Monday, December 31, 2018

मैक्समूलर ने 'प्राचीन संस्कृत साहित्य का इतिहास



मैक्समूलर ने 'प्राचीन संस्कृत साहित्य का इतिहास' लिखा जो कि 1859 में प्रकाशित किया गया। यह वही काल था जब भारत में 1857 की क्रांति हुई थी और जिसे भारतीय राष्ट्रवाद के 'पुनरूज्जीवी पराक्रम' का प्रतीक माना जा रहा था, तब जर्मनी में संस्कृत के प्रति ऐसा ठोस कार्य होना बहुत ही अर्थपूर्ण था।
इसका अभिप्राय था कि भारतीय राष्ट्रवाद का 'पुनरूज्जीवी पराक्रमी' भाव भारतीयों को ही नहीं, विदेशियों को भी प्रभावित कर रहा था और भारत में चाहे लॉर्ड मैकाले की शिक्षा पद्घति भारतीय भाषा को और संस्कृति को मारने का जितना प्रयास कर रही थी पर भारतीय भाषा और भारतीय संस्कृति उस समय भी लोगों को संस्कार बांट रही थी और निरंतर अपनी ओर आकृष्ट कर रही थी। अपनी उपरोक्त पुस्तक में मैक्समूलर ने भारत की ऋग्वेदकालीन आर्य मान्यताओं की बड़ी गंभीर विवेचना की है। अपनी इसी पुस्तक में वह भारत के ऋग्वेद को विश्व का सर्वाधिक प्राचीन ग्रंथ घोषित करता है। इस ग्रंथ में वह भारतीय भाषा और संस्कृति से तथा भारत के धर्म से अभिभूत दिखायी पड़ता है। उसके इस प्रकार के भाव ने उस समय के विश्व स्तरीय विद्वानों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट कराया था। जिससे संस्कृत को विश्व के ज्ञान-विज्ञान की भाषा मानने और संस्कारों का पालना बनाने में सहायता मिली। भारत के विषय में यह सत्य है कि इसकी मनीषा विश्व की मार्ग दर्शिका रही है और विश्व की अन्य संस्कृतियों की मनीषा इसके सामने फीकी ही रही है। मैक्समूलर ने इस तथ्य को बड़ी स्पष्टता से अपने ग्रंथ में स्वीकार किया। उसने इस ग्रंथ में भारत की वैदिक संहिताओं ब्राह्मण आरण्यक उपनिषद तथा परवर्ती स्मृति साहित्य का पूर्ण मनोयोग से विवेचन किया है। उसे भारत के वैदिक धर्म के एकेश्वरवादी स्वरूप ने अधिक प्रभावित किया था। जिसे उसने 'मोनोथीज्म' का नाम दिया था। इसका अभिप्राय था कि मैक्समूलर वेद की इस घोषणा को ही उचित और अंतिम सत्य मानता था कि 'एकम् सद् विप्रा बहुधा वदन्ति' अर्थात वह परमपिता परमात्मा तो एक ही है परंतु विद्वान लोग उसे अलग-अलग नामों से पुकारते हैं। भारत की मूलभाषा संस्कृत का विश्व के लिए यह बहुत बड़ा संदेश है कि ईश्वर को एक ही जानो और एक ही मानो। उसके नाम पर लड़ो झगड़ो नही और ना ही अपने अलग-अलग संप्रदाय बनाओ। संस्कृत भाषा की इसी विशेषता को एक संस्कार के रूप में हिंदी ने अपनाया है, और वह भी मनुष्य के न लडऩे झगडऩे को धर्म घोषित करती है। मैक्समूलर ने भारतीय भाषा के इस धर्म की गंभीर विवेचना की, और उसने हमारी संस्कृत और संस्कृति के रोम-रोम में मानवतावाद को एक रस हुए पाया।
मैक्समूलर भारत के धर्म पर लिखता ही नही था अपितु भारतीय विद्या और भाषाशास्त्र पर उत्तम व्याख्यान भी दिया करता था। जिससे लोगों पर उत्तम प्रभाव पड़ता था। उसने भारत से प्रभावित होकर अपनी प्रसिद्घ पुस्तक 'इंडिया व्हाट इट कैन टीच अस' लिखी। इस पुस्तक को विश्व में बड़ी प्रसिद्घि मिली और लोगों को इसके माध्यम से भारत को और भारत की समृद्घ भाषा को समझने का उचित अवसर प्राप्त हुआ। मैक्समूलर लिखता है:-''इस बात का पता लगाने के लिए कि सर्वाधिक सम्पदा और प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण ऐसा कौन सा देश है? यदि आप मुझे इस भूमंडल का अवलोकन करने के लिए कहें तो मैं बताऊंगा कि वह देश भारत है, भारत जहां भूतल पर ही स्वर्ग की छटा निखर रही है। यदि आप यह जानना चाहें कि मानव मस्तिष्क की उत्कृष्टतम उपलब्धियों का सर्वप्रथम साक्षात्कार किस देश ने किया है और किसने जीवन की सबसे बड़ी समस्याओं पर विचार कर उनमें से कईयों के ऐसे समाधान ढूंढ़ निकाले हैं कि प्लेटो और काण्ट जैसे दार्शनिकों का अध्ययन करने वाले लोगों के लिए भी वे मनन के योग्य हैं तो मैं फिर भारत का ही नाम लूंगा और यदि यूनानी, रोमन और सेमेटिक जाति के यहूदियों की विचारधारा में ही सदा अवगाहन करते रहने वाले हम यूरोपियनों को ऐसा कौन सा साहित्य पढऩा चाहिए जिससे हमारे जीवन का अंतर्तम परिपूर्ण और अधिक सर्वांगीण अधिक विश्वव्यापी यूं, कहें कि संपूर्णतया मानवीय बन जाए और जीवन ही क्यों अगला जन्म तथा शाश्वत जीवन भी सुधर जाए तो मैं एक बार भारत का ही नाम लूंगा।''
इस प्रकार मैक्समूलर ने भारत को विश्व की भाषाओं का, विश्व के धर्मों का और विश्व की संस्कृतियों का एकमात्र प्रेरणा स्रोत बनाकर यह सिद्घ किया कि विश्व में भाषा, धर्म व संस्कृति की समरूपता तभी संभव है जब लोग भारत को जानें और भारत को समझें। उसका मानना था कि अधिकतर लोगों को भारत के प्राचीन साहित्य की खोज परियों की कहानी जैसी लगती होगी। इतिहास का एक अध्याय उसे वे कम मानते हैं। उस साहित्य के शुद्घ और सही होने में संदेह है जो और संदेह किया जाता रहा है।  अरिस्टोटल और प्लेटो ने क्या कहा यदि उनसे कहा जाता है कि उनके समय में भारत में जिस भारत की विजय न सही खोज अलेक्जेंडर ने की थी प्राचीन-साहित्य है, जो यूनान के साहित्य की अपेक्षा अधिक समृद्घ है।
अब से लगभग 150 वर्ष पूर्व जब भारत को लोग अंग्रेज जाति का गुलाम समझने की भ्रांति में थे, तब भारतीय भाषा और साहित्य के लिए मैक्समूलर की ऐसी सोच और खोज बहुत ही अर्थपूर्ण थी। जो लोग प्राचीनकाल में विश्व का नेतृत्व करने वालों में यूनान की संस्कृति और वहां की भाषा को प्राथमिकता दे रहे थे-मैक्समूलर की ऐसी धारणा और सिद्घांत के प्रतिपादन से उनकी प्राथमिकता बदल गयी और लोग भारत की ओर देखने लगे। उन्हें लगा कि विश्व संभवत: और संस्कृति का सूर्य तो भारत में जन्मा है। उन्हें मैक्समूलर ने बताया कि दूसरे स्थानों की अपेक्षा भारतवर्ष में हम जिसका पर्यक्षेपण और अध्ययन अधिक कर सकते हैं वह यह है कि धार्मिक विचार और धार्मिक भाषा की उत्पत्ति कैसे होती है उनमें वेग कैसे आता है, विस्तार कैसे होता है, एक मुख से दूसरे मुख तक जाने में उनके रूप कैसे बदल जाते हैं, एक मस्तिष्क से दूसरे में पहुंचने में परिवर्तन कैसे होता है? फिर भी उन सबमें एक समता रहती है जो मूल स्रोत से जहां से उसका उद्गम हुआ किसी न किसी अंश में समान होती है।
मैक्समूलर की मान्यता थी कि संस्कृत के अध्ययन से हमको मानवीय भाषा की उत्पत्ति और विकास का अध्ययन करने में सफलता मिली है। मैक्समूलर वेदों को भारतीय मान्यता के अनुरूप अपौरूषेय मानता था, इसलिए वेदों की भाषा भी अपौरूषेय ही है। जिससे स्पष्ट है कि संसार को भारत की भाषा-संस्कृत को देवभाषा मानना चाहिए। मैक्समूलर भारत की संस्कृत भाषा के विषय में कहता है कि यह दुर्भाग्य ही था कि संस्कृत की विद्वत्ता के लिए हमारा प्रथम परिचय भारतीय साहित्य के कालिदास और भवभूति के सुंदतापूर्ण वर्णन से ही हुआ और शैव तथा वैष्णवों के द्वंद्व ही हमने देखे। वास्तविक मौलिक और महत्वपूर्ण काल संस्कृत साहित्य का वह है जो बौद्घ धर्म के उदय से पूर्व था, उसका अध्ययन और अधिक गंभीरता से करना आवश्यक है। तब संस्कृत भारत की बोलचाल की भाषा थी। उस समय शिव की उपासना अज्ञात थी। भारत के लोग अपनी भाषा के प्रति कितने गंभीर थे उसका चित्रण करते हुए मैक्समूलर का कहना था कि उस अद्र्घनग्न हिंदू पर विचार कीजिए जो भारतीय गगन के नीचे मुक्ताकाश में पवित्र ऋचाओं का पाठ कर रहा है। कंठस्थ प्रणाली से ये मंत्र गीत तीन या चार हजार वर्षों से उसे मिलते रहे हैं। यदि लेखन कला का आविष्कार ना होता और मुद्रण व्यवस्था ना होती, यदि भारत में इंग्लैंड का राज्य न होता तब भी वह युवक ब्राह्मण, उसी के समान करोड़ों उसके देशवासी इसी प्रकार अपनी ऋचाएं कंठस्थ (अर्थात अपनी देवभाषा की उत्कृष्टता का राग जपते) प्रणाली से करते।




Saturday, December 29, 2018

घर के समान संस्कृत में ghar ke saman Sanskrit me

संगणक-विषयक-शब्दावली








(1)ID.— परिचयपत्रम्
(2)Data – टंकितांश:
(3) Edit – सम्पादनम्
(4)Keyboard – कुंचिपटलम्
(5) Timeline – समयरेखा
(6) Login – प्रवेश:
(7)Share - वितरणम्, प्रसारणम्
(8) Laptop – अंकसंगणकम्
(9) Search - अन्वेषणम्
(10)Default - पूर्वनिविष्ठम्
(11)Input – निवेश:
(12)Output - फलितम्
(13)Block – अवरोध:
(14)Display – प्रदर्शनम् / विन्यास:
(15)Wallpaper - भीत्तिचित्रम्
(16)Theme – विषयवस्तु:
(17)User – उपभोक्ता
(18) Smart phone - कुशलदूरवाणी
(19)Tag - चिह्नम्
(20)Setup – प्रतिष्ठितम्
(21)Install - प्रस्थापना / प्रतिस्थापनम्
(22)Privacy - गोपनीयता
(23)Manual – हस्तक्रिया
(24)Accessibility - अभिगम्यता
(25)Error – त्रुटि:
(26)Pass word – गूढशब्द:
(27) Code no. - कूटसंख्या
(28) Pen drive - स्मृतिशलाका
(1.) क्लास रूमः--कक्ष्या
(2.) बेंच (पुस्तक रखने की)---दीर्घोत्पीठिका,
(3.) बेंच (बैठने की)---दीर्घपीठिका,
(4.) मेज---उत्पीठिका,
(5.) कुर्सीः--आसन्दः,
(6.) बैगः--स्यूतः,
(7.) किताब--पुस्तकम्,
(8.) कलम--लेखनी (कलमः),
(9.) लडकी--बाला या बालिका,
(10.) लडका--बालः,
(11.) छाता---छत्रम्,
(12.) टीचर (पुरुष)---शिक्षकः,
(13.) टीचर (लेडी) शिक्षिका,
(14.) अलमारी--काष्ठमञ्जूषा,
(15.) आरामकुर्सी---सुखासन्दिका,
(16.) इंक पेंसिल, डॉट पेन--मसितूलिका,
(17.) शूज--उपानह्,
(18.) ड्रेस---परिधानम्,
(19.) ओढनी--प्रच्छदपटः,
(20.) ओवरकोट---बृहतिका,
(21.) कंघी---प्रसाधनी,
(22.) कक्षा का साथी---सतीर्थ्यः, सहपाठी,
(23.) कमरा---कक्षः,
(24.) खिडकी---गवाक्षः,
(25.) पंखा---व्यजनम्,
(26.) एसी---वातायनम्,
(27.) डेस्टर--मार्जकः,
(28.) इन्स्पेक्टर---निरीक्षकः,
(29.) कम्प्यूटर---संगणकः,
(30.) कागज---कर्गदः, (कागदः) (कर्गलम्)
(31.) रिफिल---मसियष्टिः,
(32.) कॉपी---सञ्चिका,
(33.) रजिस्टर---पञ्जिका,
(34.) कार्टुन--उपहासचित्रम्,
(35.) ड्रॉइंग---रेखाचित्रम्,
(36.) कॉलेज--महाविद्यालयः,
(37.) स्कूल---विद्यालयः,
(38.) यूनीवर्सिटी--विश्वविद्यालयः,
(39.) किवाड--कपाटम्,
(40.) गेट--द्वारम्,
(41.) मेन गेट---मुख्यद्वारम्,
(42.) दीवार---भित्तिका,
(43.) दीवारघडी---भित्तिघटिका,
(44.) घडी---घटिका,
(45.) दवात का ढक्कन--कुप्पी,
(46.) कुर्ता--कञ्चुकः,
(47.) कैंची---कर्तरी,
(48.) कोठरी---लघुकक्षः,
(49.) गेटकीपर--द्वारपालः,
(50.) पिअन--सेवकः,
(51.) क्लर्क--लिपिकारः, करणिकः,
(52.) मैदान---क्षेत्रम्,
(53.) खेल का मैदान--क्रीडाक्षेत्रम्,
(54.) स्पोर्ट्स--क्रीडा,
(55.) गेन्द---कन्दुकः,गेन्दुकम्,
(56.) फुटबॉल---पादकन्दुकम्,
(57.) घण्टा--होरा,
(58.) चपरासी---लेखहारकः, प्रेष्यः,
(59.) चप्पल---पादुका, पादुुः,
(60.) चॉक--कठिनी,
(61.) चांसलर--कुलपतिः,
(62.) चारों ओर मुडने वाली कुर्सी---पर्पः,
(63.) रंग---वर्णः,
(64.) चिह्न-अंकः,
(65.) चोटी---शिखा. सानुः,
(66.) रिसिस---जलपानवेला,
(67.) जिल्द--प्रावरणम्,
(68.) झाडू--मार्जनी,
(69.) टाइम टेबल--समय-सारणी,
(70.) कैरीकुलम्---पाठ्यक्रमः,
(71.) टेनिस का खेल--प्रक्षिप्तकन्दुकक्रीडा,
(72.) एजुकेशन टाइरेक्टर---शिक्षासञ्चालकः,
(73.) डिप्टी डाइरेक्टर (शिक्षा)--उपशिक्षासञ्चालकः,
(74.) डेस्क--लेखनपीठम्,
(75.) ड्रॉइंग रूप---उपवेशगृहम्,
(76.) दरी--आस्तरणम्,
(77.) दस्ता (कागज का)--दस्तकः,
(78.) निब---लेखनीमुखम्,
(79.) नेट --जालम्,
(80.) नेलकटर---नखनिकृन्तनम्,
(81.) नेलपॉलिश--नखरञ्जनम्,
(82.) पायजामा--पादयामः,
(83.) पॉलिश---पादुरञ्जनम्, पादुरञ्जकः,
(84.) पेंसिल--तूलिका,
(85.) पैण्ट--आप्रपदीनम्,
(86.) पोर्टिको (बरामदा)---प्रकोष्ठः,
(87.) प्रिंसिपल---(पु.) प्रधानाचार्यः, प्रधानाध्यापकः प्राचार्यः,
(स्त्री) प्रधानाचार्या, प्रधानाध्यापिका, प्राचार्या,
(88.) प्रोफेसर--प्राध्यापकः,
(89.) फर्श---कुट्टिमम्,
(90.) फाउण्टेन पेन---धारालेखनी,
(91.) फाइल--पत्रसञ्चयिनी,
(92.) फीस--शुल्कः,
(93.) बरामदा--वरण्डः,
(94.) बाथरूम---स्नानागारः,
(95.) बेंच--काष्ठासनम्,
(96.) बैंड---वादित्रगणः,
(97.) बैडमिण्टन---पत्रिक्रीडा,
(98.) मेज--फलकम्,
(99.) पढाई की मेज--लेखनफलकम्,
(100.) यूनिफॉर्म---एकपरिधानम्, एकवेषः
संगणक-विषयक-शब्दावली
(1)ID.— परिचयपत्रम्
(2)Data – टंकितांश:
(3) Edit – सम्पादनम्
(4)Keyboard – कुंचिपटलम्
(5) Timeline – समयरेखा
(6) Login – प्रवेश:
(7)Share - वितरणम्, प्रसारणम्
(8) Laptop – अंकसंगणकम्
(9) Search - अन्वेषणम्
(10)Default - पूर्वनिविष्ठम्
(11)Input – निवेश:
(12)Output - फलितम्
(13)Block – अवरोध:
(14)Display – प्रदर्शनम् / विन्यास:
(15)Wallpaper - भीत्तिचित्रम्
(16)Theme – विषयवस्तु:
(17)User – उपभोक्ता
(18) Smart phone - कुशलदूरवाणी
(19)Tag - चिह्नम्
(20)Setup – प्रतिष्ठितम्
(21)Install - प्रस्थापना / प्रतिस्थापनम्
(22)Privacy - गोपनीयता
(23)Manual – हस्तक्रिया
(24)Accessibility - अभिगम्यता
(25)Error – त्रुटि:
(26)Pass word – गूढशब्द:
(27) Code no. - कूटसंख्या
(28) Pen drive - स्मृतिशलाका
(1.) क्लास रूमः--कक्ष्या
(2.) बेंच (पुस्तक रखने की)---दीर्घोत्पीठिका,
(3.) बेंच (बैठने की)---दीर्घपीठिका,
(4.) मेज---उत्पीठिका,
(5.) कुर्सीः--आसन्दः,
(6.) बैगः--स्यूतः,
(7.) किताब--पुस्तकम्,
(8.) कलम--लेखनी (कलमः),
(9.) लडकी--बाला या बालिका,
(10.) लडका--बालः,
(11.) छाता---छत्रम्,
(12.) टीचर (पुरुष)---शिक्षकः,
(13.) टीचर (लेडी) शिक्षिका,
(14.) अलमारी--काष्ठमञ्जूषा,
(15.) आरामकुर्सी---सुखासन्दिका,
(16.) इंक पेंसिल, डॉट पेन--मसितूलिका,
(17.) शूज--उपानह्,
(18.) ड्रेस---परिधानम्,
(19.) ओढनी--प्रच्छदपटः,
(20.) ओवरकोट---बृहतिका,
(21.) कंघी---प्रसाधनी,
(22.) कक्षा का साथी---सतीर्थ्यः, सहपाठी,
(23.) कमरा---कक्षः,
(24.) खिडकी---गवाक्षः,
(25.) पंखा---व्यजनम्,
(26.) एसी---वातायनम्,
(27.) डेस्टर--मार्जकः,
(28.) इन्स्पेक्टर---निरीक्षकः,
(29.) कम्प्यूटर---संगणकः,
(30.) कागज---कर्गदः, (कागदः) (कर्गलम्)
(31.) रिफिल---मसियष्टिः,
(32.) कॉपी---सञ्चिका,
(33.) रजिस्टर---पञ्जिका,
(34.) कार्टुन--उपहासचित्रम्,
(35.) ड्रॉइंग---रेखाचित्रम्,
(36.) कॉलेज--महाविद्यालयः,
(37.) स्कूल---विद्यालयः,
(38.) यूनीवर्सिटी--विश्वविद्यालयः,
(39.) किवाड--कपाटम्,
(40.) गेट--द्वारम्,
(41.) मेन गेट---मुख्यद्वारम्,
(42.) दीवार---भित्तिका,
(43.) दीवारघडी---भित्तिघटिका,
(44.) घडी---घटिका,
(45.) दवात का ढक्कन--कुप्पी,
(46.) कुर्ता--कञ्चुकः,
(47.) कैंची---कर्तरी,
(48.) कोठरी---लघुकक्षः,
(49.) गेटकीपर--द्वारपालः,
(50.) पिअन--सेवकः,
(51.) क्लर्क--लिपिकारः, करणिकः,
(52.) मैदान---क्षेत्रम्,
(53.) खेल का मैदान--क्रीडाक्षेत्रम्,
(54.) स्पोर्ट्स--क्रीडा,
(55.) गेन्द---कन्दुकः,गेन्दुकम्,
(56.) फुटबॉल---पादकन्दुकम्,
(57.) घण्टा--होरा,
(58.) चपरासी---लेखहारकः, प्रेष्यः,
(59.) चप्पल---पादुका, पादुुः,
(60.) चॉक--कठिनी,
(61.) चांसलर--कुलपतिः,
(62.) चारों ओर मुडने वाली कुर्सी---पर्पः,
(63.) रंग---वर्णः,
(64.) चिह्न-अंकः,
(65.) चोटी---शिखा. सानुः,
(66.) रिसिस---जलपानवेला,
(67.) जिल्द--प्रावरणम्,
(68.) झाडू--मार्जनी,
(69.) टाइम टेबल--समय-सारणी,
(70.) कैरीकुलम्---पाठ्यक्रमः,
(71.) टेनिस का खेल--प्रक्षिप्तकन्दुकक्रीडा,
(72.) एजुकेशन टाइरेक्टर---शिक्षासञ्चालकः,
(73.) डिप्टी डाइरेक्टर (शिक्षा)--उपशिक्षासञ्चालकः,
(74.) डेस्क--लेखनपीठम्,
(75.) ड्रॉइंग रूप---उपवेशगृहम्,
(76.) दरी--आस्तरणम्,
(77.) दस्ता (कागज का)--दस्तकः,
(78.) निब---लेखनीमुखम्,
(79.) नेट --जालम्,
(80.) नेलकटर---नखनिकृन्तनम्,
(81.) नेलपॉलिश--नखरञ्जनम्,
(82.) पायजामा--पादयामः,
(83.) पॉलिश---पादुरञ्जनम्, पादुरञ्जकः,
(84.) पेंसिल--तूलिका,
(85.) पैण्ट--आप्रपदीनम्,
(86.) पोर्टिको (बरामदा)---प्रकोष्ठः,
(87.) प्रिंसिपल---(पु.) प्रधानाचार्यः, प्रधानाध्यापकः प्राचार्यः,
(स्त्री) प्रधानाचार्या, प्रधानाध्यापिका, प्राचार्या,
(88.) प्रोफेसर--प्राध्यापकः,
(89.) फर्श---कुट्टिमम्,
(90.) फाउण्टेन पेन---धारालेखनी,
(91.) फाइल--पत्रसञ्चयिनी,
(92.) फीस--शुल्कः,
(93.) बरामदा--वरण्डः,
(94.) बाथरूम---स्नानागारः,
(95.) बेंच--काष्ठासनम्,
(96.) बैंड---वादित्रगणः,
(97.) बैडमिण्टन---पत्रिक्रीडा,
(98.) मेज--फलकम्,
(99.) पढाई की मेज--लेखनफलकम्,
(100.) यूनिफॉर्म---एकपरिधानम्, एकवेषः

Wednesday, December 26, 2018

शोध : अर्थ एवं परिभाषा शोध (Research) शोध की परिभाषा, प्रकार,चरण पर आधारित क्लास नोट्स. शोध प्रबंध की रूपरेखा.संबंधित साहित्य का सर्वेक्षण (Survey of related literatureशोध : अर्थ एवं परिभाषा शोध (Research) शोध की परिभाषा, प्रकार,चरण पर आधारित क्लास नोट्स. शोध प्रबंध की रूपरेखा.संबंधित साहित्य का सर्वेक्षण (Survey of related literatureशोध : अर्थ एवं परिभाषा शोध (Research) शोध की परिभाषा, प्रकार,चरण पर आधारित क्लास नोट्स. शोध प्रबंध की रूपरेखा.संबंधित साहित्य का सर्वेक्षण (Survey of related literature



शोध की परिभाषा, प्रकार,चरण पर आधारित क्लास नोट्स

शोध : अर्थ एवं परिभाषा  

शोध (Research)

•      शोध उस प्रक्रिया अथवा कार्य का नाम है जिसमें बोधपूर्वक प्रयत्न से तथ्यों का संकलन कर सूक्ष्मग्राही एवं विवेचक बुद्धि से उसका अवलोकन- विश्‌लेषण करके नए तथ्यों या सिद्धांतों का उद्‌घाटन किया जाता है।

•      रैडमैन और मोरी ने अपनी किताब  “दि रोमांस ऑफ रिसर्च” में शोध का अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखा है, कि नवीन ज्ञान की प्राप्ति के व्यवस्थित प्रयत्न को हम शोध कहते हैं।

•      एडवांस्ड लर्नर डिक्शनरी ऑफ करेंट इंग्लिश के अनुसार- किसी भी ज्ञान की शाखा में नवीन तथ्यों की खोज के लिए सावधानीपूर्वक किए गए अन्वेषण या जांच- पड़ताल को शोध की संज्ञा दी जाती है।

•      स्पार और स्वेन्सन ने शोध को परिभाषित करते हुए अपनी पुस्तक में लिखा है कि कोई भी विद्वतापूर्ण शोध ही सत्य के लिए, तथ्यों के लिए, निश्चितताओं के लिए अन्चेषण है। 

•      वहीं लुण्डबर्ग ने शोध को परिभाषित करते हुए लिखा है, कि अवलोकित सामग्री का संभावित वर्गीकरण, साधारणीकरण एवं सत्यापन करते हुए पर्याप्त कर्म विषयक और व्यवस्थित पद्धति है।

शोध के अंग

·       ज्ञान क्षेत्र की किसी समस्या को   सुलझाने की प्रेरणा

·        प्रासंगिक तथ्यों का संकलन

·       . विवेकपूर्ण विश्लेषण और अध्ययन

·       परिणाम स्वरूप निर्णय 

शोध का महत्त्व

•      शोध मानव ज्ञान को दिशा प्रदान करता है तथा ज्ञान भंडार को विकसित एवं परिमार्जित करता है।  

•शोधसे व्यावहारिक समस्याओं का समाधान होता है।                                                                 

•      शोध से व्यक्तित्व का बौद्धिक विकास होता है                                                                     

•      शोध सामाजिक विकास का सहायक है                                                                               

•       शोध जिज्ञासा मूल प्रवृत्ति   (Curiosity Instinct) की संतुष्टि करता है   

•      शोध अनेक नवीन कार्य विधियों व उत्पादों को विकसित करता है                                               

•      शोध पूर्वाग्रहों के निदान और निवारण में सहायक है                                                                 

•       शोध ज्ञान के विविध पक्षों में गहनता और सूक्ष्मता प्रदान करता है।

शोध करने हेतु प्रयोग की जाने वाली पद्धतियाँ

·       सर्वेक्षण पद्धति (Survey method)

·         आलोचनात्मक पद्धति (Critical Method):

·        समस्यामूलक पद्धति (Problem based method)

·        तुलनात्मक पद्धति (Comparative method)

·       वर्गीय अध्ययण पद्धति (Class based method)

·       क्षेत्रीय अध्ययन पद्धति (Regional method)

·       आगमन(induction)-

·       निगमन (Deduction)  पद्धति

आलोचनात्मक पद्धति (Critical Method)

·       काव्यशास्त्रीय पद्धति  (aesthetic/poetics method)

·       समाजशास्त्रीय पद्धति (Sociological method)

·        भाषावैज्ञानिक पद्धति  (Linguistic method)

·       शैली वैज्ञानिक पद्धति (Stylistic method)

·       मनोवैज्ञानिक पद्धति (Psychological method)

शोध के प्रकार

उपयोग के आधार पर

1. विशुद्ध / मूल शोध    (Pure / fundamental Research)

2. प्रायोगिक /प्रयुक्त या क्रियाशील शोध (Applied Research)

काल के आधार पर

·       ऎतिहासिक शोध (Historical Research)

·        वर्णनात्मक / विवरणात्मक शोध  (Descriptive Research)

शोध के कुछ मुख्य प्रकार

1. वर्णनात्मक शोध-  शोधकर्ता का चरों (variables) पर नियंत्रण नहीं होता। सर्वेक्षण पद्धति का प्रयोग होता है। वर्तमान समय का वर्णन होता है। मूल प्रश्न होता है: “क्या है?”

2. विश्लेषणात्मक शोध (Analytical Research) – शोधकर्ता का चरों (variables) पर नियंत्रण होता है। शोधकर्ता पहले से उपलब्ध सूचनाओं व तथ्यों का अध्ययन करता है।

3. विशुद्ध / मूल शोध  - इसमें सिद्धांत (Theory) निर्माण होता है जो ज्ञान का विस्तार करता है। गणित तथा मूल विज्ञान के शोध।

4. प्रायोगिक / प्रयुक्त शोध (Applied Research): समस्यामूलक पद्धति का उपयोग होता है। किसी सामाजिक या व्यावहारिक समस्या का समाधान होता है। इसमें विशुद्ध शोध से सहायता ली जाती है।

5. मात्रात्मक शोध (Quantitative Research):  इस शोध में चरों (variables) का संख्या या मात्रा के आधार पर विश्लेषण किया जाता है।

6. गुणात्मक शोध (qualitative Research) :  इस शोध में चरों (variables) का उनके गुणों के आधार पर विश्लेषण  किया जाता है।

7. सैद्धांतिक शोध (Theoretical Research):  सिद्धांत निर्माण और विकास पुस्तकालय शोध या उपलब्ध डाटा के आधार पर किया जाता है।

8. आनुभविक शोध (Empirical Research):   इस शोध के तीन प्रकार हैं –

         क) प्रेक्षण (Observation) 

         ख) सहसंबंधात्मक (Correlational)

          ग) प्रयोगात्मक (Experimental)

9. अप्रयोगात्मक शोध (Non-Experimental Research) –वर्णनात्मक शोध  के समान

10.  ऎतिहासिक शोध (Historical Research):  इतिहास को ध्यान में रख कर शोध होता है। मूल प्रश्न होता है: “क्या था?”

11.  नैदानिक शोध (Diagnostic / Clinical Research): समस्याओं का पता लगाने के लिए किया जाता है।

शोध प्रबंध की रूपरेखा

·       सही शीर्षक का चुनाव विषय वस्तु को ध्यान में रख कर किया जाए।

·       शीर्षक ऎसा हो जिससे शोध निबंध का उद्देश्य अच्छी तरह से स्पष्ट हो रहा हो।

·       शीर्षक न तो अधिक लंबा ना ही अधिक छोटा हो।

·       शीर्षक में निबंध में उपयोग किए गए शब्दों का ही जहाँ तक हो सके उपयोग हॊ।

·       शीर्षक भ्रामक न हो।

·       शीर्षक को रोचक अथवा आकर्षक बनाने का प्रयास होना चाहिए।

·       शीर्षक का चुनाव करते समय शोध प्रश्न को ध्यान में रखा जाना आवश्यक है।



शोध समस्या का निर्माण  चरण 

(Formulation of research problem)

 समस्या का सामान्य व व्यापक कथन (Statement of the problem in a general way)

समस्या की प्रकृति को समझना  (Understanding the nature of the problem)

संबंधित साहित्य का सर्वेक्षण  (Surveying the related literature)

परिचर्चा के द्वारा विचारों का विकास  (Developing the Ideas through discussion)

 शोध समस्या का पुनर्लेखन  (Rephrasing the research problem)

संबंधित साहित्य का सर्वेक्षण

(Survey of related literature)

संबंधित साहित्य के सर्वेक्षण से तात्पर्य उस अध्ययन से है जो शोध समस्या के चयन के पहले अथवा बाद में उस समस्या पर पूर्व में किए गए शोध कार्यों, विचारों, सिद्धांतों, कार्यविधियों, तकनीक, शोध के दौरान होने वाली समस्याओं आदि के बारे में जानने के लिए किया जाता है।

संबंधित साहित्य का सर्वेक्षण मुख्यत: दो प्रकार से किया जाता है:

1.    प्रारंभिक साहित्य सर्वेक्षण (Preliminary survey of literature)-प्रारंभिक साहित्य सर्वेक्षण शोध कार्य प्रारंभ करने के पहले शोध समस्या के चयन तथा उसे परिभाषित करने के लिए किया जाता है। इस साहित्य सर्वेक्षण का एक प्रमुख उद्देश्य यह पता करना होता है कि आगे शोध में कौन-कौन सहायक संसाधन होंगे।  

2.    व्यापक साहित्य सर्वेक्षण (Broad survey of literature)-व्यापक साहित्य सर्वेक्षण शोध प्रक्रिया का एक चरण होता है। इसमें संबंधित साहित्य का व्यापक अध्ययन किया जाता है। संबंधित साहित्य का व्यापक सर्वेक्षण शोध का प्रारूप के निर्माण तथा डाटा/तथ्य संकलन के कार्य के पहले किया जाता



साहित्य सर्वेक्षण के स्रोत

·       पाठ्य पुस्तक और अन्य ग्रंथ

·       शोध पत्र

·       सम्मेलन / सेमिनार में पढ़े गए आलेख

·       शोध प्रबंध (Theses and Dissertations)

·       पत्रिकाएँ एवं समाचार पत्र

·       इंटरनेट

·       ऑडियो-विडियो

·       साक्षात्कार (Interviews)

·       हस्तलेख अथवा अप्रकाशित पांडुलिपि

परिकल्पना Hypothesis

जब शोधकर्ता किसी समस्या का चयन कर लेता है तो वह उसका एक अस्थायी समाधान (Tentative solution) एक जाँचनीय प्रस्ताव (Testable proposition) के रूप में करता है। इस जाँचनीय प्रस्ताव को तकनीकी भाषा में परिकल्पना/प्राक्‍कल्पना कहते हैं। इस तरह परिकल्पना / प्राकल्पना किसी शोध समस्या का एक प्रस्तावित जाँचनीय उत्तर होती है।

किसी घटना की व्याख्या करने वाला कोई सुझाव या अलग-अलग प्रतीत होने वाली बहुत सी घटनाओं को के आपसी सम्बन्ध की व्याख्या करने वाला कोई तर्कपूर्ण सुझाव परिकल्पना (hypothesis) कहलाता है। वैज्ञानिक विधि के नियमानुसार आवश्यक है कि कोई भी परिकल्पना परीक्षणीय होनी चाहिये।

सामान्य व्यवहार में, परिकल्पना का मतलब किसी अस्थायी विचार (provisional idea) से होता है जिसके गुणागुण (merit) अभी सुनिश्चित नहीं हो पाये हों। आमतौर पर वैज्ञानिक परिकल्पनायें गणितीय माडल के रूप में प्रस्तुत की जाती हैं। जो परिकल्पनायें अच्छी तरह परखने के बाद सुस्थापित (well established) हो जातीं हैं, उनको सिद्धान्त कहा जाता है।

परिकल्पना की विशेषताएँ

·       परिकल्पना को जाँचनीय होना चाहिए।  

·       बनाई गई परिकल्पना का तालमेल (harmony) अध्ययन के क्षेत्र की अन्य    परिकल्पनाओं के साथ होना चाहिए।

·       परिकल्पना को मितव्ययी (parsimonious) होना चाहिए ।  

·       परिकल्पना में तार्किक पूर्णता (logical unity) और व्यापकता का गुण होना चाहिए।  

·       परिकल्पना को मितव्ययी (parsimonious) होना चाहिए।  

·       परिकल्पना को अध्ययन क्षेत्र के मौजूदा सिद्धांतों एवं तथ्यों से संबंधित होना चाहिए ।

·       परिकल्पना को संप्रत्यात्मक (conceptual) रूप से स्पष्ट होना चाहिए।

·       परिकल्पना को अध्ययन क्षेत्र के मौजूदा सिद्धांतों एवं तथ्यों से संबंधित होना चाहिए ।

·       परिकल्पना से अधिक से अधिक अनुमिति (deductions) किया जाना संभव होना चाहिए तथा उसका स्वरूप न तो बहुत अधिक सामान्य होना चाहिए (general) और न ही बहुत अधिक विशिष्ट (specific)।

·       परिकल्पना को संप्रत्यात्मक (conceptual) रूप से स्पष्ट होना चाहिए: इसका अर्थ यह है कि परिकल्पना में इस्तेमाल किए गए संप्रत्यय /अवधारणाएँ (concepts) वस्तुनिष्ठ (objective) ढंग से परिभाषित होनी चाहिए।

परिकल्पना निर्माण के स्रोत

       i.            व्यक्तिगत अनुभव

     ii.            पहले किए शोध के परिणाम

  iii.            पुस्तकें, शोध पत्रिकाएँ, शोध सार आदि

   iv.            उपलब्ध सिद्धांत

     v.            निपुण विद्वानों के निर्देशन में


शोध प्रक्रिया के प्रमुख चरण

1.    अनुसंधान समस्या का निर्माण

2.    संबंधित साहित्य का व्यापक सर्वेक्षण

3.    परिकल्पना/प्राकल्पना (Hypothesis) का निर्माण

4.    शोध की रूपरेखा/शोध प्रारूप (Research Design) तैयार करना

5.    आँकड़ों का संकलन / तथ्यों का संग्रह

6.    आँकड़ो / तथ्यों का विश्‍लेषण

7.    प्राकल्पना की जाँच

8.    सामान्यीकरण एवं व्याख्या

9.    शोध प्रतिवेदन तैयार करना

सरस्वती पूजन कब है क्यों मानते है

बसंत पंचमी विद्या की देवी मॉं सरस्वती की आराधना का दिन है, इसे श्री पंचमी के नाम से भी जाना जाता है। यह समृद्धि और सद्भाव का पर्व है। बसंत पंचमी माघ माह की पंचमी तिथि पर मनाया जाने वाला पर्व है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह पर्व इस साल 22 जनवरी को मनाया जा रहा है। प्राकृतिक रूप से बसंत पंचमी का बड़ा महत्व है क्योंकि इस पर्व से ही बसंत ऋतु की शुरुआत हो जाती है और सर्दी कम होने लगती है। बसंत पंचमी पर हिन्दू धर्म के अनुनायी कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं। इस दिन देवी सरस्वती की पूजन का विशेष विधान है। हिन्दू धर्म में माता सरस्वती को ज्ञान, कला, संस्कृति और संगीत की देवी कहा जाता है।

सरस्वती पूजा का महत्व

हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बसंत पंचमी का पर्व देवी सरस्वती को समर्पित है। क्योंकि इस दिन ही उनका जन्म हुआ था। पौराणिक मान्यता के अनुसार देवी सरस्वती को ब्रह्मा जी की मानस पुत्री कहा गया है। वहीं एक अन्य मत के अनुसार उन्हें ब्रह्मा जी की स्त्री भी कहा जाता है। माता सरस्वती को विद्या की देवी कहते हैं। इनके आशीर्वाद से ज्ञान, विवेक, संगीत और कला में निपुणता मिलती है। इसलिए बसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजा का विशेष विधान है। इस दिन प्रातःकाल से लेकर अपराह्न काल के बीच सरस्वती पूजा की जाती है। इस दौरान विधि विधान से देवी सरस्वती की पूजा-अर्चना की जानी चाहिए।

पढ़ें देवी सरस्वती की वंदना के मंत्र: सरस्वती स्त्रोत

पूजा विधि
बसंत पंचमी पर देवी सरस्वती के पूजन की विधि इस प्रकार है: 
सर्वप्रथम सरस्वती पूजा के लिए एक कलश की स्थापना करें।पूजा की शुरुआत भगवान गणेश की वंदना से करें और फिर शिव जी का ध्यान करें।इसके बाद देवी सरस्वती की पूजा-अर्चना शुरू करें। सबसे पहले उनकी मूर्ति को स्नान कराएं और फिर उन्हें सफेद वस्त्र पहनाएँ।देवी सरस्वती को कुमकुम, गुलाल, पीले फूल और माला चढ़ाएँ। इसके अलावा ऋतु के अनुसार उन्हें फल अर्पित करें।अंत में देवी सरस्वती की आरती के बाद उनसे ज्ञान और विवेक प्रदान करने की कामना करें। 

सरस्वती पूजा के ज्योतिषीय लाभ

बसंत पंचमी के अवसर पर सरस्वती पूजन के कई ज्योतिषीय लाभ हैं। कहते हैं कि जो मनुष्य बसंत पंचमी पर मॉं सरस्वती की आराधना करता है, उसे चंद्र, बृहस्पति, बुध और शुक्र के बुरे प्रभाव से मुक्ति मिलती है। साथ ही वे लोग जिन पर चंद्रमा, बृहस्पति, बुध और शुक्र की महादशा व अंतर्दशा चल रही है उन्हें भी सरस्वती पूजन से लाभ मिलता है। वे व्यक्ति जो ज्ञान और शांति का कामना करते हैं उन्हें सरस्वती स्त्रोत का पाठ अवश्य करना चाहिए। वे छात्र जिन्हें पढ़ाई में बाधा का सामना करना पड़ रहा है उन्हें देवी सरस्वती की पूजा अवश्य करनी चाहिए।

बसंत पंचमी का महत्व

बसंत पंचमी का प्रकृति से गहरा संबंध है। क्योंकि इसी दिन से बसंत ऋतु की शुरुआत होती है। बसंत ऋतु के आगमन से शरद ऋतु धीरे-धीरे क्षीण होने लगती है। इस दौरान खेतों में चारों और सरसों के पीले फूल धरती की सुंदरता को बढ़ाते हैं। बसंत पंचमी के अवसर पर सरस्वती पूजा के अलावा देवी रति और कामदेव की भी पूजा की जाती है। यह पूजन विशेष रूप से वैवाहिक जोड़ों यानि दंपत्तियों के लिए विशेष लाभकारी है। इसके प्रभाव से उनके जीवन में आपसी प्रेम और सद्भाव बना रहता है। वहीं बसंत पंचमी के दिन व्यवसायी गण माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु की पूजा करते हैं। इसके अलावा बसंत पंचमी के दिन कई स्थानों पर पतंगबाजी होती है। इस दौरान समूचा आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से सराबोर हो जाता है।
एस्ट्रोसेज की ओर से सभी पाठकों को बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएँ! हम आशा करते हैं देवी सरस्वती की कृपा आप पर बनी रहे।

जानें बसंत पंचमी पर पूजन का शुभ मुहूर्त:सरस्वती पूजा मुहूर्त

बसंत पंचमी विद्या की देवी मॉं सरस्वती की आराधना का दिन है, इसे श्री पंचमी के नाम से भी जाना जाता है। यह समृद्धि और सद्भाव का पर्व है। बसंत पंचमी माघ माह की पंचमी तिथि पर मनाया जाने वाला पर्व है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह पर्व इस साल 22 जनवरी को मनाया जा रहा है। प्राकृतिक रूप से बसंत पंचमी का बड़ा महत्व है क्योंकि इस पर्व से ही बसंत ऋतु की शुरुआत हो जाती है और सर्दी कम होने लगती है। बसंत पंचमी पर हिन्दू धर्म के अनुनायी कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं। इस दिन देवी सरस्वती की पूजन का विशेष विधान है। हिन्दू धर्म में माता सरस्वती को ज्ञान, कला, संस्कृति और संगीत की देवी कहा जाता है। 

जानें बसंत पंचमी पर पूजन का शुभ मुहूर्त:सरस्वती पूजा मुहूर्त

स्वस्तिवाचन स्वस्तिवाचन (स्वस्तयन) मन्त्र और अर्थ--स्वस्तिवाचन कैसे करे पूजा में स्वस्तिवाचन

स्वस्तिवाचन
स्वस्तिवाचन (स्वस्तयन) मन्त्र और अर्थ--
हमारे देश की यह प्राचीन परंपरा रही है कि जब कभी भी हम कोई कार्य प्रारंभ करते है, तो उस समय मंगल की कामना करते है और सबसे पहले मंगल मूर्ति गणेश की प्रार्थना करते है। इसके लिए दो नाम हमारे सामने आते हैं... पहला श्रीगणेश और दूसरा जय गणेश।
श्रीगणेश का अर्थ होता है कि जब हम किसी कार्य को आरंभ करते है तो इसी नाम के साथ उस कार्य की शुरुआत करते है। जय गणेश का अर्थ होता है कि अब यह कार्य यहां समाप्त हो रहा है। प्राचीनकाल से ही वैदिक मंत्रों में जितनी ऋचाएं आई है,उनके चिन्तन, वाचन से अलौकिक दिव्य शक्ति की प्राप्ति होती है, मन शान्त होता है। किसी भी शुभ कार्य के प्रारम्भ में, विवाह मण्डप पर , शगुन और तिलक में भी इसकी प्रथा है, या फिर जब कभी भी हम कोई मांगलिक कार्य करते है तो स्वस्तिवाचन की परंपरा रही है। यह एक गहरा विज्ञान है, जिसे समझने की आवश्यकता है।
यदि हम केवल मंगल वचन का प्रयोग करे और मांगलिक शब्दों का प्रयोग उसके अर्थ को बगैर जाने हुए करे तो निश्चय ही यह हमारा अंधविश्वास माना जाएगा। मेरा मानना है कि जब तक धर्म को तथा उसके विज्ञान को हम समझ न लें, तब तक केवल अंधविश्वासी होकर उसकी सभी बातों को मानने का कोई औचित्य नहीं है। हमारा धर्म, हमारी संस्कृति,वैदिक ऋचाएं, वैदिक मंत्र, पुराण उपनिषद आदि इन सभी ग्रन्थों के पीछे एक बहुत बड़ा विज्ञान है। हमारे ऋषियों ने जिन वैदिक ऋचाओं और पुराणों की कल्पना की, उपनिषदों के बारे में सोचा था फिर मांगलिक कार्यो के लिए जैसी व्यवस्था की, वह हमारे विज्ञान से किसी भी तरह से अलग नहीं है। उनके द्वारा सोची और की जाने वाली हर एक पहल हमेशा से ही विज्ञान के साथ रही है ....
मंत्र एवं भाषांतर
मन्त्र-१
आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः। देवा नोयथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवेदिवे॥
अर्थ - हमारे पास चारों ओर से ऐंसे कल्याणकारी विचार आते रहें जो किसी से न दबें, उन्हें कहीं से बाधित न किया जा सके एवं अज्ञात विषयों को प्रकट करने वाले हों। प्रगति को न रोकने वाले और सदैव रक्षा में तत्पर देवता प्रतिदिन हमारी वृद्धि के लिए तत्पर रहें। मन्त्र-२
देवानां भद्रा सुमतिर्ऋजूयतां देवानां रातिरभि नो नि वर्तताम्। देवानां सख्यमुप सेदिमा वयं देवा न आयुः प्र तिरन्तु जीवसे ॥
अर्थ - यजमान की इच्छा रखनेवाले देवताओं की कल्याणकारिणी श्रेष्ठ बुद्धि सदा हमारे सम्मुख रहे, देवताओं का दान हमें प्राप्त हो, हम देवताओं की मित्रता प्राप्त करें, देवता हमारी आयु को जीने के निमित्त बढ़ायें।
मन्त्र-३
तान् पूर्वयानिविदाहूमहे वयंभगं मित्रमदितिं दक्षमस्रिधम्।अर्यमणंवरुणंसोममश्विना सरस्वती नः सुभगा मयस्करत्।।
अर्थ - हम वेदरुप सनातन वाणी के द्वारा अच्युतरुप भग, मित्र, अदिति, प्रजापति, अर्यमण, वरुण, चन्द्रमा और अश्विनीकुमारों का आवाहन करते हैं। ऐश्वर्यमयी सरस्वती महावाणी हमें सब प्रकार का सुख प्रदान करें।
मन्त्र-४
तन्नो वातो मयोभु वातु भेषजं तन्माता पृथिवी तत् पिता द्यौः। तद् ग्रावाणः सोमसुतो मयोभुवस्तदश्विना शृणुतं धिष्ण्या युवम् ॥
अर्थ - वायुदेवता हमें सुखकारी औषधियाँ प्राप्त करायें। माता पृथ्वी और पिता स्वर्ग भी हमें सुखकारी औषधियाँ प्रदान करें। सोम का अभिषव करने वाले सुखदाता ग्रावा उस औषधरुप अदृष्ट को प्रकट करें। हे अश्विनी-कुमारो! आप दोनों सबके आधार हैं, हमारी प्रार्थना सुनिये।
मन्त्र-५
तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियंजिन्वमवसे हूमहे वयम्। पूषा नो यथा वेदसामसद् वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये॥
अर्थ - हम स्थावर-जंगम के स्वामी, बुद्धि को सन्तोष देनेवाले रुद्रदेवता का रक्षा के निमित्त आवाहन करते हैं। वैदिक ज्ञान एवं धन की रक्षा करने वाले, पुत्र आदि के पालक, अविनाशी पुष्टि-कर्ता देवता हमारी वृद्धि और कल्याण के निमित्त हों।
मन्त्र-६
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
अर्थ - महती कीर्ति वाले ऐश्वर्यशाली इन्द्र हमारा कल्याण करें, जिसको संसार का विज्ञान और जिसका सब पदार्थों में स्मरण है, सबके पोषणकर्ता वे पूषा (सूर्य) हमारा कल्याण करें। जिनकी चक्रधारा के समान गति को कोई रोक नहीं सकता, वे गरुड़देव हमारा कल्याण करें। वेदवाणी के स्वामी बृहस्पति हमारा कल्याण करें।
मन्त्र-७
पृषदश्वा मरुतः पृश्निमातरः शुभंयावानो विदथेषु जग्मयः।अग्निजिह्वा मनवः सूरचक्षसो विश्वे नो देवा अवसा गमन्निह ॥
अर्थ - चितकबरे वर्ण के घोड़ों वाले, अदिति माता से उत्पन्न, सबका कल्याण करने वाले, यज्ञआलाओं में जाने वाले, अग्निरुपी जिह्वा वाले, सर्वज्ञ, सूर्यरुप नेत्र वाले मरुद्गण और विश्वेदेव देवता हविरुप अन्न को ग्रहण करने के लिये हमारे इस यज्ञ में आयें।
मन्त्र-८
भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।स्थिरैरंगैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥
अर्थ - हे यजमान के रक्षक देवताओं! हम दृढ अंगों वाले शरीर से पुत्र आदि के साथ मिलकर आपकी स्तुति करते हुए कानों से कल्याण की बातें सुनें, नेत्रों से कल्याणमयी वस्तुओं को देखें, देवताओं की उपासना-योग्य आयु को प्राप्त करें। मन्त्र-९
शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम।पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः ॥
अर्थ - हे देवताओं! आप सौ वर्ष की आयु-पर्यन्त हमारे समीप रहें, जिस आयु में हमारे शरीर को जरावस्था प्राप्त हो, जिस आयु में हमारे पुत्र पिता अर्थात् पुत्रवान् बन जाएँ, हमारी उस गमनशील आयु को आपलोग बीच में खण्डित न होने दें।
मन्त्र-१०
अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः।विश्वेदेवा अदितिः पंचजना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम॥
अर्थ - अखण्डित पराशक्ति स्वर्ग है, वही अन्तरिक्ष-रुप है, वही पराशक्ति माता-पिता और पुत्र भी है। समस्त देवता पराशक्ति के ही स्वरुप हैं, अन्त्यज सहित चारों वर्णों के सभी मनुष्य पराशक्तिमय हैं, जो उत्पन्न हो चुका है और जो उत्पन्न होगा, सब पराशक्ति के ही स्वरुप हैं।
मन्त्र-११
ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:, पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:। वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:, सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥ ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥
अर्थ - द्युलोक शान्तिदायक हों, अन्तरिक्ष लोक शान्तिदायक हों, पृथ्वीलोक शान्तिदायक हों। जल, औषधियाँ और वनस्पतियाँ शान्तिदायक हों। सभी देवता, सृष्टि की सभी शक्तियाँ शान्तिदायक हों। ब्रह्म अर्थात महान परमेश्वर हमें शान्ति प्रदान करने वाले हों। उनका दिया हुआ ज्ञान, वेद शान्ति देने वाले हों। सम्पूर्ण चराचर जगत शान्ति पूर्ण हों अर्थात सब जगह शान्ति ही शान्ति हो। ऐसी शान्ति मुझे प्राप्त हो और वह सदा बढ़ती ही रहे। अभिप्राय यह है कि सृष्टि का कण-कण हमें शान्ति प्रदान करने वाला हो। समस्त पर्यावरण ही सुखद व शान्तिप्रद हो।

धातु (पठ्, गम्, नम्, दृश्/पश्य, खाद्, लिख्, वद्, क्रीड्, धाव्, हस्, स्था, पा, दा, नी, भू आदि) के लट्, लङ् और लृट् लकार

 धातु (पठ्, गम्, नम्, दृश्/पश्य, खाद्, लिख्, वद्, क्रीड्, धाव्, हस्, स्था, पा, दा, नी, भू आदि) के लट्, लङ् और लृट् लकार दृश् (पश्य) धातु (दे...