Tuesday, August 1, 2023

भारतीय दर्शन शास्त्र

 भारतीय दर्शन शास्त्र
दर्शन-शास्त्र ही हमें प्रमाण और तर्क के सहारे अन्धकार में दीपज्योति प्रदान करके हमारा मार्ग-दर्शन करने में समर्थ होता है। गीता के अनुसार किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः (संसार में करणीय क्या है और अकरणीय क्या है इस विषय में विद्वान भी अच्छी तरह नहीं जान पाते।) परम लक्ष्य एवं पुरुषार्थ की प्राप्ति दार्शनिक ज्ञान से ही संभव है अन्यथा नहीं।
दर्शन द्वारा विषयों को हम संक्षेप में दो वर्गों में रख सकते हैं। लौकिक और अलौकिक अथवा मानवी(सापेक्ष) और आध्यात्मिक(निरपेक्ष)। दर्शन या तो विस्तृत सृष्टि प्रपंच के विषय में सिद्धान्त या आत्मा के विषय में हमसे चर्चा करता है। इस प्रकार दर्शन के विषय जड़ और चेतन दोनों ही हैं। प्राचीन ऋग्वैदिक काल से ही दर्शनों के मूल तत्त्वों के विषय में कुछ न कुछ संकेत हमारे आर्ष साहित्य में मिलते हैं।
नीचे प्रमुख दर्शनशास्त्रों के प्रथम सूत्र दिये गये हैं जो मोटे तौर पर उस दर्शन की विषयवस्तु का परिचय देते हैं-
अथातो धर्मजिज्ञासा ( पूर्वमीमांसा)
अथातो ब्रह्मजिज्ञासा। ( वेदान्तसूत्र )
अथातो धर्मं व्याख्यास्यामः। ( वैशेषिकसूत्र )
अथ योगानुशासनम्। ( योगसूत्र )
अथ त्रिविधदुःखात्यन्तनिवृत्तिरत्यन्तपुरुषार्थः। ( सांख्यसूत्र )
प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानाम्तत्त्वज्ञानात्निःश्रेयसाधिगमः । ( न्यायसूत्र )
(अर्थ : प्रमाण प्रमेय संशय प्रयोजन दृष्टान्त सिद्धान्त अयवय तर्क निर्णय वाद जल्प वितण्डा हेत्वाभास छल जाति और निग्रहस्थान का तत्वज्ञान निःश्रेयस या परम कल्याण का विधायक है।)



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