Tuesday, May 8, 2018

११५ ऋषियों के नाम, जो कि हमारा गोत्र भी है.... चलन के अनुसार एक गोत्र मे हिन्दुओ की शादी वर्जित है ...गोत्र ज्ञान ............. उन ११५ ऋषियों के नाम, जो कि हमारा गोत्र भी है....... १.अत्रि गोत्र, २.भृगुगोत्र, ३.आंगिरस गोत्र, ४.मुद्गल गोत्र, ५.पातंजलि गोत्र,

११५ ऋषियों के नाम, जो कि हमारा गोत्र भी है....

चलन के अनुसार एक गोत्र मे हिन्दुओ की शादी वर्जित है ...गोत्र ज्ञान .............
उन ११५ ऋषियों के नाम, जो कि हमारा गोत्र भी है.......
१.अत्रि गोत्र,
२.भृगुगोत्र,
३.आंगिरस गोत्र,
४.मुद्गल गोत्र,
५.पातंजलि गोत्र,
६.कौशिक गोत्र,
७.मरीच गोत्र,
८.च्यवन गोत्र,
९.पुलह गोत्र,
१०.आष्टिषेण गोत्र,
११.उत्पत्ति शाखा,
१२.गौतम गोत्र,
१३.वशिष्ठ और संतान (क)पर वशिष्ठ गोत्र, (ख)अपर वशिष्ठ गोत्र, (ग)उत्तर वशिष्ठ गोत्र, (घ)
पूर्व वशिष्ठ गोत्र, (ड)दिवा वशिष्ठ गोत्र !!!
१४.वात्स्यायन गोत्र,
१५.बुधायन गोत्र,
१६.माध्यन्दिनी गोत्र,
१७.अज गोत्र,
१८.वामदेव गोत्र,
१९.शांकृत्य गोत्र,
२०.आप्लवान गोत्र,
२१.सौकालीन गोत्र,
२२.सोपायन गोत्र,
२३.गर्ग गोत्र,
२४.सोपर्णि गोत्र,
२५.शाखा,
२६.मैत्रेय गोत्र,
२७.पराशर गोत्र,
२८.अंगिरा गोत्र,
२९.क्रतु गोत्र,
३०.अधमर्षण गोत्र,
३१.बुधायन गोत्र,
३२.आष्टायन कौशिक गोत्र,
३३.अग्निवेष भारद्वाज गोत्र, ३४.कौण्डिन्य गोत्र,
३५.मित्रवरुण गोत्र,
३६.कपिल गोत्र,
३७.शक्ति गोत्र,
३८.पौलस्त्य गोत्र,
३९.दक्ष गोत्र,
४०.सांख्यायन कौशिक गोत्र, ४१.जमदग्नि गोत्र,
४२.कृष्णात्रेय गोत्र,
४३.भार्गव गोत्र,
४४.हारीत गोत्र,
४५.धनञ्जय गोत्र,
४६.पाराशर गोत्र,
४७.आत्रेय गोत्र,
४८.पुलस्त्य गोत्र,
४९.भारद्वाज गोत्र,
५०.कुत्स गोत्र,
५१.शांडिल्य गोत्र,
५२.भरद्वाज गोत्र,
५३.कौत्स गोत्र,
५४.कर्दम गोत्र,
५५.पाणिनि गोत्र,
५६.वत्स गोत्र,
५७.विश्वामित्र गोत्र,
५८.अगस्त्य गोत्र,
५९.कुश गोत्र,
६०.जमदग्नि कौशिक गोत्र, ६१.कुशिक गोत्र,
६२. देवराज गोत्र,
६३.धृत कौशिक गोत्र,
६४.किंडव गोत्र,
६५.कर्ण गोत्र,
६६.जातुकर्ण गोत्र,
६७.काश्यप गोत्र,
६८.गोभिल गोत्र,
६९.कश्यप गोत्र,
७०.सुनक गोत्र,
७१.शाखाएं गोत्र,
७२.कल्पिष गोत्र,
७३.मनु गोत्र,
७४.माण्डब्य गोत्र,
७५.अम्बरीष गोत्र,
७६.उपलभ्य गोत्र,
७७.व्याघ्रपाद गोत्र,
७८.जावाल गोत्र,
७९.धौम्य गोत्र,
८०.यागवल्क्य गोत्र,
८१.और्व गोत्र,
८२.दृढ़ गोत्र,
८३.उद्वाह गोत्र,
८४.रोहित गोत्र,
८५.सुपर्ण गोत्र,
८६.गालिब गोत्र,
८७.वशिष्ठ गोत्र,
८८.मार्कण्डेय गोत्र,
८९.अनावृक गोत्र,
९०.आपस्तम्ब गोत्र,
९१.उत्पत्ति शाखा गोत्र,
९२.यास्क गोत्र,
९३.वीतहब्य गोत्र,
९४.वासुकि गोत्र,
९५.दालभ्य गोत्र,
९६.आयास्य गोत्र,
९७.लौंगाक्षि गोत्र,
९८.चित्र गोत्र,
९९.विष्णु गोत्र,
१००.शौनक गोत्र,
१०१.पंचशाखा गोत्र,
१०२.सावर्णि गोत्र,
१०३.कात्यायन गोत्र,
१०४.कंचन गोत्र,
१०५.अलम्पायन गोत्र,
१०६.अव्यय गोत्र,
१०७.विल्च गोत्र,
१०८.शांकल्य गोत्र,
१०९.उद्दालक गोत्र,
११०.जैमिनी गोत्र,
१११.उपमन्यु गोत्र,
११२.उतथ्य गोत्र,
११३.आसुरि गोत्र,
११४.अनूप गोत्र,
११५.आश्वलायन गोत्र !!!!!
कुल संख्या १०८. ही है, लेकिन इनकी छोटी-छोटी ७ शाखा और हुई है ! इस प्रकार कुल मिलाकर इनकी पुरी संख्या ११५ है ।।

आप सभी अपने अपने बच्चों को अपना गोत्र जरूर बताएं ।

गोत्र

यह शब्द बड़ा ही रोचक इतिहास समेटे हुए है।
गोत्र का अर्थ है— गोशाला (cowshed)।

त्र प्रत्यय (अन्त्यलग्न/suffix) का प्रधान अर्थ है— रक्षक।
अत: गोत्र का अर्थ हुआ— गोरक्षक
जिसका तद्भव है— गोरखा।

गो के तीन अभिप्राय हैं—
1. गाय की कोई विशेष प्रजाति (नस्ल/breed)।
2. गेहूँ (गोधूम) की कोई विशेष प्रजाति।
    (गोमेध = गोवत्स-बधियाकरण व गेहूँ की खेती)
3. वेद की कोई विशेष शाखा।

भारत में पिता-पुत्र-क्रम (male lineage) को गोत्र संज्ञा प्रदान की गई थी और प्रत्येक पिता-पुत्र-क्रम गो के उपर्युक्त तीनों रूपों की रक्षा कर रहा था।

अब ऐसा नहीं हो रहा है!
इसी कारण गाय व गेहूँ की प्रजातियाँ नष्टप्राय हैं तथा वेद-वेदांगों का ज्ञान भी क्षीण हो गया है।

हिन्दू संस्कृति के मूलाधार
    1. जाति
    2. स्मृति
    3. श्रुति

संस्कृति - कोई समूह अपने सदस्यों के लिए जो "प्राप्तव्य" मानता है उनकी प्राप्ति हेतु जो "मूल्य" स्थापित करता है एवं जो "जीवन-पद्धति" निर्धारित करता है उनकी समष्टि उस समूह की "संस्कृति" होती है।

प्राप्तव्य - इन्हें "पुरुषार्थ" भी कहते हैं। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष - ये चार पुरुषार्थ कहे गए हैं।

धर्म - समस्त कर्तव्यों की समष्टि "धर्म" है। इसका मूल है - "पारस्परिक समादर"। महाभारतानुसार-
    श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चाप्यवधार्यताम्।
    आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्॥

अर्थ - आहार, निद्रा एवं सुरक्षा की समष्टि "अर्थ" है।

काम - दूसरे का साथ एवं मनोतुष्टि "काम" है।

मोक्ष - मानसिक दासता का अन्त एवं स्वयं से ही सन्तुष्टि "मोक्ष" है। इसका मूल है - वैयक्तिक स्वातन्त्र्य (individual freedom) अर्थात् कोई भी व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति अथवा समूह द्वारा साधन की भाँति उपयोग में नहीं लाया जा सकता।

हिन्दू संस्कृति धर्मप्रधान है अर्थात् हिन्दू संस्कृति के अनुसार धर्म को साथ लिए बिना अर्थ, काम व मोक्ष में से किसी की भी प्राप्ति की चेष्टा आत्मघाती एवं विनाशकारी सिद्ध होती है।

जाति - किसी व्यक्ति की समस्त जीन-सम्पदा (genetic inheritance) उसकी "जाति" है। इसमें कुल, वंश, गोत्र आदि भी अन्तर्निहित हैं। इसकी रक्षा हेतु जातिधर्म, कुलधर्म आदि निर्धारित हैं जिनमें इतिहास भी अन्तर्निहित होता है। जाति प्राचीन एवं मौलिक है जबकि चातुर्वर्ण्य (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र) केवल नवीन आयोजन मात्र था जो अब विलीन हो चुका है। प्रत्येक वर्ण में अनेक जातियाँ होती थीं जो परस्पर विवाह से बचने का प्रयास करती थीं। भारत में बाहर से आने वाला कोई समूह किसी वर्ण में स्वीकृत होने पर अपना पृथक् अस्तित्व नहीं खोता था। इतना ही नहीं, एक जाति जिस वर्ण की सदस्य होती थी कालान्तर में उससे इतर वर्ण में भी स्थान पा सकती थी। यद्यपि अपवादस्वरूप वैयक्तिकरूपेण कतिपय व्यक्तियों को इतर जाति में ले लिया गया किन्तु ऐसे उदाहरण अतिन्यून एवं नगण्य हैं, साथ ही उनके नाम से पृथक् गोत्र भी चलाया गया। यथा - राजर्षि कौशिक के जाति-परिवर्तन से उनका ब्रह्मर्षि बन जाना। किसी जाति की सामाजिक उच्चता अथवा निम्नता पूर्णतया स्थायी नहीं है। स्वजाति को उठाने हेतु उद्योग करना चाहिए। हीनभावना अथवा सम्मान के लोभ से छलपूर्वक अन्य जाति में प्रविष्ट होने की कुचेष्टा स्वजातिद्रोह, स्वपूर्वजद्रोह एवं आत्मद्रोह है, विश्वासघात है।

स्मृति - वे गीत, अनुष्ठान, उत्सव, परम्परा आदि "स्मृति" हैं जिनमें निहित ज्ञान व इतिहास सुविज्ञात है। स्मृति-आधारित कर्तव्य "स्मार्त-धर्म" कहलाता है। स्मृति अरक्षित होने पर श्रुति बन जाती है अथवा नष्ट हो जाती है।

श्रुति - वे गीत, अनुष्ठान, उत्सव, परम्परा आदि "श्रुति" हैं जिनमें निहित ज्ञान व इतिहास विस्मृत अथवा अस्पष्ट हो चुका हैॆ। श्रुति-आधारित कर्तव्य "श्रौत-धर्म" कहलाता है। श्रुति में श्रम करने वाले के लिए श्रुति समय-समय पर अपने रहस्यों को उद्घाटित करती रहती है।

जाति, स्मृति व श्रुति की रक्षा हेतु निर्धारित धर्म (कर्तव्य-समष्टि) का पालन करने वाले "हिन्दू" हैं। इन तीनों की रक्षा वस्तुत: निज इतिहास एवं अस्तित्व की ही रक्षा है।
    धर्मो रक्षति रक्षित: !
    यतो धर्मस्ततो जय: !!

Sanskrit ke naam संगणक-विषयक-शब्दावली

Sanskrit ke naam

संगणक-विषयक-शब्दावली

(1)ID.— परिचयपत्रम्
(2)Data – टंकितांश:
(3) Edit – सम्पादनम्
(4)Keyboard – कुंचिपटलम्
(5) Timeline – समयरेखा
(6) Login – प्रवेश:
(7)Share - वितरणम्, प्रसारणम्
(8) Laptop – अंकसंगणकम्
(9) Search - अन्वेषणम्
(10)Default - पूर्वनिविष्ठम्
(11)Input – निवेश:
(12)Output - फलितम्
(13)Block – अवरोध:
(14)Display – प्रदर्शनम् / विन्यास:
(15)Wallpaper - भीत्तिचित्रम्
(16)Theme – विषयवस्तु:
(17)User – उपभोक्ता
(18) Smart phone - कुशलदूरवाणी
(19)Tag - चिह्नम्
(20)Setup – प्रतिष्ठितम्
(21)Install - प्रस्थापना / प्रतिस्थापनम्
(22)Privacy - गोपनीयता
(23)Manual – हस्तक्रिया
(24)Accessibility - अभिगम्यता
(25)Error – त्रुटि:
(26)Pass word – गूढशब्द:
(27) Code no. - कूटसंख्या
(28) Pen drive - स्मृतिशलाका
(1.) क्लास रूमः--कक्ष्या
(2.) बेंच (पुस्तक रखने की)---दीर्घोत्पीठिका,
(3.) बेंच (बैठने की)---दीर्घपीठिका,
(4.) मेज---उत्पीठिका,
(5.) कुर्सीः--आसन्दः,
(6.) बैगः--स्यूतः,
(7.) किताब--पुस्तकम्,
(8.) कलम--लेखनी (कलमः),
(9.) लडकी--बाला या बालिका,
(10.) लडका--बालः,
(11.) छाता---छत्रम्,
(12.) टीचर (पुरुष)---शिक्षकः,
(13.) टीचर (लेडी) शिक्षिका,
(14.) अलमारी--काष्ठमञ्जूषा,
(15.) आरामकुर्सी---सुखासन्दिका,
(16.) इंक पेंसिल, डॉट पेन--मसितूलिका,
(17.) शूज--उपानह्,
(18.) ड्रेस---परिधानम्,
(19.) ओढनी--प्रच्छदपटः,
(20.) ओवरकोट---बृहतिका,
(21.) कंघी---प्रसाधनी,
(22.) कक्षा का साथी---सतीर्थ्यः, सहपाठी,
(23.) कमरा---कक्षः,
(24.) खिडकी---गवाक्षः,
(25.) पंखा---व्यजनम्,
(26.) एसी---वातायनम्,
(27.) डेस्टर--मार्जकः,
(28.) इन्स्पेक्टर---निरीक्षकः,
(29.) कम्प्यूटर---संगणकः,
(30.) कागज---कर्गदः, (कागदः) (कर्गलम्)
(31.) रिफिल---मसियष्टिः,
(32.) कॉपी---सञ्चिका,
(33.) रजिस्टर---पञ्जिका,
(34.) कार्टुन--उपहासचित्रम्,
(35.) ड्रॉइंग---रेखाचित्रम्,
(36.) कॉलेज--महाविद्यालयः,
(37.) स्कूल---विद्यालयः,
(38.) यूनीवर्सिटी--विश्वविद्यालयः,
(39.) किवाड--कपाटम्,
(40.) गेट--द्वारम्,
(41.) मेन गेट---मुख्यद्वारम्,
(42.) दीवार---भित्तिका,
(43.) दीवारघडी---भित्तिघटिका,
(44.) घडी---घटिका,
(45.) दवात का ढक्कन--कुप्पी,
(46.) कुर्ता--कञ्चुकः,
(47.) कैंची---कर्तरी,
(48.) कोठरी---लघुकक्षः,
(49.) गेटकीपर--द्वारपालः,
(50.) पिअन--सेवकः,
(51.) क्लर्क--लिपिकारः, करणिकः,
(52.) मैदान---क्षेत्रम्,
(53.) खेल का मैदान--क्रीडाक्षेत्रम्,
(54.) स्पोर्ट्स--क्रीडा,
(55.) गेन्द---कन्दुकः,गेन्दुकम्,
(56.) फुटबॉल---पादकन्दुकम्,
(57.) घण्टा--होरा,
(58.) चपरासी---लेखहारकः, प्रेष्यः,
(59.) चप्पल---पादुका, पादुुः,
(60.) चॉक--कठिनी,
(61.) चांसलर--कुलपतिः,
(62.) चारों ओर मुडने वाली कुर्सी---पर्पः,
(63.) रंग---वर्णः,
(64.) चिह्न-अंकः,
(65.) चोटी---शिखा. सानुः,
(66.) रिसिस---जलपानवेला,
(67.) जिल्द--प्रावरणम्,
(68.) झाडू--मार्जनी,
(69.) टाइम टेबल--समय-सारणी,
(70.) कैरीकुलम्---पाठ्यक्रमः,
(71.) टेनिस का खेल--प्रक्षिप्तकन्दुकक्रीडा,
(72.) एजुकेशन टाइरेक्टर---शिक्षासञ्चालकः,
(73.) डिप्टी डाइरेक्टर (शिक्षा)--उपशिक्षासञ्चालकः,
(74.) डेस्क--लेखनपीठम्,
(75.) ड्रॉइंग रूप---उपवेशगृहम्,
(76.) दरी--आस्तरणम्,
(77.) दस्ता (कागज का)--दस्तकः,
(78.) निब---लेखनीमुखम्,
(79.) नेट --जालम्,
(80.) नेलकटर---नखनिकृन्तनम्,
(81.) नेलपॉलिश--नखरञ्जनम्,
(82.) पायजामा--पादयामः,
(83.) पॉलिश---पादुरञ्जनम्, पादुरञ्जकः,
(84.) पेंसिल--तूलिका,
(85.) पैण्ट--आप्रपदीनम्,
(86.) पोर्टिको (बरामदा)---प्रकोष्ठः,
(87.) प्रिंसिपल---(पु.) प्रधानाचार्यः, प्रधानाध्यापकः प्राचार्यः,
(स्त्री) प्रधानाचार्या, प्रधानाध्यापिका, प्राचार्या,
(88.) प्रोफेसर--प्राध्यापकः,
(89.) फर्श---कुट्टिमम्,
(90.) फाउण्टेन पेन---धारालेखनी,
(91.) फाइल--पत्रसञ्चयिनी,
(92.) फीस--शुल्कः,
(93.) बरामदा--वरण्डः,
(94.) बाथरूम---स्नानागारः,
(95.) बेंच--काष्ठासनम्,
(96.) बैंड---वादित्रगणः,
(97.) बैडमिण्टन---पत्रिक्रीडा,
(98.) मेज--फलकम्,
(99.) पढाई की मेज--लेखनफलकम्,
(100.) यूनिफॉर्म---एकपरिधानम्, एकवेषः

वैदिक काल की गणतांत्रिक शासन प्रणालियां'साम्राज्य','भौज्य','स्वाराज्य','वैराज्य', इत्यादि'प्राचीन भारत में लोकतंत्र'

वैदिक काल की गणतांत्रिक शासन प्रणालियां'साम्राज्य','भौज्य','स्वाराज्य','वैराज्य', इत्यादि'प्राचीन भारत में लोकतंत्र'-5सुप्रभात मित्रो! मैंने इस लेखमाला के पिछले लेखों में बताया है कि वैदिक कालीन शासन प्रणाली किस प्रकार विशुद्ध रूप से गणतांत्रिक थी, हालांकि उत्तर वैदिक काल में 'शासन प्रणाली की मुख्य धारा 'राजतंत्र' की ओर अग्रसर होने लगी थी किन्तु देशके अनेक भागों में गणतंत्रीय अथवा संघीय शासन प्रणालियों का दौर भी जारी रहा था जिसका चरम विकसित रूप हम बौद्ध काल में देखते हैं।राजनैतिक विचारों के विकास की दृष्टि से 'ऐतरेय ब्राह्मण' में राजा और राज्य की उत्पत्ति के सिद्धान्त का भी आविर्भाव होचुका था। उत्तर वैदिक काल में राजा का अधिकार ऋग्वेद के काल की अपेक्षा कुछ अधिक विस्तृत और पारिभाषिक स्वरूप धारण कर चुका था। परिणामतः इस काल में चक्रवर्ती राज्य एवं राज्याभिषेक को राजनैतिक दृष्टि से विशेष महत्त्व दिया जाने लगा था।उत्तरवर्ती वैदिक काल में राजा को बड़ी-बड़ी उपाधियों से महामंडित किया जाने लगा, जैसे- 'अधिराज', 'राजाधिराज', 'सम्राट','एकराट्' इत्यादि। हालांकि यह प्रक्रिया संहिताओं के काल से ही प्रारम्भ हो चुकी थी। 'ऐतरेय ब्राह्मण' में उत्तर वैदिक कालीन लोकतांत्रिक शासन प्रणालियों का यह रोचक वर्णन मिलता है कि समूचे भारत की शासन प्रणालियां उस समय किस प्रकार अलग अलग राजनैतिक आस्थाओं में विभाजित हो चुकी थीं। 'ऐतरेय ब्राह्मण' के अनुसार प्राच्य (पूर्व) के शासक 'सम्राट' की उपाधि धारण करते थे, पश्चिम के 'स्वराट', उत्तर के 'विराट्', दक्षिण के 'भोज' तथा मध्यदेश के 'राजा' कहलाते थे। ऐतरेय ब्राह्मण (8.4.18) में ही वैदिक काल की विविध शासन प्रणालियों का वर्णन मिलता है,जैसे साम्राज्य, भौज्य, स्वाराज्य, वैराज्य, पारमेष्ठ्य, राज्य, माहाराज्य,आधिपत्य इत्यादि-"साम्राज्याय,भौज्याय,स्वाराज्याय, वैराज्याय,पारमेष्ठ्याय,राज्याय,माहाराज्या, आधिपत्याय,श्वावश्याय,आतिष्ठाय अभिषिञ्चति।"-ऐत.ब्रा.8.4.18वैदिक काल की शासन प्रणालियां1.साम्राज्य- इस प्रणाली का शासक ‘सम्राट्’ कहलाता था जो कि राष्ट्र का एकछत्र अधिकारी होता था। यह प्रणाली मगध, कलिंग आदि में प्रचलित थी।2.भौज्य- इस प्रणाली में शासक ‘भोज’ कहलाता था। यह प्रणाली दक्षिण दिशा के राज्यों में प्रचलित थी। इस प्रणाली में प्रजा कल्याण की भावना को सर्वाधिक महत्त्व दिए जाने के कारण इसे काफी लोकप्रियता प्राप्त थी।3.स्वाराज्य- यह स्वशासित प्रणाली है। इसके शासक को ‘स्वराट्’ कहते थे। इसमें राजा स्वतंत्र रूप से शासन करने का अधिकार रखता था।यह प्रणाली सौराष्ट्र, कच्छ, सौवीर आदि राज्यों में प्रचलित थी।4.वैराज्य- यह शासन प्रणाली संघीय शासन प्रणाली है इसमें प्रशासन का उत्तरदायित्व व्यक्ति पर न होकर समूह या गण पर होता था। इसमें शासक को ‘विराट्’ कहते थे। वैदिक काल में हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों 'उत्तरकुरु' और 'उत्तरमद्र' में खासकर कुमाऊं और नेपाल के हिमवत प्रदेशों में,'वैराज्य' की शासन प्रणाली से राज काज चलाने की परम्परा रही थी- "हिमवंत जनपदा उत्तरकुरव उत्तरमद्रा इति वै वैराज्यायेव ते$भिषिच्यन्ते"-ऐत.ब्रा. 8.145.पारमेष्ठ्य- इसमें शासक को ‘परमेष्ठी’ कहते थे। यह गणतन्त्रात्मक पद्धति थी। इसका मुख्य उद्देश्य प्रजा में शांति-व्यवस्था की स्थापना था।6.राज्य- इसका शासक ‘राजा’ होता था,जिसकी सहायता के लिए 'मंत्रि-परिषद्'का भी गठन किया जाता था।अधिकांश प्रजाहितसे जुड़े फैसले राजा 'मंत्रि-परिषद्'की सहायता से ही करता था।7.माहाराज्य- इसका शासक ‘महाराज’ कहलाता था। यह राज्य पद्धति का उच्चतर रूप है।8.आधिपत्य- इसका शासक ‘अधिपति’ होता था। छान्दोग्योपनिषद् (5.6) में इसका उल्लेख मिलता है।9.सार्वभौम- इसमें शासक को ‘एकराट्’ कहते थे। इसमें राजा सम्पूर्ण भूमि का स्वामी होता है।10. जानराज्य- इसमें शासक ‘जनराजा’ कहा जाता था। ऋग्वेद (1.53.9) में राजा सुदास के साथ दस जनराजाओं के युद्ध का वर्णन आया है।11. आधिराज्य- इसमें शासक ‘अधिराज’ कहा जाता था। इसमें शासक निरंकुश होता था।12. विप्रराज्य- ऋग्वेद और अथर्ववेद में इसका वर्णन है-"शवो यज्ञेषु विप्रराज्ये।"-ऋग्वेद 8.3.413. समर्यराज्य- यह धनाढ्य वर्ग का राज्य प्रतीत होता है। वर्त्तमान सन्दर्भ में इसे पूंजीपति शासन प्रणाली भी कह सकते हैं। इसमें व्यापारिक गतिविधियों को विशेष महत्त्व दिया जाता था।'समर्य' का अर्थ है-'श्रेष्ठ वैश्य'। ऋग्वेद में इस 'समर्यराज्य' का उल्लेख मिलता है-"अनु हि त्वा सुतं सोम मदामसि महे समर्यराज्ये।"-ऋग्वेद 9.110.214.राष्ट्रराज्य- वैदिक साहित्य में राज्य अथवा प्रदेश के अर्थ में 'राष्ट्र' शब्द का प्रयोग बहुतायत से हुआ है। अथर्ववेद (19.30.3) के एक मंत्र -"त्वं राष्ट्राणि रक्षसि" में 'राष्ट्र' शब्द का बहुवचन में प्रयोग यह बताता है कि उस समय अनेक राष्ट्रराज्यों का अस्तित्व बना हुआ था जिन्हें हम आधुनिक 'राष्ट्र राज्य' के रूप में भी परिभाषित कर सकते हैं।अथर्ववेद में 'राष्ट्रराज्य' के स्वरूप की विशेष चर्चा आई है जिसकी चर्चा हम आगामी लेखों में करेंगे।आगामी लेख में पढ़ें-

हस्तलिखित पाण्डुलिपियां धर्म, दर्शन, इतिहास, साहित्य, संस्कृति के सर्वाधिक प्रामाणिक स्रोत माने जाते हैं। इसलिए ज्ञान-विज्ञान की इस अमूल्य धरोहर का संरक्षण राष्ट्रीय दायित्व बन जाता है।

हस्तलिखित पाण्डुलिपियां धर्म, दर्शन, इतिहास, साहित्य, संस्कृति के सर्वाधिक प्रामाणिक स्रोत माने जाते हैं। इसलिए ज्ञान-विज्ञान की इस अमूल्य धरोहर का संरक्षण राष्ट्रीय दायित्व बन जाता है। भारत के पास विश्व का सबसे बड़ा पाण्डुलिपि संग्रह है। लगभग एक करोड़ से भी अधिक पाण्डुलिपियां भारत के विभिन्न संस्थानों, पुस्तकालयों तथा व्यक्तिगत संग्रहालयों में विद्यमान हैं। समुचित रख-रखाव तथा अपेक्षित मूल्याङ्कन के अभाव के कारण भारत की यह समृद्ध पाण्डुलिपि सम्पदा नष्ट होने के खतरे का सामना कर रही है। चिन्ता सबसे बड़ी यह है कि इन प्राचीन पाण्डुलिपियों में अधिकांश संस्कृत की कृतियाँ हैं। इसलिए संस्कृत के विद्वानों द्वारा ज्ञान विज्ञान की इस राष्ट्रीय धरोहर की रक्षा करना मुख्य दायित्व हो जाता है।पांडुलिपियों के संरक्षण के लिए आज आधुनिक विधियों को अपनाने की जरूरत है।जैसा कि भंडारकर शोध संस्थान, पुणे जैसी संस्थाओं में इन विधियों को अपनाया जा रहा है। इन्हें न केवल संरक्षित करने की जरूरत है,अपितु इनके विषय-वस्तु का अत्याधुनिक विधियों द्वारा स्कैन करना भी जरूरी है ताकि इन्हें जरा भी क्षति पहुँचाए बगैर इनकी सामग्री सुरक्षित रखी जा सके।दरअसल, जब भारत में मैकाले शिक्षा पद्धति लागू की गई थी तो एक षड्यंत्र के तहत केवल यूरोपीय पद्धति पर आधारित शिक्षा को भारत में लागू किया गया। इसके पीछे एक मकसद यह भी था लोगों के मन में संस्कृत भाषा के प्रति हीनभावना भरना।उस समय जब आधुनिक शिक्षा पद्धति पर प्राच्यविदों और उपयोगितावादियोंमें बहस छिड़ी तब एक बीच का रास्ता निकाला जा सकता थाजिसमें आधुनिक ज्ञान भी शामिल होता और पांडुलिपियों के माध्यम से 4000 से भी अधिक साल का संचित ज्ञान भी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। संस्कृत केवल धर्म-कर्म की भाषा बन कर रह गई और अंग्रेजी ज्ञान-विज्ञान की भाषा बन गई। यही वजह है कि नई पीढ़ी के जो बच्चे हैरी पॉटर श्रृंखला के प्रति अपनी खास रुचि दिखाते हैं किन्तु पंचतंत्र जैसी रचनाओं के बारे में उदासीनऔर अनजान बने रहते हैं। जबकि पंचतंत्र की एक सुंदर कहानी के पीछे एक संदेश भी निहित था जो भारतीय शिक्षा पद्धति का सार था।पांडुलिपि संरक्षण के संबंध में हमारी लापरवाही का नतीजा ही था कि भारत में सबसे पहली बार संस्कृत सीखने वाले प्राच्यविदविलियम जोन्स को 'अभिज्ञानशाकुन्तलम्' की केवल एक पांडुलिपि ही मिली और वह भी बांग्ला लिपि में। जब विलियम जोन्स ने 'अभिज्ञानशाकुन्तलम्' पढ़ना शुरू किया तो अध्ययन के मध्य ही उन्होंने अपने पिता को पत्र लिखा कि मैं दो हजार वर्ष पुराने एक संस्कृत नाटक का अध्ययन कर रहा हूँ, इसका लेखन हमारे महान लेखक शेक्सपीयर के इतना निकट है कि ऐसा भ्रम होने लगता है कि शेक्सपीयर ने कहीं शाकुन्तलम् का अध्ययन तो नहीं किया। जोन्स का यह पत्र उस समय प्रकाशित नहीं हुआ अन्यथा यूरोप में बड़ी खलबली मच जाती। यहाँ हमें समझना होगा कि संस्कृत की महान धरोहर की उपेक्षा कर, हम 4000 साल से अधिक पुराने समयके संचित ज्ञान को खो देते हैं।ज्ञानविज्ञान की धरोहर स्वरूप ये पाण्डुलिपियां ताड़पत्र, भूर्जपत्र, कागज, कपड़ा,लकड़ी,चमड़े,पत्थर, मिट्टी, सोने, चाँदी, पीतल, ताम्बे, लोहे, संगमरमर, हाथीदाँत, सीप, शंख आदि पर लिखी गई होती हैं।अतः इनके परिरक्षण के उपाय भी विविध प्रकार से किए जाते हैं। क्षेत्रीय जलवायु और मौसम का प्रभाव भी पाण्डुलिपियों पर पड़ता है। दक्षिण की अधिक ऊष्ण हवा में ताड़पत्र में लिखी पुस्तकें अधिक दिनों तक सुरक्षित नहीं रह सकती हैं। किन्तु नेपाल आदि शीत प्रदेशों में दीर्घकाल तक ताड़पत्र मेंलिखी पाण्डुलिपियां संरक्षित रह सकती हैं। नेपाल में ताड़पत्रीय पुस्तकों की खोज की गई तो 11वीं शती के पूर्वकालीन हस्तलिखित ग्रन्थ आज भी संरक्षित हैं, जिनमें, सातवीं शताब्दी ईस्वी का ‘स्कन्दपुराण’, नवीं शताब्दी ई. का ‘परमेश्वरतंत्र’तथा दसवीं शताब्दी का बौद्ध ग्रंथ ‘लंकावतार’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इसी प्रकार भोजपत्र पर लिखी पुस्तकों के संरक्षण की दृष्टि से कश्मीर का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। दूसरी-तीसरी शताब्दी की रचना ‘धम्मपद’, चौथीशताब्दी का संस्कृत में लिखा ‘संयुक्तागमसूत्र’ एवं आठवीं शताब्दी में रचित ‘अंकगणित’ आदि पाण्डुलिपियां खोतान एवं बख्शाली से प्राप्त हुई हैं। बौद्ध पुस्तकें प्रायः स्तूपों की भीतर रहने तथा पत्थरों के बीच गढ़े रहने से बहुत दीर्घकाल तक सुरक्षित रह पाई हैं। परन्तु खुले वातावरण में रहने वाले भूर्जपत्र में लिखे ग्रन्थ 15वीं शताब्दी ई. से पूर्व के नहीं मिलते। कागज में लिखे ग्रन्थ भी प्रायः ज्यादा समय तक टिकाऊ नहीं होते किन्तु यदि उनके संरक्षण के प्रति यदि विशेष सावधानी रखी जाए तो ये ग्रन्थ भी दीर्घजीवी हो सकते हैं। इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय है कि बेबर को पांचवीं शताब्दी ई. मेंलिखे भारतीय गुप्तलिपि में लिखे चार ग्रन्थ मध्य एशिया में यारकंद से 60 मील दक्षिण में स्थित ‘कुगिअर’ नामक स्थान सेजमीन में गढ़े मिले तथा एक संस्कृत ग्रन्थ ‘कासगर’ से प्राप्त हुआ। इन सभी उदाहरणों से यह ज्ञात होता है कि ताड़पत्र, भूर्जपत्र और कागज की यद्यपि लम्बी आयु नहीं रहती किन्तु ग्रंथ संरक्षण के प्रति विशेष सावधानी रखी जाए तो इन्हें भी दीर्घजीवी बनाया जा सकता है।भारत के प्राचीन ग्रन्थ लेखक पाण्डुलिपि संरक्षण दृष्टि से भी विशेष जागरूक रहे थे। प्राचीन काल में पांडुलिपि संरक्षण की अनेक विधियां प्रचलित थी। उन्हीं विधियों के प्रयोग से ऋग्वेद की कुछ ऐसी पांडुलिपियाँ भी संरक्षित रहीं जो हजारों साल पहले लिखी गई थी। इसलिए बहुत से हस्तलिखित ग्रन्थों के अन्त में निम्नलिखित संस्कृत के श्लोक लिखे मिलते हैं जिनका पाण्डुलिपि संरक्षण की दृष्टि से भी विशेष महत्त्व है-"जलाद् रक्षेत् स्थलाद् रक्षेत् ,रक्षेत् शिथिलबंधनात्।मूर्खहस्ते न दातव्या,एवं वदति पुस्तिका।।""उदकानिल चौरेभ्योमूषकेभ्यो हुताशनात्।कष्टेन लिखितं शास्त्रंयत्नेन परिपालयेत् ।।"-अर्थात् जल से ग्रन्थ की रक्षा करनी चाहिए क्योंकि जल कागज पत्र को गला देता है, स्याही को फैला देता है या धो देता है।स्थल यानी खुले स्थान पर धूल, मिट्टी ग्रन्थ को भ्रष्ट कर देती है। दीमक, कीड़े-मकोड़े आदि ग्रन्थ को चटकर जाते हैं। नमी और आग से भी ग्रन्थ को हानि पहुँचती है। चूहों तथा चोरों से भी मूल्यवान ग्रन्थ की रक्षा की जानी चाहिए। इस प्रकार लेखक द्वारा जीवन भर साधना करने के बाद लिखा गया शास्त्र-ग्रन्थ मूर्खतावश अथवा लापरवाही के कारण पल भर में नष्ट हो जाता है।सन् 2003 में भारत सरकार द्वारा स्थापित ‘राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन’ के अस्तित्व में आने से अब पाण्डुलिपियों के संरक्षण का कार्य अत्यन्त वैज्ञानिक पद्धति से किया जाने लगा है।आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी के नवीनातिनवीन तकनीकों से पाण्डुलिपियों की रक्षा करना तथा उनकी उपयोगिता को जन सामान्य तक पहुँचाना अब पहले की अपेक्षा सरल और सहजहो गया है। मिशनने इस संबंध में द्विमुखी योजना को प्रारम्भ किया है-1- मूल पाण्डुलिपियों का निवारणात्मक एवं उपचारात्मक संरक्षण तथा2- सांख्यिकीकरण की आधुनिक प्रक्रिया द्वारा पाण्डुलिपियों का संरक्षण।सन् 2011 में पाण्डुलिपि मिशन ने अपने नई दिल्ली स्थित मुख्यालय में प्रायः निष्क्रिय संरक्षण प्रयोगशाला को सुप्रशिक्षित संरक्षकों की सहायता से पुनः सक्रिय किया है तथा संरक्षण से सम्बन्धित आधुनिक तकनीक के प्रयोग को लोकप्रिय एवं व्यावहारिक रूप देने के लिए अपनी वेबसाइट पर ‘अभिलेखीय सामग्री के सांख्यिकीकरण हेतु दिशा निर्देश’ भी जारी किये हैंजिनका मुख्य उद्देश्य है भविष्य के लिए पाण्डुलिपि संरक्षण हेतु जनमानस को जागरूक करना तथा नई सूचना प्रौद्योगिकी के माध्यम से पाण्डुलिपियों का संरक्षण एवं परिरक्षण करना। मिशन ने इस उद्देश्य पूर्ति के लिए चार प्रयोगात्मक माध्यम निर्धारित किए हैं-

संस्कृत भाषा के प्रश्न उत्तर एक प​क्ति में– 1. वेत्रवती नदी किस नगरी में स्थि​त थी? – विदिशा में  2. काव्यप्रकाश में उल्लिखित 'अनलंकृती' किसका विशेषण है? – शब्दार्थ का  3. मम्मट के अनुसार काव्य कितने प्रकार का होता है?– तीन  4. रघुवंश महाकाव्य किसकी स्तुति से प्रारम्भ होता है? – शिव-पार्वती की  5. भास द्वारा लिखित उपलब्ध नाटकों की संख्या कितनी है? – तेरह 6. किस नियम से ग्, द्, ब् हो जाते हैं क्, त्, प्? – ग्रिम नियम 7. लेट् लकार किस संस्युत में प्रयुक्त हुआ है? – वैदिक  8. काव्यप्रकाश में 'तात्पर्यार्थोsपि केषुचित्' में किसके मत का संकेत है? – मीमांसक 9. मम्मट के अनुसार उत्तमकाव्य क्या होता है? –ध्वनि 10. किस अलंकार में उपनाम-पक्ष उपमेय-पक्ष का निगरण कर लेता है? – अतिशयोक्ति 11. भूत एवं भावी घटनाओं की सूचना देने वाला नाट्यप्रयोग कौन-सा है? – विष्कम्भक 12. श्रृंगार रस में कौन सी वृत्ति का प्रयोग होता है? – कैशिकी 13. ध्वन्यालोक में 'काव्यस्यात्मा स एवार्थ:' से अभिप्राय है? – प्रतीयमान अर्थ 14. रसनिष्पत्ति के प्रसंग में भुक्तिवादी आचार्य कौन से हैं? – भट्टनायक 15. काव्यशास्त्रियों में कौन आचार्य मम्मट हैं? –समन्वयवादी 16. सन्धि कहाँ आवश्यक नहीं मानी जाती? – वाक्य में 17. 'मनोरथ:' में सन्धि-विच्छेद क्या होगा? – मन: + रथ:  18. 'विद्वान + लिखति– में सन्धि क्या होगी? –विद्वाल्लिखति 19. 'हिंत मनोहारि व दुर्लभ: वच:' सूक्ति किस काव्य की है? – किरातार्जुनीयम् 20. कौन-सा समास नित्य नपुंसकलिंग एकवचन में प्रयुक्त होता है? – द्विगु 21. 'समानाधिकरण तत्पुरुष' समास का नाम क्या है? – कर्मधारय  22. संस्कृत में 'कारकों' की संख्या कितनी मानी गई है? – छ:  23. 'रुच्यर्थानां प्रीयमाण:' यह सूत्र किस विभक्ति का विधायक है? – चतुर्थी  24. 'श्रीमद्भगवद्गीता' के द्वितीय अध्याय का नाम क्या है? – सांख्ययोग 25. 'नीलो घट:' में गुण-गुणी का कौन-सा सम्बन्ध है? – समवाय सम्बन्ध 26. 'न्यायशास्त्र' में प्रमेयों की संख्या कितनी मानी गई है? – बारह  27. 'सांख्य' के अनुसार इन्द्रियों की उत्पत्ति कहां से होती है? – अहंकार से 28. केवल 'जाति' में शब्द का संकेतग्रह मानने वाले मतवादी कौन हैं? – मीमांसक 29. 'अपोह' को शब्दार्थ मानने वाले मतवादी कौन हैं? – बौद्ध  30. मम्मट द्वारा उपादानलक्षणा के उदाहरण 'गौरनुबन्ध्य:' में किस आचार्य के मत का खण्डन किया गया है? – मुकुल भट्ट  31. रसनिष्पत्ति के सन्दर्भ में 'साधारणी-करण' का सर्वप्रथम प्रयोग किसने किया है? – भट्टनायक ने 32. शब्दगत एवं अर्थगत बीस गुणों के प्रतिपादक आचार्य कौन हैं? – वामन  33. अंगश्लेष को अर्थालंकारों में परिगणित करने वाले आचार्य कौन हैं? – रुय्यक 34. प्रस्तुत में अप्रस्तुत की सम्भावना होने पर अलंकार क्या होता है? – उत्प्रेक्षा 35. किस प्रकार के काव्य को एक 'देशानुकारि' कहा गया है? – खण्डकाव्य 36. अधोलिखित में से कौन सा काव्य अर्वाचीन है? – सीताचरितम् 37. नाट्य में जहाँ प्रस्तुत भावी कथावस्तु की अन्योक्तिमय सूचना दी जाती है वह क्या होता है? – पताकास्थानक 38. रूपक में भूत अथवा भावी घटनाओं की सूचना जहाँ मध्यम पात्रों द्वारा दी जाती है वह क्या होता है? – विष्कम्भक 39. आचार्य धनञ्चय ने दशरूपक में नागानन्द के नायक जीमूतवाहन को क्या माना है? – धीरोदात्त  40. 'प्रसन्नराघव' नाटक के रचयिता कौन हैं? – जयदेव 41. 'अभिज्ञानशाकुन्तल' के चतुर्थ अंक में 'लोकोनियम्यत इवात्मदशान्तरेषु' पघांश में अलंकार कौन सा है? –  उत्प्रेक्षा 42. 'मेघदूत' में यक्ष 'वक्र: पन्था यदपि भवत:' आदि कहकर मेघ से किस नगरी में जाने का अनुरोध करता है? – उज्जयिनी 43. पूर्वमेघ में विन्ध्याचल की तलहटी में बिखरी हुई किस नदी का वर्णन है? – रेवा 44. 'सर्वे गुणा: काञ्चनमाश्रयन्ति' किसकी उक्ति है? – भर्तृहरि 45. 'मृच्छकटिकम्' प्रकरण के प्रथम अंक का नाम क्या है? – अलड्कारन्यास 46. 'शिवराजविजय' गद्यकाव्य का आरम्भ कहां से होता है? – सूर्योदय वर्णन से 47. 'भामिनीविलास' काव्य के रचयिता कौन हैं? – जगन्नाथ 48. किरातार्जुनीय महाकाव्य के प्रथम सर्ग में प्राय: प्रयुक्त छन्द कौन सा है? – वंशस्थ  49. सर्वप्रथम 'पञ्चतन्त्र' का सम्पादन किस विदेशी विद्वान ने किया? – हर्टेल  50. संस्कृ​त साहित्य में हास्य-व्यंग्य का सर्वश्रेष्ठ रचनाकार किसे माना जाता है? – दामोदर

संस्कृत भाषा के प्रश्न उत्तर एक प​क्ति में–
1. वेत्रवती नदी किस नगरी में स्थि​त थी? – विदिशा में 
2. काव्यप्रकाश में उल्लिखित 'अनलंकृती' किसका विशेषण है? – शब्दार्थ का 
3. मम्मट के अनुसार काव्य कितने प्रकार का होता है?– तीन 
4. रघुवंश महाकाव्य किसकी स्तुति से प्रारम्भ होता है? – शिव-पार्वती की 
5. भास द्वारा लिखित उपलब्ध नाटकों की संख्या कितनी है? – तेरह
6. किस नियम से ग्, द्, ब् हो जाते हैं क्, त्, प्? – ग्रिम नियम
7. लेट् लकार किस संस्युत में प्रयुक्त हुआ है? – वैदिक 
8. काव्यप्रकाश में 'तात्पर्यार्थोsपि केषुचित्' में किसके मत का संकेत है? – मीमांसक
9. मम्मट के अनुसार उत्तमकाव्य क्या होता है? –ध्वनि
10. किस अलंकार में उपनाम-पक्ष उपमेय-पक्ष का निगरण कर लेता है? – अतिशयोक्ति
11. भूत एवं भावी घटनाओं की सूचना देने वाला नाट्यप्रयोग कौन-सा है? – विष्कम्भक
12. श्रृंगार रस में कौन सी वृत्ति का प्रयोग होता है? – कैशिकी
13. ध्वन्यालोक में 'काव्यस्यात्मा स एवार्थ:' से अभिप्राय है? – प्रतीयमान अर्थ
14. रसनिष्पत्ति के प्रसंग में भुक्तिवादी आचार्य कौन से हैं? – भट्टनायक
15. काव्यशास्त्रियों में कौन आचार्य मम्मट हैं? –समन्वयवादी
16. सन्धि कहाँ आवश्यक नहीं मानी जाती? – वाक्य में
17. 'मनोरथ:' में सन्धि-विच्छेद क्या होगा? – मन: + रथ: 
18. 'विद्वान + लिखति– में सन्धि क्या होगी? –विद्वाल्लिखति
19. 'हिंत मनोहारि व दुर्लभ: वच:' सूक्ति किस काव्य की है? – किरातार्जुनीयम्
20. कौन-सा समास नित्य नपुंसकलिंग एकवचन में प्रयुक्त होता है? – द्विगु
21. 'समानाधिकरण तत्पुरुष' समास का नाम क्या है? – कर्मधारय 
22. संस्कृत में 'कारकों' की संख्या कितनी मानी गई है? – छ: 
23. 'रुच्यर्थानां प्रीयमाण:' यह सूत्र किस विभक्ति का विधायक है? – चतुर्थी 
24. 'श्रीमद्भगवद्गीता' के द्वितीय अध्याय का नाम क्या है? – सांख्ययोग
25. 'नीलो घट:' में गुण-गुणी का कौन-सा सम्बन्ध है? – समवाय सम्बन्ध
26. 'न्यायशास्त्र' में प्रमेयों की संख्या कितनी मानी गई है? – बारह 
27. 'सांख्य' के अनुसार इन्द्रियों की उत्पत्ति कहां से होती है? – अहंकार से
28. केवल 'जाति' में शब्द का संकेतग्रह मानने वाले मतवादी कौन हैं? – मीमांसक
29. 'अपोह' को शब्दार्थ मानने वाले मतवादी कौन हैं? – बौद्ध 
30. मम्मट द्वारा उपादानलक्षणा के उदाहरण 'गौरनुबन्ध्य:' में किस आचार्य के मत का खण्डन किया गया है? – मुकुल भट्ट 
31. रसनिष्पत्ति के सन्दर्भ में 'साधारणी-करण' का सर्वप्रथम प्रयोग किसने किया है? – भट्टनायक ने
32. शब्दगत एवं अर्थगत बीस गुणों के प्रतिपादक आचार्य कौन हैं? – वामन 
33. अंगश्लेष को अर्थालंकारों में परिगणित करने वाले आचार्य कौन हैं? – रुय्यक
34. प्रस्तुत में अप्रस्तुत की सम्भावना होने पर अलंकार क्या होता है? – उत्प्रेक्षा
35. किस प्रकार के काव्य को एक 'देशानुकारि' कहा गया है? – खण्डकाव्य
36. अधोलिखित में से कौन सा काव्य अर्वाचीन है? – सीताचरितम्
37. नाट्य में जहाँ प्रस्तुत भावी कथावस्तु की अन्योक्तिमय सूचना दी जाती है वह क्या होता है? – पताकास्थानक
38. रूपक में भूत अथवा भावी घटनाओं की सूचना जहाँ मध्यम पात्रों द्वारा दी जाती है वह क्या होता है? – विष्कम्भक
39. आचार्य धनञ्चय ने दशरूपक में नागानन्द के नायक जीमूतवाहन को क्या माना है? – धीरोदात्त 
40. 'प्रसन्नराघव' नाटक के रचयिता कौन हैं? – जयदेव
41. 'अभिज्ञानशाकुन्तल' के चतुर्थ अंक में 'लोकोनियम्यत इवात्मदशान्तरेषु' पघांश में अलंकार कौन सा है? –  उत्प्रेक्षा
42. 'मेघदूत' में यक्ष 'वक्र: पन्था यदपि भवत:' आदि कहकर मेघ से किस नगरी में जाने का अनुरोध करता है? – उज्जयिनी
43. पूर्वमेघ में विन्ध्याचल की तलहटी में बिखरी हुई किस नदी का वर्णन है? – रेवा
44. 'सर्वे गुणा: काञ्चनमाश्रयन्ति' किसकी उक्ति है? – भर्तृहरि
45. 'मृच्छकटिकम्' प्रकरण के प्रथम अंक का नाम क्या है? – अलड्कारन्यास
46. 'शिवराजविजय' गद्यकाव्य का आरम्भ कहां से होता है? – सूर्योदय वर्णन से
47. 'भामिनीविलास' काव्य के रचयिता कौन हैं? – जगन्नाथ
48. किरातार्जुनीय महाकाव्य के प्रथम सर्ग में प्राय: प्रयुक्त छन्द कौन सा है? – वंशस्थ 
49. सर्वप्रथम 'पञ्चतन्त्र' का सम्पादन किस विदेशी विद्वान ने किया? – हर्टेल 
50. संस्कृ​त साहित्य में हास्य-व्यंग्य का सर्वश्रेष्ठ रचनाकार किसे माना जाता है? – दामोदर

शिष्यः - पढ़नेवाला दासः - नौकर भानुः - सूर्य गुरुः - पढ़ानेवाला बन्धुः - सम्बन्धी तवते - तेरा मम - मेरा तस्य - उसका कृपा - दया मार्गः -

भव - हो जाना
धावति - दौड़ता है
भ्रष्ट - गिरा हुआ
शिष्यः - पढ़नेवाला
दासः - नौकर
भानुः - सूर्य
गुरुः - पढ़ानेवाला
बन्धुः - सम्बन्धी
तवते - तेरा
मम - मेरा
तस्य - उसका
कृपा - दया
मार्गः - रास्ता
कुत्र - कहां
यत्र - जहां
अत्र - यहां
तत्र - वहां
सर्वत्र - सब स्थान पर
किम् - क्या
सः - वह
अहम् - मैं
त्वम् - तू
न - नहीं
अस्ति - है
कः - कौन
नास्ति - नहीं है
यदा - जब
कदा - तब
सदा - हमेशा
तदा - तब
यदि - अगर
तर्हि - तो
यथा - जैसे
तथा - वैसे
कथम् - कैसे
श्वः - कल (आगामी दिन )
हृाः - कल (बिता दिन )
अद्य - आज
दिवा - दिन में
मध्याह्रे - दोपहर में
अपि - भी
च - और
एकम् - एक
अन्यः - दूसरा
कर्म - कार्य
पात्रम् - वर्तन
मुखम् - मुँह
नेत्रम् - आँख

संस्कृत केवल एक मात्र भाषा नहीं है अपितु संस्कृत एक विचार है। संस्कृत एक संस्कृति है एक संस्कार है संस्कृत में विश्व का कल्याण है, शांति है, सहयोग है, वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना है। in Upendar dubey

संस्कृत केवल एक मात्र भाषा नहीं है अपितु संस्कृत एक विचार है। संस्कृत एक संस्कृति है एक संस्कार है संस्कृत में विश्व का कल्याण है, शांति है, सहयोग है, वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना है।  
Upendar dubey

धातु (पठ्, गम्, नम्, दृश्/पश्य, खाद्, लिख्, वद्, क्रीड्, धाव्, हस्, स्था, पा, दा, नी, भू आदि) के लट्, लङ् और लृट् लकार

 धातु (पठ्, गम्, नम्, दृश्/पश्य, खाद्, लिख्, वद्, क्रीड्, धाव्, हस्, स्था, पा, दा, नी, भू आदि) के लट्, लङ् और लृट् लकार दृश् (पश्य) धातु (दे...