Wednesday, June 14, 2023

षड्दर्शन दर्शन -6

षड्दर्शन
षड्दर्शन उन भारतीय दार्शनिक एवं धार्मिक विचारों के मंथन का परिपक्व परिणाम है जो हजारों वर्षो के चिन्तन से उतरा और हिन्दू (वैदिक) दर्शन के नाम से प्रचलित हुआ। इन्हें आस्तिक दर्शन भी कहा जाता है। दर्शन और उनके प्रणेता निम्नलिखित है।
१ पूर्व मीमांसा: महिर्ष जैमिनी
२ वेदान्त (उत्तर मीमांसा): महिर्ष बादरायण
३ सांख्य: महिर्ष कपिल
४ वैशेषिक: महिर्ष कणाद
५ न्याय: महिर्ष गौतम
६ योग: महिर्ष पतंजलि

वेद ज्ञान को समझने व समझाने के लिए दो प्रयास हुए:

१. दर्शनशास्त्र
२. ब्राह्यण और उपनिषदादि ग्रन्थ।

कणाद के वैशेषिक दर्शन की गौतम के न्याय-दर्शन से

वैशेषिक दर्शन के प्रथम दो सूत्र है-
अथातो धर्म व्याख्यास्याम:।।
अब हम धर्म की व्याख्या करेंगे।
यतोSभ्युदयनि: श्रेयससिद्धि: स धर्म:।।

जिससे इहलौकिक और पारलौकिक (नि:श्रेयस) सुख की सिध्दि होती है वह धर्म है।
कणाद के वैशेषिक दर्शन की गौतम के न्याय-दर्शन से भिन्नता इस बात में है कि इसमें छब्बीस के बजाय ७ ही तत्वों को विवेचन है। जिसमें विशेष पर अधिक बल दिया गया है।
ये तत्व है-द्रव्य, गुण, कर्म, समन्वय,विशेष और अभाव।

Saturday, June 3, 2023

प्रथम दिवसः*१) *मम नाम* उपेन्द्र: *भवतः/भवत्याः नाम* किम् ? (परिचय-introduce ) भवतः- पु लिंगः Male / भवत्याः-स्त्री लिंगः female

प्रथम दिवसः*

१) *मम नाम* उपेन्द्र:

   *भवतः/भवत्याः नाम* किम् ? 
(परिचय-introduce ) भवतः- पु लिंगः Male / भवत्याः-स्त्री लिंगः female

२) *सः* बालकः/ *सा* बालिका/तत् फलम्
     (सः-पुलिंगः Male/ सा-स्त्रीलिंगः female/तत्- न लिंगः Third gender) 

३) *एषः* शिक्षकः/ *एषा* शिक्षिका/एतत् फलम्।
   (एषः-पुलिंग Male / एषा-स्त्रीलिंग Female /एतत्-न.लिंग Third gender) 

४) एषः नायकः *वा* ? *आम्* ,एषः नायकः । *न* , एषः शिक्षकः। 
    (आम्-हाँ Yes /न-नहिं No) 

५) *अस्ति* / *नास्ति*-- आरक्षकः अस्ति । आरक्षिका नास्ति।        
(अस्ति-हे yes / नास्ति-नहिं हे No) 

६) अत्र--रामः *अत्र* अस्ति । (अत्र-यहाॅ here)
    तत्र--गायकः *तत्र* अस्ति । (तत्र-वहाॅ Thare)
    कुत्र- लेखकः *कुत्र* अस्ति ? (कुत्र-कहाॅ where)
    अन्यत्र--पाचकः *अन्यत्र* अस्ति । (अन्यत्र- दूसरे जगह second place)
    सर्वत्र--वायुः *सर्वत्र* अस्ति । (सर्वत्र-हर जगह every where)
    एकत्र--बालकगणः *एकत्र* अस्ति । (एकत्र- हर जगह one place)

वर्णों के उच्चारण करने की चेष्टा को ' प्रयत्न ' कहते है।प्रयत्न दो प्रकार के होते है---:1-आभ्यान्तर प्रयत्न2-बाह्य प्रयत्न

वर्णों के उच्चारण करने की चेष्टा को ' प्रयत्न ' कहते है।
प्रयत्न दो प्रकार के होते है---:
1-आभ्यान्तर प्रयत्न
2-बाह्य प्रयत्न

-आभ्यान्तर प्रयत्न पाँच प्रकार के होते है

1 स्पृष्ट ( स्पर्श)- क से म तक के वर्ण ।
2 ईषत् स्पृष्ट - य ,र , ल , व ।
3 ईषत् विवृत - श , ष , स , ह ।
4 विवृत - अ इ उ ऋ लृ ए ओ ऐ औ ।
संवृत
" इसमें वायु का मार्ग बन्द रहता है । प्रयोग करने में ह्रस्व " अ " का प्रयत्न संवृत होता है किन्तु शास्त्रीय प्रक्रिया में " अ " का प्रयत्न विवृत होता है।

बाह्य प्रयत्न 

उच्चारण की उस चेष्टा को " बाह्य प्रयत्न " कहते है ; जो मुख से वर्ण निकलते समय होती है।
बाह्य प्रयत्न -- 11 प्रकार के होते है।
1 विवार
2 संवार
3 श्वास
4 नाद
5 घोष
6 अघोष
7 अल्पप्राण
8 महाप्राण
9 उदात्त
10 अनुदात्त
11 त्वरित
#संस्कृतकाउदय
#संस्कृत
#Sanskrit
#व्याकरण

#Sanskritkauday

गणना तन्त्र (ऋषि मुनियों द्वारा किया गया अनुसंधान)

 भीv   VV  .वvब vV hm V 😊. KVJ u  V  Hkc ये  HNVY
Mv है  hM mJivvvkvhunn   Jhn v N B .नव kj😊  .  जकवज.ई
Vn
कफ,,, भी
 गणना तन्त्र (ऋषि मुनियों द्वारा किया गया अनुसंधान)

■ काष्ठा = सैकन्ड का  v34000 वाँ भाग
■  1 त्रुटि =n सैकन्ड का 300 वाँ भाग
■ 2 त्रुटि = nv1 v ल vव
■ 1 लव = 1 क्षण
■ 3
V0 क्षण = 1 विपल
■ 60 विपल = 1 पल,
■ hv6  0 पल = 1 घ वह.ड़ी (24 मिनट)
■ 2.5 घड़ी( 24×2. 5=60 मिनट) = 1 होरा (एक घन्टा ) 
■ 24 होरा यानी 24 घन्टा = 1 दिन
■ 7 दिवnस = 1 सप्ताह
■ h4 सप्ताह = 1 माहn😊b😊
■ 2 माह =  1 vऋ तू 
■. है गv
  वज. ह .  वव 6g ऋतू c या.नी 12 माह = 1 वर्ष
■jबग 😊j   bn🌹है jvउवniव kc 1 0 0  व vnर्ष = 1 शताब्दी
न. v■ vh10. शताब्दी  =j 1 सvहस्राब्दी
■ 432 सहस्राब्दी = 1 vयुnग
■ 2 युग = 1 द्वापर युग 
■ 3 युग = 1 त्रैता युग
■ 4 युग = सतयुग
■ सतयुग + त्रेतायुग + द्वापरयुग + कलियुग = 1 महायुग
■ 72 महायुग = मनवन्तर
■ 1000 महायुग = 1 कल्प
■ 1 नित्य प्रलय = 1 महायुग (धरती पर जीवन अन्त और फिर आरम्भ)
■ 1 नैमितिका प्रलय = 1 कल्प (देवों का अन्त और जन्म)
■ महालय  = 730 कल्प (ब्राह्मा का अन्त और जन्म)


Monday, May 22, 2023

हस्तलिखित पाण्डुलिपियां

 

हस्तलिखित पाण्डुलिपियां

हस्तलिखित पाण्डुलिपियां धर्म, दर्शन, इतिहास, साहित्य, संस्कृति के सर्वाधिक प्रामाणिक स्रोत माने जाते हैं। इसलिए ज्ञान-विज्ञान की इस अमूल्य धरोहर का संरक्षण राष्ट्रीय दायित्व बन जाता है। भारत के पास विश्व का सबसे बड़ा पाण्डुलिपि संग्रह है। लगभग एक करोड़ से भी अधिक पाण्डुलिपियां भारत के विभिन्न संस्थानों, पुस्तकालयों तथा व्यक्तिगत संग्रहालयों में विद्यमान हैं। समुचित रख-रखाव तथा अपेक्षित मूल्याङ्कन के अभाव के कारण भारत की यह समृद्ध पाण्डुलिपि सम्पदा नष्ट होने के खतरे का सामना कर रही है। चिन्ता सबसे बड़ी यह है कि इन प्राचीन पाण्डुलिपियों में अधिकांश संस्कृत की कृतियाँ हैं। इसलिए संस्कृत के विद्वानों द्वारा ज्ञान विज्ञान की इस राष्ट्रीय धरोहर की रक्षा करना मुख्य दायित्व हो जाता है।पांडुलिपियों के संरक्षण के लिए आज आधुनिक विधियों को अपनाने की जरूरत है।जैसा कि भंडारकर शोध संस्थान, पुणे जैसी संस्थाओं में इन विधियों को अपनाया जा रहा है। इन्हें न केवल संरक्षित करने की जरूरत है,अपितु इनके विषय-वस्तु का अत्याधुनिक विधियों द्वारा स्कैन करना भी जरूरी है ताकि इन्हें जरा भी क्षति पहुँचाए बगैर इनकी सामग्री सुरक्षित रखी जा सके।दरअसल, जब भारत में मैकाले शिक्षा पद्धति लागू की गई थी तो एक षड्यंत्र के तहत केवल यूरोपीय पद्धति पर आधारित शिक्षा को भारत में लागू किया गया। इसके पीछे एक मकसद यह भी था लोगों के मन में संस्कृत भाषा के प्रति हीनभावना भरना।उस समय जब आधुनिक शिक्षा पद्धति पर प्राच्यविदों और उपयोगितावादियोंमें बहस छिड़ी तब एक बीच का रास्ता निकाला जा सकता थाजिसमें आधुनिक ज्ञान भी शामिल होता और पांडुलिपियों के माध्यम से 4000 से भी अधिक साल का संचित ज्ञान भी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। संस्कृत केवल धर्म-कर्म की भाषा बन कर रह गई और अंग्रेजी ज्ञान-विज्ञान की भाषा बन गई। यही वजह है कि नई पीढ़ी के जो बच्चे हैरी पॉटर श्रृंखला के प्रति अपनी खास रुचि दिखाते हैं किन्तु पंचतंत्र जैसी रचनाओं के बारे में उदासीनऔर अनजान बने रहते हैं। जबकि पंचतंत्र की एक सुंदर कहानी के पीछे एक संदेश भी निहित था जो भारतीय शिक्षा पद्धति का सार था।पांडुलिपि संरक्षण के संबंध में हमारी लापरवाही का नतीजा ही था कि भारत में सबसे पहली बार संस्कृत सीखने वाले प्राच्यविदविलियम जोन्स को 'अभिज्ञानशाकुन्तलम्' की केवल एक पांडुलिपि ही मिली और वह भी बांग्ला लिपि में। जब विलियम जोन्स ने 'अभिज्ञानशाकुन्तलम्' पढ़ना शुरू किया तो अध्ययन के मध्य ही उन्होंने अपने पिता को पत्र लिखा कि मैं दो हजार वर्ष पुराने एक संस्कृत नाटक का अध्ययन कर रहा हूँ, इसका लेखन हमारे महान लेखक शेक्सपीयर के इतना निकट है कि ऐसा भ्रम होने लगता है कि शेक्सपीयर ने कहीं शाकुन्तलम् का अध्ययन तो नहीं किया। जोन्स का यह पत्र उस समय प्रकाशित नहीं हुआ अन्यथा यूरोप में बड़ी खलबली मच जाती। यहाँ हमें समझना होगा कि संस्कृत की महान धरोहर की उपेक्षा कर, हम 4000 साल से अधिक पुराने समयके संचित ज्ञान को खो देते हैं।ज्ञानविज्ञान की धरोहर स्वरूप ये पाण्डुलिपियां ताड़पत्र, भूर्जपत्र, कागज, कपड़ा,लकड़ी,चमड़े,पत्थर, मिट्टी, सोने, चाँदी, पीतल, ताम्बे, लोहे, संगमरमर, हाथीदाँत, सीप, शंख आदि पर लिखी गई होती हैं।अतः इनके परिरक्षण के उपाय भी विविध प्रकार से किए जाते हैं। क्षेत्रीय जलवायु और मौसम का प्रभाव भी पाण्डुलिपियों पर पड़ता है। दक्षिण की अधिक ऊष्ण हवा में ताड़पत्र में लिखी पुस्तकें अधिक दिनों तक सुरक्षित नहीं रह सकती हैं। किन्तु नेपाल आदि शीत प्रदेशों में दीर्घकाल तक ताड़पत्र मेंलिखी पाण्डुलिपियां संरक्षित रह सकती हैं। नेपाल में ताड़पत्रीय पुस्तकों की खोज की गई तो 11वीं शती के पूर्वकालीन हस्तलिखित ग्रन्थ आज भी संरक्षित हैं, जिनमें, सातवीं शताब्दी ईस्वी का ‘स्कन्दपुराण’, नवीं शताब्दी ई. का ‘परमेश्वरतंत्र’तथा दसवीं शताब्दी का बौद्ध ग्रंथ ‘लंकावतार’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इसी प्रकार भोजपत्र पर लिखी पुस्तकों के संरक्षण की दृष्टि से कश्मीर का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। दूसरी-तीसरी शताब्दी की रचना ‘धम्मपद’, चौथीशताब्दी का संस्कृत में लिखा ‘संयुक्तागमसूत्र’ एवं आठवीं शताब्दी में रचित ‘अंकगणित’ आदि पाण्डुलिपियां खोतान एवं बख्शाली से प्राप्त हुई हैं। बौद्ध पुस्तकें प्रायः स्तूपों की भीतर रहने तथा पत्थरों के बीच गढ़े रहने से बहुत दीर्घकाल तक सुरक्षित रह पाई हैं। परन्तु खुले वातावरण में रहने वाले भूर्जपत्र में लिखे ग्रन्थ 15वीं शताब्दी ई. से पूर्व के नहीं मिलते। कागज में लिखे ग्रन्थ भी प्रायः ज्यादा समय तक टिकाऊ नहीं होते किन्तु यदि उनके संरक्षण के प्रति यदि विशेष सावधानी रखी जाए तो ये ग्रन्थ भी दीर्घजीवी हो सकते हैं। इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय है कि बेबर को पांचवीं शताब्दी ई. मेंलिखे भारतीय गुप्तलिपि में लिखे चार ग्रन्थ मध्य एशिया में यारकंद से 60 मील दक्षिण में स्थित ‘कुगिअर’ नामक स्थान सेजमीन में गढ़े मिले तथा एक संस्कृत ग्रन्थ ‘कासगर’ से प्राप्त हुआ। इन सभी उदाहरणों से यह ज्ञात होता है कि ताड़पत्र, भूर्जपत्र और कागज की यद्यपि लम्बी आयु नहीं रहती किन्तु ग्रंथ संरक्षण के प्रति विशेष सावधानी रखी जाए तो इन्हें भी दीर्घजीवी बनाया जा सकता है।भारत के प्राचीन ग्रन्थ लेखक पाण्डुलिपि संरक्षण दृष्टि से भी विशेष जागरूक रहे थे। प्राचीन काल में पांडुलिपि संरक्षण की अनेक विधियां प्रचलित थी। उन्हीं विधियों के प्रयोग से ऋग्वेद की कुछ ऐसी पांडुलिपियाँ भी संरक्षित रहीं जो हजारों साल पहले लिखी गई थी। इसलिए बहुत से हस्तलिखित ग्रन्थों के अन्त में निम्नलिखित संस्कृत के श्लोक लिखे मिलते हैं जिनका पाण्डुलिपि संरक्षण की दृष्टि से भी विशेष महत्त्व है-"जलाद् रक्षेत् स्थलाद् रक्षेत् ,रक्षेत् शिथिलबंधनात्।मूर्खहस्ते न दातव्या,एवं वदति पुस्तिका।।""उदकानिल चौरेभ्योमूषकेभ्यो हुताशनात्।कष्टेन लिखितं शास्त्रंयत्नेन परिपालयेत् ।।"-अर्थात् जल से ग्रन्थ की रक्षा करनी चाहिए क्योंकि जल कागज पत्र को गला देता है, स्याही को फैला देता है या धो देता है।स्थल यानी खुले स्थान पर धूल, मिट्टी ग्रन्थ को भ्रष्ट कर देती है। दीमक, कीड़े-मकोड़े आदि ग्रन्थ को चटकर जाते हैं। नमी और आग से भी ग्रन्थ को हानि पहुँचती है। चूहों तथा चोरों से भी मूल्यवान ग्रन्थ की रक्षा की जानी चाहिए। इस प्रकार लेखक द्वारा जीवन भर साधना करने के बाद लिखा गया शास्त्र-ग्रन्थ मूर्खतावश अथवा लापरवाही के कारण पल भर में नष्ट हो जाता है।सन् 2003 में भारत सरकार द्वारा स्थापित ‘राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन’ के अस्तित्व में आने से अब पाण्डुलिपियों के संरक्षण का कार्य अत्यन्त वैज्ञानिक पद्धति से किया जाने लगा है।आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी के नवीनातिनवीन तकनीकों से पाण्डुलिपियों की रक्षा करना तथा उनकी उपयोगिता को जन सामान्य तक पहुँचाना अब पहले की अपेक्षा सरल और सहजहो गया है। मिशनने इस संबंध में द्विमुखी योजना को प्रारम्भ किया है-1- मूल पाण्डुलिपियों का निवारणात्मक एवं उपचारात्मक संरक्षण तथा2- सांख्यिकीकरण की आधुनिक प्रक्रिया द्वारा पाण्डुलिपियों का संरक्षण।सन् 2011 में पाण्डुलिपि मिशन ने अपने नई दिल्ली स्थित मुख्यालय में प्रायः निष्क्रिय संरक्षण प्रयोगशाला को सुप्रशिक्षित संरक्षकों की सहायता से पुनः सक्रिय किया है तथा संरक्षण से सम्बन्धित आधुनिक तकनीक के प्रयोग को लोकप्रिय एवं व्यावहारिक रूप देने के लिए अपनी वेबसाइट पर ‘अभिलेखीय सामग्री के सांख्यिकीकरण हेतु दिशा निर्देश’ भी जारी किये हैंजिनका मुख्य उद्देश्य है भविष्य के लिए पाण्डुलिपि संरक्षण हेतु जनमानस को जागरूक करना तथा नई सूचना प्रौद्योगिकी के माध्यम से पाण्डुलिपियों का संरक्षण एवं परिरक्षण करना। मिशन ने इस उद्देश्य पूर्ति के लिए चार प्रयोगात्मक माध्यम निर्धारित किए हैं-

सरस्वती शब्द तीन शब्दों से निर्मित हैं,

 


सरस्वती शब्द तीन शब्दों से निर्मित हैं

प्रथम 'सर'जिसका अर्थ सार, 'स्वस्वयं तथा 'तीजिसका अर्थ सम्पन्न हैं; जिसका अभिप्राय हैं जो स्वयं ही सम्पूर्ण सम्पन्न हो। ब्रह्माण्ड के निर्माण में सहायता हेतुब्रह्मा जी ने देवी सरस्वती को अपने ही शरीर से उत्पन्न किया था। इन्हीं के ज्ञान से प्रेरित हो ब्रह्मा जी ने समस्त जीवित तथा अजीवित तत्वों का निर्माण किया।

वेद के अर्थ समझने के लिए हमारे पास प्राचीन ऋषियों के प्रमाण हैं। निघण्टु में वाणी के 57 नाम हैं, उनमें से एक सरस्वती भी है। अर्थात् सरस्वती का अर्थ वेदवाणी है।  सरस्वती के अर्थ विदुषी, वेगवती नदी, विद्यायुक्त स्त्री, विज्ञानयुक्त वाणी आदि किये हैं। अन्य देशों में सरस्वती

जापान में सरस्वती को 'बेंजाइतेन' कहते हैं। जापान में उनका चित्रन हाथ में एक संगीत वाद्य लिए हुए किया जाता है। जापान में वे ज्ञान, संगीत तथा 'प्रवाहित होने वाली' वस्तुओं की देवी के रूप में पूजित हैं।

दक्षिण एशिया के अलावा थाइलैण्डइण्डोनेशियाजापान एवं अन्य देशों में भी सरस्वती की पूजा होती है।

धातु (पठ्, गम्, नम्, दृश्/पश्य, खाद्, लिख्, वद्, क्रीड्, धाव्, हस्, स्था, पा, दा, नी, भू आदि) के लट्, लङ् और लृट् लकार

 धातु (पठ्, गम्, नम्, दृश्/पश्य, खाद्, लिख्, वद्, क्रीड्, धाव्, हस्, स्था, पा, दा, नी, भू आदि) के लट्, लङ् और लृट् लकार दृश् (पश्य) धातु (दे...