां स्वां प्रतिपद्यन्ते परस्पराकूतहेतुकां वृत्तिम् ।
पुरुषार्थ एव हेतुर्न केनचित् कार्यते करणम् ॥ ३१ ॥

 
करणं त्रयोदशविधं तदाहरणधारणप्रकाशकरम् ।
कार्यं च तस्य दशधाऽऽहार्यं धार्यं प्रकाश्यं च ॥ ३२ ॥

 
अन्त:करणं त्रिविधं दशधा बाह्यं त्रयस्य विषयाख्यम् ।
साम्प्रतकालं बाह्यं त्रिकालमाभ्यन्तरं करणम् ॥ ३३ ॥

 
बुद्धिन्द्रियाणि तेषां पञ्च विशेषाविशेषविषयाणि ।
वाग्भवति शब्दविषया शेषाणि तु पञ्चविषयाणि ॥ ३४ ॥

 
सान्त:करणा बुद्धि: सर्वं विषयमवगाहते यस्मात् ।
तस्मात् त्रिविधं करणं द्वारि द्वाराणि शेषाणि ॥ ३५ ॥

एते प्रदीपकल्पा: परस्परविलक्षणा गुणविशेषा: ।
कृत्स्नं पुरुषस्यार्थं प्रकाश्य बुद्धौ प्रयच्छन्ति ॥ ३६ ॥

सर्वं प्रत्युपभोगं यस्मात् पुरुषस्य साधयति बुद्धि: ।
सैव च विशिनष्टि पुन: प्रधानपुरुषान्तरं सूक्ष्मम् ॥ ३७ ॥

 
तन्मात्राण्यविशेषास्तेभ्यो भूतानि पञ्च पञ्चभ्य: ।
एते स्मृता विशेषा: शन्ता घोराश्च मूढाश्च ॥ ३८ ॥

 
सूक्ष्मा मातापितृजा: सह प्रभूतैस्त्रिधा विशेषा: स्यु: ।
सूक्ष्मास्तेषां नियता मातापितृजा निवर्तन्ते ॥ ३९ ॥

 
पूर्वोत्पन्नमसक्तं नियतं महदादिसूक्ष्मपर्यन्तम् ।
संसरति निरुपभोगं भावैरधिवासितं लिङ्गम् ॥ ४० ॥

 
चित्रं यथाऽऽश्रयमृते स्थाण्वादिभ्यो विना यथाच्छाया ।
तद्वद्विना विशेषैर्न तिष्ठति निराश्रयं लिङ्गम् ॥ ४१ ॥

 
पुरुषार्थहेतुकमिदं निमित्तनैमित्तिकप्रसङ्गेन ।
प्रकृतेर्विभुत्वयोगान्नटवद् व्यवतिष्ठते लिङ्गम् ॥ ४२ ॥

 
सांसिद्धिकाश्च भावा: प्राकृतिका वैकृताश्च धर्माद्या: ।
दृष्टा: करणाश्रयिण: कार्याश्रयिणश्च कललाद्या: ॥ ४३ ॥

 
धर्मेण गमनमूर्ध्वं गमनमधस्ताद् भवत्यधर्मेण ।
ज्ञानेन चापवर्गो विपर्ययादिष्यते बन्ध: ॥ ४४ ॥

 
वैराग्यात् प्रकृतिलय: संसारो भवति राजसाद् रागात् ।
ऐश्वर्यादविघातो विपर्ययात्तद्विपर्यास: ॥ ४५ ॥

 
एष प्रत्ययसर्गो विपर्ययाशक्तितुष्टिसिद्ध्याख्य: ।
गुणवैषम्यविमर्दात् तस्य च भेदास्तु पञ्चाशत् ॥ ४६ ॥

 
पञ्च विपर्ययभेदा भवन्त्यशक्तिश्च करणवैकल्यात् ।
अष्टाविंशतिभेदा तुष्टिर्नवधाऽष्टधा सिद्धि: ॥ ४७ ॥

 
भेदस्तमसोऽष्टविधो मोहस्य च दशविधो महामोह: ।
तामिस्रोऽष्टादशधा तथा भवत्यन्धतामिस्र: ॥ ४८ ॥

एकादशेन्द्रियवधा: सह बुद्धिवधैरशक्तिरुद्दिष्टा ।
सप्तदश वधा बुद्धेर्विपर्ययात् तुष्टिसिद्धीनाम् ॥ ४९ ॥

 
आध्यात्मिक्यश्चतस्र: प्रकृत्युपादानकालभाग्याख्या: ।
बाह्या विषयोपरमात् पञ्च च नव तुष्टयोऽभिमता: ॥ ५० ॥

 
 
उह: शब्दोऽध्ययनं दु:खविघातास्त्रय: सुह्रत्प्राप्ति: ।
दानं च सिद्धयोऽष्टौ सिद्धे: पूर्वोऽङ्कुशस्त्रिविध: ॥ ५१ ॥

 
न विना भावैर्लिङ्गं न विना लिङ्गेन भावनिर्वृत्ति: ।
लिङ्गाख्यो भावाख्यस्तस्माद् द्विविध: प्रवर्तते सर्ग: ॥ ५२ ॥

 
अष्टविकल्पो दैवस्तैर्यग्योनश्च पञ्चधा भवति ।
मानुषकश्चैकविध: समासतो भौतिक: सर्ग: ॥ ५३ ॥

 
उर्ध्वं सत्त्वविशालस्तमोविशालश्च मूलत: सर्ग: ।
मध्ये रजोविशालो ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्त: ॥ ५४ ॥

 
तत्र जरामरणकृतं दु:खं प्राप्नोति चेतन: पुरुष: ।
लिङ्गस्याविनिवृत्तेस्तस्माद् दु:खं स्वभावेन ॥ ५५ ॥

 
इत्येष प्रकृतिकृतो महदादिविशेषभूतपर्यन्त: ।
प्रतिपुरुषविमोक्षार्थं स्वार्थ इव परार्थ आरम्भ: ॥ ५६ ॥

 
वत्सविवृद्धिनिमित्तं क्षीरस्य यथा प्रवृत्तिरज्ञस्य ।
पुरुषविमोक्षनिमित्तं तथा प्रवृत्ति: प्रधानस्य ॥ ५७ ॥

 
औत्सुक्यविनिवृत्यर्थं यथा क्रियासु प्रवर्तते लोक: ।
पुरुषस्य विमोक्षार्थं प्रवर्तते तद्वदव्यक्तम् ॥ ५८ ॥

 
रङ्गस्य दर्शयित्वा निवर्तते नर्तकी यथा नृत्यात् ।
पुरुषस्य तथाऽत्मानं प्रकाश्य विनिवर्तते प्रकृति: ॥ ५९ ॥

 
नानाविधैरुपायैरुपकारिण्यनुपकारिण: पुंस: ।
गुणवत्यगुणस्य सत: तस्यार्थमपार्थकं चरित ॥ ६० ॥

 
प्रकृते: सुकुमारतरं न किञ्चिदस्तीति मे मतिर्भवति ।
या दृष्टाऽस्मीति पुनर्न दर्शनमुपैति पुरुषस्य ॥ ६१ ॥

 
तस्मान्न बध्यतेऽद्धा न मुच्यते नापि संसरति कञ्चित् ।
संसरति बध्यते मुच्यते च नानाश्रया प्रकृति: ॥ ६२ ॥

 
रूपै: सप्तभिरेव तु बध्नात्यात्मानमात्मना प्रकृति: ।
सैव च पुरुषार्थं प्रति विमोचयत्येकरूपेण ॥ ६३ ॥

एवं तत्वाभ्यास्यान्नास्मि न मे नाहमित्यपरिशेषम् ।
अविपर्ययाद्विशुद्धं केवलमुत्पद्यते ज्ञानम् ॥ ६४ ॥

 
तेन निवृत्तप्रसवामर्थवशात् सप्तरूपविनिवृत्ताम् ।
प्रकृतिं पश्यति पुरुष: प्रेक्षकवदवस्थित: स्वस्थ: ॥ ६५ ॥

 
रङ्गस्थ इत्युपेक्षक एको दृष्टाहमित्युपरमत्यन्या ।
सति संयोगेऽपि तयो: प्रयोजनं नास्ति सर्गस्य ॥ ६६ ॥

 
सम्यग्ज्ञानाधिगमाद् धर्मादीनामकारणप्राप्तौ ।
तिष्ठति संस्कारवशाच् चक्रभ्रमिवद् धृतशरीर: ॥ ६७ ॥

 
प्राप्ते शरीरभेदे चरितार्थत्वात् प्रधानविनिवृतौ ।
ऐकान्तिकमात्यन्तिकमुभयं कैवल्यमाप्नोति ॥ ६८ ॥

 
पुरुषार्थज्ञानमिदं गुह्यं परमर्षिणा समाख्यातम् ।
स्थित्युत्पत्तिप्रलयाश्चिन्त्यन्ते यत्र भूतानाम् ॥ ६९ ॥

एतत्पवित्रमग्र्यं मुनिरासुरयेऽनुकम्पया प्रददौ ।
आसुरिरपि पञ्चशिखाय तेन च बहुधा कृतं तन्त्रम् ॥ ७० ॥

 
शिष्यपरम्परयाऽऽगतमीश्वरकृष्णेन चैतदार्यादिभि: ।
संक्षिप्तमार्यमतिना सम्यग्विज्ञाय सिद्धान्तम् ॥ ७१ ॥

 
सप्तत्यां किल येऽर्थास्तेऽर्था: कृत्स्नस्य षष्टितन्त्रस्य ।
आख्यायिकाविरहिता: परवादविवर्जिताश्चापि ॥ ७२ ॥

 

धनतेरस का उद्गम धनवन्तरि जी से हुआ। स्वास्थ्य,आरोग्य के देवता हैं धनवन्तरि जी

धनतेरस का उद्गम धनवन्तरि जी से हुआ।
स्वास्थ्य,आरोग्य के देवता हैं धनवन्तरि जी
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दीपावली के पांच पर्वो में धनतेरस सबसे पहला और बहुत महत्वपूर्ण पर्व है। धनतेरस के दिन से ही घर में दीपमाला से सजावट शुरू हो जाती है। आज 17 अक्‍टूबर, 2017 को त्रयोदशी तिथि प्रातः 12 बजकर 26 मिनट पर प्रारम्भ हो रही है जो 18 अक्‍टूबर, 2017 को प्रातः 8 बजे समाप्‍त होगी।

शास्त्रीय मान्यता के अनुसार सूर्योदय के बाद प्रारम्भ होने वाले प्रदोषकाल के दौरान लक्ष्मी पूजा का विशेष महत्व होता है, इस दिन माता लक्ष्मी के साथ भगवान धनवंतरी की भी पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस दिन नया सामान बर्तन आदि खरीदने से धन लक्ष्मी के शुभागमन का मार्ग प्रशस्त होता है और घर में धनसम्पत्ति की विशेष अभिवृद्धि होती है।

कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन ही देवताओं के वैद्य धन्वन्तरि जी का भी जन्म हुआ था इसलिए इस तिथि को धनतेरस के नाम से जाना जाता है। यह बहुत कम लोगों को जानकारी होगी कि धनतेरस में 'धन' शब्द स्वास्थ्य के देवता धनवंतरी का वाचक शब्द है। यह सत्य है कि देवी लक्ष्मी धन की देवी हैं उनकी पूजा का भी आज के दिन विशेष महत्त्व है। परन्तु लक्ष्मी जी की कृपा प्राप्त करने के लिए अच्छा स्वास्थ्य और दीर्घ आयु भी तो होनी चाहिए तभी वैभव लक्ष्मी का सदुपयोग किया जा सकता है। यही कारण है कि दीपावली से दो दिन पहले धन्वंतरि त्रयोदशी के दिन धनतेरस से प्रकाशोत्सव का पर्व मनाने की परम्परा शुरु हुई है।

पौराणिक मान्यता है कि इस दिन धन्वतरि वैद्य समुद्रमंथन के समय अमृत का कलश लेकर प्रकट हुए थे। इस प्रकार धनतेरस का उद्गम धनवन्तरि जी से हुआ है जो देवताओं के वैद्य माने जाते हैं और वैद्य से स्वास्थ्य का ही हितसाधन सम्पादित होता है। अच्छे स्वास्थ्य के अभाव में नाना प्रकार के सुख विषय भोग भी निरर्थक हैं। इसलिए कहावत है कि संसार के सब धनों में संतोष ही सबसे बड़ा धन है-

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  "गोधन गजधन बाजिधन,
   और रतन धन खान।
   जब आवै सन्‍तोष धन,
   सब धन धूरि समान॥"
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धनतेरस के दिन सोना-चाँदी खरीदना शुभ माना जाता है। नए बरतन भी खरीदे जाते हैं। ऐसी भी मान्यता है कि धनतेरस की रात्रि के समय यम के लिए आटे का दीपक जलाकर घर के द्वार पर रखने से अकाल मृत्यु से रक्षा होती है।

किन्तु चिंता की बात है कि बाजारीकरण और उपभोक्तावाद के दौर ने हमें मौद्रिक धन सम्पत्ति का अन्धभक्त बना दिया है और हम भीड़ का अंधानुकरण करते हुए धनतेरस के दिन इसी लालच के कारण चाँदी के खोटे सिक्के भी खरीद लेते हैं और त्यौहार के नाम पर धनलोलुप व्यापारियों द्वारा प्रायः ठगे जाते हैं। दूसरी और प्रकाशोत्सव के प्रति नकली मिठाइयों और प्रदूषण फैलाने वाले पटाखों के प्रचलन ने भी इस त्यौहार को स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत संवेदनशील बना दिया है। यही कारण है कि कोर्ट को दीपावली के अवसर पर पटाखों की बिक्री पर रोक लगाने की जरूरत आ पड़ती है। आजकल दिवाली के मौके पर टीवी, गाडी, फर्नीचर आदि खरीदना भी बड़ा फैशन बन गया है जिसे इस त्यौहार पर बाजारवाद का प्रभाव ही माना जा सकता है। पर दीपावली के मौके पर हमें इतना ध्यान तो रखना ही चाहिए कि स्वास्थ्य और पर्यावरण की रक्षा के लिए नकली मिठाइयों और हानिकारक पटाखों से बचें।

धनतेरस का पर्व  मानव मात्र को यह सन्देश भी देता आया है कि इस संसार में जो स्वस्थ है वही सुखी भी है। सुखी भी वही है जिसके पास संतोष है।संतोषी व्यक्ति ही सबसे बड़ा धनवान है। वास्तव में भगवान धन्वन्तरी जी स्वास्थ्य,आरोग्य और  चिकित्सा के देवता हैं। यह भी सुपरीक्षित वैज्ञानिक तथ्य है कि निरोगी स्वास्थ्य के लिए संतोष सबसे बड़ा धन है। इसलिए हमें स्वास्थ्य रुपी धन को रुपये पैसे के मूल्य से नहीं तोलना चाहिए। एक प्रसिद्ध उक्ति है-
"चाह गई चिंता नशी, मनवा वेपरवाह
जिसको कछु ना चाहिए, सो ही शाहंशाह।"

उपमार्थक निपात : यथा- इव, न, चित्, नुः (2) कर्मोपसंग्रहार्थक निपात : यथा- न, आ, वा, ह; (3) पदपूरणार्थक निपात : यथा- नूनम्, खलु, हि, अथ। निपात के प्रकार निपात के नौ प्रकार य

उपमार्थक निपात : यथा- इव, न, चित्, नुः
(2) कर्मोपसंग्रहार्थक निपात : यथा- न, आ, वा, ह;
(3) पदपूरणार्थक निपात : यथा- नूनम्, खलु, हि, अथ।

निपात के प्रकार
निपात के नौ प्रकार या वर्ग हैं-
(1) स्वीकार्य निपात- जैसे : हाँ, जी, जी हाँ।
(2) नकरार्थक निपात- जैसे : नहीं, जी नहीं।
(3) निषेधात्मक निपात- जैसे : मत।
(4) पश्रबोधक- जैसे : क्या ? न।
(5) विस्मयादिबोधक निपात- जैसे : क्या, काश, काश कि।
(6) बलदायक या सीमाबोधक निपात- जैसे : तो, ही, तक, पर सिर्फ, केवल।
(7) तुलनबोधक निपात- जैसे : सा।
(8) अवधारणबोधक निपात- जैसे : ठीक, लगभग, करीब, तकरीबन।
(9) आदरबोधक निपात- जैसे : जी।

निरुक्त का लक्षण
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आचार्य सायण के अनुसार निरुक्त का लक्षण हैः---
"अर्थावबोधे निरपेक्षतया पदजातं यत्रोक्तं तन्निरुक्तम् । दुर्गाचार्य ने 14 निरुक्तकारों का उल्लेख किया है--निरुक्तं चतुर्दशप्रभेदनम् । निरुक्त में स्वयं यास्क ने 12 निरुक्तकारों का उल्लेख किया हैः---(1.) अग्रायण, (2.) औपमन्यव, (3.) औदुम्बरायण, (4.) और्णवाभ, (5.) कात्थक्य, (6.) क्रौष्टुभि, (7.) गार्ग्य, (8.) गालव, (9.) तैटीकि, (10.) वार्ष्यायणि, (11.) शाकपूणि, (12.) स्थौलाष्ठीवि । तेरहवें निरुक्तकार स्वयम् आचार्य यास्क हैं । चौदहवाँ निरुक्तकार कौन है, इसका उल्लेख नहीं है ।

Wednesday, April 18, 2018

*अक्षय तृतीया* *अक्षय तृतीया का महत्त्व*

*अक्षय तृतीया*
*अक्षय तृतीया का महत्त्व*
👉 *अक्षय* का अर्थ जिसका क्षय न हो अर्थात अविनाशी, इसलिए अक्षय तृतीया के दिन कोई भी शुभ कार्य करें, परोपकार करें, नाम जप करें, भक्ति करें, सत्संग वो हमेशा के लिए अविनाशी हो जाता है; परन्तु ध्यान रहें कि यदि कोई पाप करे या निंदा या कुसंगत करें वो भी अक्षय हो जाता है 🎗
👉 आज ही के दिन माँ गंगा का अवतरण धरती पर हुआ था 🌲
👉 महर्षि परशुराम का जन्म आज ही के दिन हुआ था 🌷
👉 माँ अन्नपूर्णा का जन्म भी आज ही के दिन हुआ था 🌲
👉 द्रोपदी को चीरहरण से कृष्ण ने आज ही के दिन बचाया था 🌷
👉 कृष्ण और सुदामा का मिलन आज ही के दिन हुआ था 🌲
👉 कुबेर को आज ही के दिन खजाना मिला था 🌷
👉 सतयुग और त्रेता युग का प्रारम्भ आज ही के दिन हुआ था 🌲
👉 ब्रह्मा जी के पुत्र अक्षय कुमार का अवतरण भी आज ही के दिन हुआ था 🌷
👉 प्रसिद्ध तीर्थ स्थल श्री बद्री नारायण जी का कपाट आज ही के दिन खोला जाता है 🌲
👉 वृंदावन के बाँके बिहारी मंदिर में साल में केवल आज ही के दिन श्री विग्रह के चरणों के दर्शन होते है अन्यथा साल भर वो वस्त्र से ढके रहते है 🌷
👉 आज ही के दिन जतिपुरा में श्रीनाथ जी के मंदिर की नींव रखी गई थी 🌲
👉 आज से श्रीनाथ जी को ग्रीष्मकालीन श्रृंगार धराए जाते हैं 🌷
👉 अक्षय अर्थात जिसका क्षय न हो - इस दिन किया गया कोई भी पुण्य कर्म या पाप कर्म का क्षय नहीं होता इसलिए जितना हो सके उतना नाम जप करें, पुण्य करें और पाप करने से पहले हजार बार सोचें 🌲
👉 इसी दिन युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हुआ था 🌷
👉 अक्षय तृतीया अपने आप में स्वयं सिद्ध मुहूर्त है कोई भी शुभ कार्य का प्रारम्भ किया जा सकता है 🌲

धातु (पठ्, गम्, नम्, दृश्/पश्य, खाद्, लिख्, वद्, क्रीड्, धाव्, हस्, स्था, पा, दा, नी, भू आदि) के लट्, लङ् और लृट् लकार

 धातु (पठ्, गम्, नम्, दृश्/पश्य, खाद्, लिख्, वद्, क्रीड्, धाव्, हस्, स्था, पा, दा, नी, भू आदि) के लट्, लङ् और लृट् लकार दृश् (पश्य) धातु (दे...