Tuesday, May 8, 2018

वास्तु शास्त्र (Planning and Architect)

वास्तु शास्त्र (Planning and Architect) जैसा की पहले ही हम लिख चुके है के प्र ब्रह्माण्ड ही वास्तु है। सृष्टी क्रम एक सुनिश्चित प्रक्रिया के अंतर्गत स्वयं परिचालित होता है जि सका नियन्ता स्वयम् ब्रह्मा है। जिस क्रम से सृष्टी प्रारम्भ होती है उसी क्रम से उसका विलय एवम् प्रारम्भ होता है।सृष्टी प्रक्रिया का क्रम ब्राह्मण ग्रन्थो एवम् संहिताओ में बतलाया गया है।इनमे तैत्तिरीयोपनिषद का क्रम अत्यंत सुब्यवस्थित है। इसमे कहा गया है"सर्वप्रथम आकाश की उत्पात्ति हुई इसके बाद आकाश से वायु,वायु से अग्नि,अग्नि से जल,जल से पृथ्वी,पृथ्वी से औषधियां,औषिधियो से अन्न तथा अन्न से मनुष्य की उतपत्ती हुई। (तैत्तिरीयोपनिषद 2-1)सूर्यसिद्धांत के अनुसार  सर्व प्रथम सूर्य की उत्पात्ति हुई पश्चात् सूर्य से सारी सृष्टि की उत्तपति हुई।यथा- "आदित्यो ह्यदि भूतत्वात प्रसूत्या सूर्य उच्यते"। वैदिक सिद्धान्त के अनुसार स्थावर एवम् जंगम दोनों प्रकार की सृष्टि अग्नि एवम् सोम पर ही आधारित है। सोम का सम्बन्ध अन्य पिण्डों या पृथ्वी से सूर्य के रश्मियों के माध्यम से होता है। सूर्य को सप्त रश्मि कहा गया है।भगवान  व्यास ने उन रश्मियों का उल्लेख इस प्रकार किया है। सुषम्ना,हरिकेश,विश्वकर्मा,विश्वव्यचा, अरविंदअर्वावसु,संयद्वसु तथा सुराट। इन्हें ऋग्वेद में  सैट अश्वों के रूप में कहा गया है।हे रश्मियाँ सृष्टि के समस्त क्रम में बिभिन्न रूपों से सहायक है। इनमे से सुषुम्ना नामक रश्मि चन्द्रमण्डल को प्रकाशित करती हुई चन्द्र तल से अमृत बिन्दुओ को पृथ्वी तक पहुचाती है।जिनसे जीवन का संचार होता है।जीवन के दृश्य के लिए जड़ अथवा चेतन  बिना शरीर पंच महाभूतो के मिश्रण से दृश्य नही हो सकता। अतः शेष छः रश्मियां  पांच रश्मियां पञ्च महाभूतों की संचालिका है।सूर्यसिद्धांत में कहा गया है।  अग्निषोमौ भानुचन्द्रौ ततसत्वंगारकादयः तेजोभुखाम्बुबातेभ्य ग्रहा पञ्च जज्ञीरे। अर्थात एक एक रश्मि एक एक ग्रह का पोषण करती है।सुषुम्ना रश्मि चन्द्रमा का पोषण करती है।हरिकेश नामक रश्मि नक्षत्रो को पोषित करती है।विश्वकर्मा नामक रश्मि भू तत्व की संचालिका है यह बुध को प्रकाशित एवम् पोषित करती है।विश्वव्यचा जल तत्व की संचालिका है जो शुक्र को पोषित करती है संयद्वसु तेज की संचालिका होने के कारण मंगल को पोषित करती है।अर्वावसु आकाश तत्व की संचालिका होने से बृहस्पति को तथा सूराट नामक रश्मि  वायुतत्व की संचालिका होने के कारण शनि को पोषित करती है।
इन्ही पञ्च महाभूतों से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की संरचना हुई।

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